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लागू लॉक डाउन के चलते महोबा में कारोबारियों को लगी 12 करोड़ की चपत

महोबाः लागू लॉकडाउन के चलते उत्तर प्रदेश के महोबा जिले में ईद के त्योहार पर

व्यापार में 12 करोड़ करोड़ रुपयों का नुकसान होने का अनुमान है। उद्योग व्यापार मंडल

के अध्यक्ष सेवक राम नंदवानी ने शनिवार को यहां बताया कि महोबा जिले को ईद पर इस

बार 12 करोड के कारोबार की चपत लगने जा रही है। उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी के

कारण पिछले ढाई माह से व्यापारिक गतिविधियां पूरी तरह ठप पड़ी है। इससे कपडा,

टेलरिंग, रेडीमेड, चूडी, सौंदर्य प्रसाधन सामग्री व किराना कारोबार पूरी तरह चौपट होकर

रह गया है। ऐसे में जिन दुकानदारों ने त्योहार को लेकर पहले से माल का स्टॉक कर

लिया। उनको अब पार्टियों का भुगतान करना मुश्किल होने जा रहा है। उन्होंने कहा

किलॉकडाउन में ढील औ बाजार खुलने के बावजूद दुकानों में व्यापारी खाली हाथ है और

ग्राहको की भीड़ नदारद है। रमजान माह में तीस दिनों तक चलने वाले रोजा(उपवास) के

बाद ईद का त्योहार आता है। मुस्लिम समुदाय के लोग इसे अत्यंत धूमधाम से मनाते हैं।

घरों की साफ सफाई से लेकर रंग रोगन व साज सज्जा भी इस मौके पर की जाती है।

ईदगाह में होने वाली ईद की नमाज के लिए नए कपडे पहनकर जाने की परम्परा सदियों

पुरानी है। इसलिए रमजान में नए कपडे खरीदने व सिलवाने का सिलसिला पूरे माह

चलता है। नई रवायत में बडी संख्या में युवा पीढी के रेडीमेड कपडे खरीदने के कारण इस

मौके पर बाजार में बीते साल तक पैर रखने की जगह नहीं होती थी। लेकिन अबकी

कोरोना की मार ने ईद के त्योहार के साथ पूरे बाजार को भी बेजार कर दिया है। महोबा

मुख्यालय समेत चरखारी, कुलपहाड़, पनवाड़ी, खरेला, कबरई, श्रीनगर आदि कस्बो में

दुकानदार हाथ पर हाथ धरे बैठे है।

लागू लॉक डाउन में ईद को सादगी से मनाने की अपील

ईद का त्योहार सादगी से मनाए जाने तथा नमाज घर पर ही अता होने की संभावना के

चलते बाजार में सन्नाटा पसरा है। दुकानदार सुबह से शाम तक ग्राहकों की राह देख रहे है

लेकिन उनका कहीं अता पता नही है। शहर काजी आफाक हुसैन के अनुसार ईद पर

ईदगाह में होने वाली नमाज को इस्लाम में सुन्नत माना जाता है। इसलिए सभी लोग

इसमें नए कपडे पहन कर शिरकत करते है। अबकी फिजिकल डिस्टेंसिंग अनिवार्य होने के

कारण रमजान माह में मस्जिदों में सामूहिक रूप से नमाज अता करने पर रोक लगी हुई

है। उन्होंने बताया कि कोरोना की भयावहता जिस तरह से बढ रही है उससे लॉकडाउन में

ईदगाह पर नमाज की इजाजत मिलने वाली नहीं है। ऐसे में नए कपडे खरीदने व बनवाने

का क्रेज भी खत्म हो गया है। मलक फाउंडेसन के सदर इसरार पठान के अनुसार ईद पर

गरीबों को जकात और फितरा देने का रिवाज है। इसमें तमाम लोग जरूरतमंदों को कपडे

व उनके उपयोग की अन्य सामग्री देते हैं। सभी लोगों ने इस बार सादगी से ईद मनाने का

फैसला लिया है। खरीददारी सीधे तौर पर प्रभावित हुई है। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन में

ढील मिलने पर नगरीय क्षेत्रों में बाजार तो खुलने लगे हैं लेकिन कोरोना के खौफ के चलते

उनमें रौनक व रंगत गायब है। कपडा व रेडीमेड बाजार में सन्नाटा पसरा है तो टेलरों के

पास न के बराबर काम है। ईद में पहली बार अबकी सिंवई, सूतफेनी तक बाजार में

उपलब्ध नहीं है। थोक मंडियों कानपुर, झांसी, छतरपुर आदि से माल नहीं आ रहा है।


 

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