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पृथ्वी पिछले 33 हजार सालों से एक सौर बादल के बीच से गुजर रही है




  • भारत महासागर की गहराई में मिले सौर कणों से अवशेष

  • भारत महासागर की गहराई में मिले इसके अंश

  • महाविस्फोट या तारे के विस्फोट से होता है

  • ऑयरन 60 रेडियो धर्मिता के साथ मौजूद

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः पृथ्वी के चारों तरफ एक सौर तूफान की स्थिति है। यह स्थिति शायद पिछले

33 हजार वर्षों से चली आ रही है। इस बारे में शोध करने वाले वैज्ञानिकों ने समुद्र की

गहराई में मिले सौर कणों के अध्ययन के बाद यह नतीजा निकाला है। समंदर की गहराई

से जो विरले किस्म के रेडियो आइसोटॉप मिले हैं, वे इस बात को प्रमाणित कर रहे हैं।

दरअसल ऐसे कणों का समुद्र में आना ही इस अवधि को स्पष्ट कर रहा है कि सौर तूफान

के बीच से गुजरती पृथ्वी के अंदर इन कणों के बरसने का यह सिलसिला 33 हजार वर्ष

पुराना है। इस शोध के बार में ऑस्ट्रेलिया नेशनल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपनी

रिपोर्ट प्रकाशित की है। दूसरी तरफ इस शोध में शामिल रहे जर्मनी के विशेषज्ञों ने भी

रिपोर्ट जारी की है। दोनों ही वैज्ञानिकों का दल एक साथ मिलकर यह काम कर रहा था।

इस शोध में ऑस्ट्रेलिया के अलावा टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ ड्रेसडेन के वैज्ञानिक भी

शामिल थे। इस जर्मन दल भी प्रोफसर एंटोन वालनर के साथ काम कर रहा था। प्रो

वालनर इन दोनों ही विश्वविद्यालयों से जुड़े हुए हैं।

दो विश्वविद्यालयों ने संयुक्त रुप से किया है शोध

इस सौर तूफान के बारे में पहली जानकारी तब मिली थी जब समुद्र की गहराई में सक्रिय

रेडियो आइसोटॉप मिले थे। इनके विश्लेषण से यह पता चला था कि रेडियोधर्मिया रखने

वाले यह कण पृथ्वी का हिस्सा नहीं है। इनपर और शोध हुआ तो यह सौर कण साबित

हुए। तब जानकर यह खोज प्रारंभ हुई थी कि आखिर सौर कण समुद्र की गहराई में क्यों हैं

और कब से इसी अवस्था में हैं। इसी गहन शोध का नतीजा निकला कि दरअसल पृथ्वी

एक रेडियोधर्मी धूलकणों के बीच से गुजर रही है और सौर कणों से वैज्ञानिक इतिहास

बताते हैं कि यह क्रम पिछले 33 हजार वर्षों से जारी है। जिस अदृश्य तूफान के बीच से यह

पृथ्वी गुजर रही है वह शायद किसी सुपरनोवा यानी सौर जगत के महाविस्फोट अथवा

किसी बड़े तारे के टूटने की वजह से पैदा होने वाले अवशेष हैं। स्पेक्ट्रोमीटर के जरिए जब

रेडियो एक्टिव कणों की जांच की गयी तो धीरे धीरे उनके बारे में और जानकारी मिलती

चली गयी। इसमें से एक ऑयरन 60 का आइसोटॉप भी है जो निश्चित तौर पर किसी

सुपरनोवा से उत्पन्न हुए हैं और वहां से पृथ्वी की गहराई में जा पहुंचे हैं। वैज्ञानिक गणना

के आधार पर ही इस स्थिति के 33 हजार साल से जारी होने का अनुमान लगाया गया है।

पृथ्वी के समुद्र की गहराई में मिले है रेडियो एक्टिव सौर कण

अति सुक्ष्म लेकिन रेडियो धर्मिता के तौर पर सक्रिय इन कणों के समुद्र की गहराई में पाये

जाने का अर्थ है कि उन्हें पृथ्वी के अंदर आने और समुद्र की गहराई तक बैठने में भी काफी

वक्त लगा होगा। इस अवधि के बीच उनकी मूल आचरण एक जैसा ही रहा है। दरअसल

यह बात पहले से ही खगोल वैज्ञानिकों की जानकारी में हैं कि ऑयरन 60 की उत्पत्ति ही

तब होती है जब सुपरनोवा अथवा किसी तारे के विस्फोट जैसी कोई स्थिति होती हो।

भारत महासागर की गहराई में पाये जाने वाले कण निश्चित तौर पर किसी ऐसी ही

परिस्थिति की उपज हैं।

वैज्ञानिकों का आकलन है कि हो सकता है कि हमारा यह पूरा सौरमंडल ही किसी ऐसे

तूफान के बीच से गुजरता चला जा रहा है। रेडियो एक्टिव सुक्ष्म कणों की मौजूदगी ही

इसके प्रमाण हैं। दूसरी तरफ किसी भीषण विस्फोट के तैयार होने वाले ऑयरन 60 भी

इसी तरफ इशारा कर रहे हैं। लेकिन वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि समुद्र की गहराई से

मिले साक्ष्यों का अभी और वैज्ञानिक विश्लेषण किये जाने की जरूरत है। इससे कई नई

जानकारियां भी सामने आ सकती हैं। ऐसा भी हो सकता है कि सुदूर अंतरिक्ष में कई लाख

वर्ष पूर्व कोई ऐसा महाविस्फोट हुआ हो और उससे जो सुक्ष्म कण पूरे सौरमंडल में बिखर

गये हैं, उनके बीच से गुजरते हुए ही ऐसे कण पृथ्वी सहित इस सौर मंडल के अन्य ग्रहों

तक भी लगातार पहुंच रहे हैं। लेकिन इसके बारे में अभी और साक्ष्य एकत्रित करने के

प्रयास चल रहे हैं।



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