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डॉ देवज्योति मुखर्जी ने भागलपुर के बंगालियों पर विस्फोटक जानकारी दी

  • कभी यहां का विधायक भी बंगाली ही हुआ करता था

  • उस वक्त के 26 हजार के बदले अब बचे हैं पांच हजार

  • बहुत सारे बंगाली लोगों ने बांग्ला भाषा को ही छोड़ दिया

  • इनके टाइटल बंगाली हैं पर उन्हें बांग्ला अब नहीं आती है

दीपक नौरंगी

भागलपुरः डॉ देवज्योति मुखर्जी दरअसल भागलपुर के लिए एक जाना पहचाना नाम है।

वह शिक्षा जगत में अपने योगदान की वजह से अलग पहचान रखते हैं। लेकिन कई बार

उनके आंदोलनों ने भी सरकार का ध्यान खींचने का काम किया है। आदमपुर निवासी इस

शख्स ने अचानक ही एक बड़ी रैली निकालने का एलान कर सरकार और प्रशासनिक

अधिकारियों को चौंकन्ना कर दिया था। उन्होंने बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में बहुत काम

किया है।

वीडियो में देखिये उन्होंने इन सारे विषयों पर क्या कहा

भागलपुर में यह परिवार पिछले 13 पुश्तों से हैं। उनका परिवार यहां राज पुरोहित बनकर

आये थे। उनके पुरखों 15वीं शताब्दी में यहां आये ते। उन्होंने इस क्रम में भागलपुर में

विजय कुमार मित्रा के विधायक बनने का जिक्र किया और कहा कि कभी यहां 26 हजार

वोटर बंगाली हुआ करते थे। लेकिन बाद के क्रम में बहुत कुछ बदल गया। आज

मतदाताओं के आंकड़ों पर बात करें तो सिर्फ साढ़े पांच हजार बंगाली मतदाता वहां रह गये

हैं। डॉ देवज्योति मुखर्जी ने यह बताया कि आज भी बंगाली पदवी के साथ होने के बाद भी

अनेक परिवारों ने अब बंगला भाषा से अपना रिश्ता ही समाप्त कर लिया है। इसलिए

अगर सिर्फ बंगाली पदवी के साथ मतदाताओं की गिनती हो तो अब भी भागलपुर में आज

भी ऐसे मतदाताओं की संख्या सत्तर हजार के करीब है। लेकिन वह मानते हैं कि समय के

साथ बहुत कुछ बदला है और बंगाली समाज के यहां से पलायन कर जाने के सवाल पर यह

कहते हैं कि यह अत्यंत संवेदनशील सवाल है। लेकिन बाद में कालखंड में बंगालियों के

अपने बीच ही बंटवारा हो गया। अधिकांश बंगाली परिवारों ने अपनी पदवी तो बंगाली रखी

लेकिन बंगला भाषा को छोड़ दिया। इसलिए ऐसे परिवारों में अब बांगला भाषा का कोई

प्रचलन भी नहीं बचा है। उन्होंने अपनी पढ़ाई का उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी अपनी

पढ़ाई बांग्ला भाषा में हुई। लेकिन परीक्षा में जब बांग्ला जानने वाला कोई नहीं था तो

उनकी कॉपी की जांच ही नहीं हुई। यह परीक्षार्थियों और उनके परिवारों के डराने वाली

स्थिति थी। इस वजह से भी अनेक परिवारों ने बांग्ला से रिश्ता तोड़ लिया।

डॉ देवज्योति मुखर्जी ने कहा भाषा छोड़ने की वजह पढ़ाई

उन्होंने कहा कि मेधावी छात्रों को बहुत कम नंबर मिलने से ही यह स्पष्ट हो गया था कि

बांग्ला में लिखे गये उत्तर पुस्तिकाओं की जांच ही नहीं हुई है। इसलिए वह खुद अपने

ननिहाल पश्चिम बंगाल चले गये। क्योंकि उनकी अपनी पढ़ाई लिखाई की मातृभाषा तो

बांग्ला ही थी। उन्हें यह बात अच्छी तरह याद है कि यह भागलपुर के बहुचर्चित दंगा के

पहले की बात है। उत्तर चौबीस परगणा में बिहार का एक छात्र सबसे अब्बल नंबर से पास

हो, यह वहां के लोगों को भी हैरान कर गया। टाटा के अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त संस्थान

एक्सएलआरआई में उद्यमिता की पढ़ाई की। वहां से लौटने के बाद उन्होंने युवाओं को

इस बात के लिए प्रेरित करना प्रारंभ किया कि सिर्फ नौकरी मांगने वालों की कतार में खड़े

मत हो बल्कि नौकरी देने वाले बने। 553 अल्पसंख्यक बच्चे बच्चियों को प्रोत्साहित कर

दोबारा पढ़ाई में वापस ले आये। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया कि अपने शिक्षा

जीवन में उन्होंने करीब दो लाख से अधिक लोगों को पढ़ाने का काम किया है। डॉ

देवज्योति मुखर्जी अखिल भारतीय स्तर पर 95 प्रमुख संस्थानों से जुड़े हुए हैं।

रिक्शा चालकों को मालिक बनाने में हर बड़े आदमी ने मदद की

उन्होंने कहा कि यहां के रिक्सा चालकों को रिक्शा मालिक बनाने में स्थानीय बडे लोगों का

बहुत बड़ा योगदान रहा है। इनलोगों ने उनकी बात पर भरोसा कर बिना ब्याज के पैसे दिये

और इन रिक्शा चालकों को मालिक बनाने में अहम भूमिका निभायी। अब इसी कड़ी में वे

ऐसे रिक्शा चालकों को ई रिक्शा उपलब्ध कराने की योजना पर काम कर रहे हैं।


 

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