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बेदाग सरकार पर अब दाग ही दाग

बेदाग सरकार का दावा रघुवर दास ने खुद कम और उनके चंद समर्थकों ने बहुत ज्यादा

किया था। इस नारा को आगे बढ़ाने में एक आइएएस अधिकारी की सबसे अधिक भूमिका

थी। फिलहाल साहब शंटिंग में पड़े हैं और मौका ताड़कर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली

भाग जाना चाहते हैं। लेकिन हेमंत सोरेन की सरकार जैसे जैसे काम कर रही है, एक एक

कर उन सभी मामलों की जांच के आदेश जारी हो रहे हैं, जिनके बारे में पहले से ही

शिकायतें होती रही है। रघुवर दास को पराजित कर विधायक बनने वाले सरयू राय ने

इनमें से अधिकांश पर पहले से ही अपना विरोध दर्ज कराया था। श्री राय यह विरोध तब से

कर रहे थे जब वह खुद रघुवर दास की सरकार में कैबिनेट मंत्री थे। इस कड़ी में ताजा

मामला मेनहर्ट के मोर्चा का है, जिस पर अभी श्री राय का हमला जारी है। चूंकि इनमें से

कोई भी ऐसा मुद्दा नहीं है, जिस पर पहले चर्चा नहीं हुई हो, इसलिए जिनलोगों ने पहले

बेदाग सरकार का दावा लगातार और चीख चीखकर किया था, अब यह उनकी जिम्मेदारी

बनती है कि चांद से चडरी तक के विषयों पर बयान देने के साथ साथ वे इन मुद्दों पर भी

अब अपनी राय रखें। दरअसल राजनीतिक समझदारी में यह बड़ी कमी है कि उन्हें अक्सर

यह भ्रम हो जाता है कि जनता इन विषयों को बहुत जल्दी भूल जाती है।

बेदाग सरकार की याद हर कोई सिवरेज में करता है

अब बारिश के दिनों में रांची में चलने वाले लोगों को हर रोज सिवरेज की याद आती है।

बड़ा तालाब एक महत्वपूर्ण इलाका है, वहां जलकुंभी भरा हुआ है। अब हालांकि यह काफी

साफ हुआ है, उस पर क्या कुछ खर्च हुआ है। इसके अलावा भी चंद कंपनियों के प्रति पूर्व

सरकार की मेहरबानी के पीछे जिस आइएएस अधिकारी की सबसे अधिक भूमिका रही थी,

वह पूर्व मुख्य सचिव राजबाला वर्मा खुद को पर्दे के पीछे रखकर चलना चाहती है। लेकिन

मेनहर्ट प्रकरण में उनकी भूमिका पर भी सरयू राय ने सवाल उठाये हैं। इसलिए अब बेदाग

सरकार के दामन पर लगने वाले दाग के बारे में उनलोगों को आगे आना चाहिए, जिन्होंने

पिछली सरकार में सबसे अधिक मेवा खाया है। राजनीति में डंके की चोट पर किसी बात

का दावा करना ही सच नहीं होता। यह भारतीय राजनीति है, जहां समय के पलटते ही

बहुत कुछ अपने आप ही पलट जाया करता है। इसलिए भाजपा के अंदर भी रघुवर दास के

शासनकाल में सर्वशक्तिमान होने वाले जीव इनदिनों बचाव की मुद्रा में हैं। लेकिन

राजनीतिक परंपरा में शुद्ध आचरण के लिए ऐसे लोगों से एक नहीं बार बार यह पूछा जाना

चाहिए कि बेदाग सरकार के दावों पर अब उनका क्या कुछ कहना है। कल ही झारक्राफ्ट के

कंबल की खरीद के भ्रष्टाचार निरोधक विभाग के जांच के आदेश जारी हुए हैं। यह मामला

भी रघुवर दास के शासनकाल में ही आ चुका था। इसके अलावा राज्यसभा चुनाव में हॉर्स

ट्रेडिंग का मामला भी इनदिनों चर्चा में है।

मंटू सोनी के बयान ने राख कुरेदकर आग सुलगा दी

इसमें योगेंद्र साव और निर्मला देवी के साथ रहने वाले मंटू सोनी ने रघुवर दास के प्रेस

सलाहकार के खिलाफ बयान दर्ज कराया है। हॉर्स ट्रेडिंग में भले ही रघुवर दास खुद आरोपी

है, इसलिए उस मामले को जांच तक अलग किया जाना चाहिए। लेकिन अपने ही प्रेस

सलाहकार द्वारा नगर निगम के तत्कालीन प्रशासके अपने पक्ष में गलत फैसला दिलाने

और मामले की लीपापोती के बाद उसी अफसर को खादी बोर्ड में ईनाम देने पर भी सवाल

तो किया ही जाना चाहिए। दरअसल हाल के कुछ वर्षों में एक सोची समझी रणनीति के

तहत यह चाल चली गयी थी दबाव कुछ इस तरीके से बनाया जाए कि पत्रकार सवाल

करने से पीछे हट जाए। तमाम किस्म की विसंगतियों के बाद भी सोशल मीडिया का

आभार माना जाना चाहिए कि उसने त्वरित गति से सवाल पूछने का नया मंच सभी को

प्रदान कर दिया है। इसलिए अब सत्ता के शीर्ष से पहले के मुकाबले अधिक सवाल पूछा

जाने लगा है। इसलिए सिर्फ खुद को बेदाग कहने का दंभ भरने से अब लोगों की जिज्ञासा

शांत होने वाली नहीं है। अपने आस पास के लोगों के माध्यम से जो भ्रष्टाचार का कचड़ा

और आरोप खुद रघुवर दास ने एकत्रित कर रखा है, उसकी सफाई और उन आरोपों के बारे

में सफाई देना भी उनकी ही जिम्मेदारी बनती है। हेमंत सरकार की गलतियां गिनाने के

साथ साथ अब इस बारे में बयान देने वालों को भ्रष्टाचार के मुद्दों पर भी कुछ बोलना

पड़ेगा। खास कर जबकि पहले और अब के समीकरणों में बहुत अंतर आ चुका है। मसलन

हार्स ट्रेडिंग के स्टिंग का सीडी जारी करने वाले झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल

मरांडी अब भाजपा विधायक दल के नेता हैं। ऐसे में रघुवर दास और उनके समर्थकों पर

आरोपों की सफाई देने की जिम्मेदारी बनती है।


 

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