पृथ्वी अनुमान से तीन गुणा ज्यादा पानी अपने अंदर सोख रहा

पृथ्वी अनुमान से तीन गुणा ज्यादा पानी अपने अंदर सोख रहा
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  • वैज्ञानिक शोध से समुद्री के अंदर पृथ्वी की हलचल की नई जानकारी मिली

  • समुद्र का सबसे गहरा इलाका मेरिना ट्रेंच

  • समुद्र के 32 कि.मी. अंदर तक पहुंचा पानी

  • रासायनिक प्रतिक्रिया भी रही है समुद्री जल से

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः पृथ्वी अपने अंदर ही पानी सोख रही है। समुद्र का पानी पृथ्वी के निचली सतहों से रिसता हुआ अंदर जा रहा है।

पृथ्वी के केंद्र में अब भी खौलता हुआ लावा है।

पानी के अंदर जाने से वहां भी भाप की मात्रा अधिक बन रही है जबकि इस खोलते लावा का बाहरी आवरण समुद्री जल से ठंडा हो रहा है।

साथ ही समुद्री जल के नमक की प्रतिक्रिया से आंतरिक संरचना में भी बदलाव हो रहे हैं।

वैसे यह वैज्ञानिकों के लिए बिल्कुल नई जानकारी है।

पहले भी इस बात का अनुमान था कि समुद्र के अंदर पानी सोखा जा रहा है।

लेकिन अब पता चल रहा है कि वैज्ञानिकों के अनुमान से तीन गुणा पानी अब पृथ्वी के भीतर इलाके में समाता चला जा रहा है।

इस वजह से समय समय पर समुद्री जलस्तर में कमी भी देखी जा रही है।

वैज्ञानिकों ने पानी घटने की घटना पर जब शोध प्रारंभ किया तो इस बात का खुलासा हुआ कि

पृथ्वी के निचले सतह पर समुद्री की नीचे स्थित टेक्नोनिक प्लेटों के आपसी रगड़ के दौरान

जो रिक्त स्थान पैदा होते हैं, उनसे पानी का तेजी से अंदर की तरफ रिसाव होने लगता है।

समुद्र में सबसे गहरा इलाका समझे जाने वाले मेरिना ट्रेंच के पास यह घटना हो रही है।

पृथ्वी के सबसे गहरे समुद्र में दर्ज किये गये आंकड़े

टेक्टोनिक प्लेटों का टकराव इसी मेरिना ट्रेंस के नीचे हो रहा है।

प्रशांत महासागर का यह इलाका अब तक की जानकारी के मुताबिक समुद्र का सबसे गहरा क्षेत्र है।

अनुमान के मुताबिक यह सतह से करीब 11 किलोमीटर की गहराई तक है।

इस विषय पर शोध करने वाले दल के नेता और वाशिंगटन विश्वविद्यालय के प्राध्यापक चेन चाई ने कहा कि

पृथ्वी के नीचे जमीन के आंतरिक सतह के टकराव से पानी अंदर जाता है, इसका अंदाजा तो पहल से ही था।

लेकिन हमलोगों को पहले यह नहीं अंदाजा था कि इतना अधिक समुद्री जल इस इलाके से पृथ्वी के आंतरिक इलाकों तक जा रहा है।

शायद इसी वजह से समुद्री जलस्तर में अचानक कमी होने लगती है।

शोध करते हुए वैज्ञानिक दल ने यह पाया है कि जब धरती के निचले सतह पर दो प्लेटें आपस में टकराती हैं

तो दोनों के घर्षण से एक प्लेट नीचे और दूसरी ऊपर की तरफ उठ जाती हैं।

दोनों के बीच जो स्थान रिक्त होता है, वहां से तेजी से पानी अंदर जाने लगता है।

वैसे टेक्टोनिक प्लेटों के इसी टकराव की वजह से भूकंप और सूनामी जैसी आपदाएं भी आती हैं।

शोध को वैज्ञानिक तथ्य प्रदान करने के लिए दल ने समुद्र के अंदर मेरिना ट्रेंच के पास भी

सिस्मोग्राफ लगाये थे, जिनसे भूकंप के प्रभाव की जानकारी मिलती है।

जांच से यह पता चला है कि जब दो प्लेटों का टकराव होता है तो वहां गीले किस्म के चट्टान बन जाते हैं।

वहां कई किस्म की रासायनिक प्रतिक्रियाएं भी होती हैं।

प्लेटों के टकराव से पानी के अंदर जो कुछ तैयार होता है वह तरल अवस्था में नहीं होता।

यही गीला पदार्थ अंदर जाने के बाद पानी के अंदर जाने का रास्ता साफ कर देता है।

उसके बाद समुद्र का पानी तेजी से अंदर जाने लगता है।

मेरिना ट्रेंच में लगाये गये थे सिस्मोग्राफ

अब वैज्ञानिक उपकरणों से पता चला है कि मेरिना ट्रेंच से करीब 32.2 किलोमीटर अंदर जो बड़े चट्टान हैं, उन तक भी पानी पहुंचा है।

इसलिए समझा जा रहा है कि समुद्री पानी का अंदर जाने की प्रक्रिया काफी लंबे समय से चल रही है और इसमें पहले के अनुमान के मुकाबले बहुत अधिक पानी पृथ्वी के अंदर समा रहा है।

वैसे समुद्री तल से अंदर जाने वाला समुद्री जल अंदर की गर्मी से भाप बन जाता है।

उसके ढेर सारा हिस्सा बाद में किसी भूकंप के बाद ज्वालामुखी फटने के साथ साथ सीधे ऊपर आता है।

लेकिन वैज्ञानिक फिलहाल इसी नतीजे पर पहुंचे हैं कि जितना पानी समुद्र के अंदर जा रहा है, उसके अनुपात में समुद्र से ज्वालामुखी अथवा भूकंप में कम पानी बाहर निकल रहा है।

यानी पृथ्वी के आतंरिक इलाके में पानी का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।

इससे रासायनिक प्रतिक्रियाएं भी हो रही हैं।

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