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सूखी मछली के कारोबार पर कोरोना के बाद मौसम की मार

  • मजबूरी में काम रोक दिया मछली उत्पादकों ने 

  • आसमान पर तेज धूप नहीं और बारिश भी

  • हजारों लोगों का पेट भरता है यह कारोबार

  • इलाके में यह कुटीर उद्योग जैसा ही है

प्रतिनिधि

मालदाः सूखी मछली के कारोबार से यहां के हजारों परिवारों की रोजी रोटी चलती है। यह

सारे लोग कोरोना संकट में भीषण रुप से आर्थिक नुकसान में रहे हैं। अब नये सिरे से

मछली की खेती करने के बाद जब उसे सूखाकर बाजार में बेचने की बारी आयी है तो

मौसम रास्ते में बाधक बना है। लगातार हो रही बारिश और आसमान पर कड़ी धूप नहीं

होने से उनके सामने मछलियों के नष्ट होने का नया खतरा मंडराने लगा है।

मालदा के जातराभांगा ग्राम पंचायत के अनेक गांवों में सूखी मछली का कारोबार काफी

समय से चला आ रहा है। यूं कहें कि यह अनेक लोगों का पुश्तैनी कारोबार है। कोरोना

संकट के बाद किसी तरह मछली का उत्पादन करने के बाद अब उन्हें सूखाने की बारी

आयी है। सूखी मछली बेचकर वे धन अर्जित करते हैं। लेकिन सूखी मछली तैयार होने में

मौसम की बाधा आ पड़ी है। हाल के दिनों में यहां के मौसम लगातार बिगड़ा हुआ है। रूक

रूक कर होने वाली बारिश और आसमान में कड़ी धूप नहीं खिलने की वजह से मछलियों

को सूखाने का काम नहीं हो पा रहा है। इससे मछलियां खराब हो रही हैं। इन परिवारों को

बड़ी उम्मीद थी कि मछली का उत्पादन अच्छा होने के बाद सूखी मछली बेचकर वे अपना

काफी हद तक घाटा पूरा कर लेंगे। लेकिन अब मौसम कुछ ऐसा है कि यह काम भी नहीं हो

पा रहा है। दिसंबर के महीने में कड़ाके की ठंड के बीच तेज धूप से यह काम हुआ करता है।

लेकिन इस बार तो आसमान पर बादल और नीचे कोहरे ने उनकी उम्मीदों पर फिर से

पानी फेर दिया है। मछलियों के नहीं सूखने की वजह से उनका खराब होने का क्रम भी तेज

हो रहा है।

सूखी मछली पर निर्भर हैं इलाके के सैकड़ों परिवार

इस मामले की जानकारी मिलने के बाद राष्ट्रीय खबर के प्रतिनिधि ने वहां के मंगलबाड़ी,

जातराभांगा, साहापुर पंचायतों के अनेक गावों का हाल जाना है। इन इलाकों में भी सूखी

मछली का कारोबार एक कुटीर उद्योग के जैसा है। आम तौर पर खुले मैदान में बड़े बड़े

इलाकों में प्लास्टिक की चटाई बनाकर इसमें मछली सूखाया जाता है। तेज धूप में यह

काम आसानी से हो जाता है। सूखी मछली बेचने से उन्हें नकदी मिल जाती है। ऐसे

परिवारों को उम्मीद थी कि तेज धूप में यह काम जल्द पूरा होते ही उनका आर्थिक संकट

दूर हो जाएगा। लेकिन इस बार मौसम ने इसमें अड़ंगा डाल दिया है। इस कारोबार से जुड़े

मेनका मांझी और सुबोध मांझी जैसे सैकड़ों परिवार के लोगों को उम्मीद थी कि मछली

सूख जाने के बाद उन्हें पैकेट में डालकर दूसरे राज्यों में भेजने से तुरंत आर्थिक संकट दूर

हो जाता। लेकिन अब मछली सूख ही नहीं रही है तो कारोबार का क्या ठिकाना। इस

मौसम में हर रोज किसानों को हजारों रुपये की मछली का आर्थिक नुकसान उठाना पड़

रहा है। लोग मानते हैं कि अगर यही हाल रहा तो जो मछली सूखाने के लिए लायी गयी है,

वे सभी नष्ट हो जाएंगे। इसी हालत को देखते हुए नये सिरे से मछली पकड़ने का काम भी

इन कृषकों ने फिलहाल बंद कर दिया है। ताकि उन्हें तालाब से मछली निकालने के बाद

भी नुकसान का सामना नहीं करना पड़े। मछली सूखाकर बेचने से चालीस से पचास किलो

दर की मछली 150 से 160 रुपये प्रति किलो के दर से बिक जाती है। कम पूंजी में यह

अधिक लाभ का कारोबार है। लेकिन इस बार मौसम ने तमाम लोगों की उम्मीदों पर पानी

फेर दिया है।

सरला मुर्मू ने कहा परेशानी जानती हूं समाधान का प्रयास जारी है

मालदा जिला परिषद की अध्यक्ष सरला मुर्मू ने कहा कि इस परेशानी से वह अच्छी तरह

वाकिफ हैं। लेकिन इस मौसम की मार के आगे कोई क्या कर सकता है। फिलहाल तो

सरकारी स्तर पर ऐसे मछली किसानों को होने वाले नुकसान की भरपाई कैसे की जाए,

इस पर विचार विमर्श चल रहा है।

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