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तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे

तुम्हें याद होगा कि हमारी मुलाकात सिर्फ 1962 में ही नहीं हुई थी। उसके पांच साल बाद भी

हमलोगों की मुलाकात नाथुला पास के आस पास हुई थी। लगता है आपको वह मुलाकात याद

नहीं रही तो फिर से याद दिला देता हूं कि वहां आपके ढेर सारे सैनिक मारे गये थे और आप जो

बिना पूछे बीस किलोमीटर तक अंदर चले आये थे तो आपको खदेड़कर आपके इलाके के अंदर

जाकर ठोंका गया था। याद इसलिए दिला रहा हूं ताकि गलवान में फिर आप गलती करते नजर

आ रहे हैं और कहीं ऐसा न हो कि फिर से आपकी ठुकाई हो तो हम कैलाश और मानसरोवर के

आगे तक जाकर अपना पुराना इलाका हासिल कर लें।

वैसे भी इतिहास पढ़ने के बारे में मेरी स्पष्ट धारणा है कि इसे पढ़कर हम पुरानी गलतियों को

दोबारा न करें, इसकी सबक लेते हैं। हमलोगों ने 1962 में आप पर भरोसा कर गलती की थी तो

1967 में आपको औकात बता दी थी। लेकिन आप शायद उसे भूल जाना चाहते हैं तो फिर से

आजमा लीजिए। सिर्फ यह कहने की छूट नहीं होगी कि हमलोगों ने आपको समझाया नहीं था।

शांतिप्रिय हैं तो नाक पर घूंसा मारोगे क्या

शांतिप्रिय होने का यह मतलब थोड़े ना होता है कि आदमी लतखोर हो जाए। पाकिस्तान के

साथ सीधे सीधे उसकी तरह जबाव देने पर उतर आये तो अब सोच समझकर ही कुछ बोलता है।

हमें पता है कि नेपाल के ओली महाराज आपकी युवा सुंदरी के झांसे में वह कार्रवाई कर रहे हैं,

जिससे उनकी खुद की कुर्सी जा सकती है। इसी वजह से जो लोग आपके झांसे में हैं या फिर

आप खुद अगर अपने झांसे में हैं तो आप सभी को याद दिलाता हुआ एक पुरानी फिल्म का गीत

पेश कर रहा हूं। फिल्म सट्टा बाजार के इस गीत को लिखा था गुलशन बाबरा ने और संगीत में

ढाला था कल्याणजी आनंद जी ने। इसे स्वर दिया था हेमंत मुखर्जी ने। गीत के बोल कुछ इस

तरह हैं।

तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे

मुहब्बत की राहों में मिल के चले थे

भूला दो मुहब्बत में हम तुम मिले थे
सपना ही समझो के मिल के चले थे 

भूला दो मुहब्बत में हम तुम मिले थे

डूबा हूँ ग़म की गहराइयों मे
सहारा हैं यादों का तनहाइयों में
डूबा हूँ ग़म की गहराइयों मे
सहारा हैं यादों का तनहाइयों में
सहारा हैं यादों का तनहाइयों में

भूला दो मुहब्बत में हम तुम मिले थे
कहीं और दिल की दुनिया बसा लो

क़सम है तुम्हें वो क़सम तोड़ डालो
कहीं और दिल की दुनिया बसा लो
क़सम है तुम्हें वो क़सम तोड़ डालो
क़सम है तुम्हें वो क़सम तोड़ डालो

तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे
नई दिल की दुनिया बसा न सकूँगा
जो भूले हो तुम वो भुला न सकूँगा
नई दिल की दुनिया बसा न सकूँगा
जो भूले हो तुम वो भुला न सकूँगा
जो भूले हो तुम वो भुला न सकूँगा

भूला दो मुहब्बत में हम तुम मिले थे

तो भइया सब कुछ भूला भी दें तो अपने आप से यह सवाल फिर से करने का मन कर रहा है कि

आखिर गलवान की सीमा पर बिहार रेजिमेंट ही क्यों। कहीं अइसा तो नहीं कि फिर से पुलवामा

की तरह सैनिकों की शहादत को भूनाने की तैयारी हो रही है। आखिर इस ऊंचाई और कड़ाके की

ठंड में लगातार काम करने का प्रशिक्षण अलग होता है।

सरकार की तरफ से जो कुछ बताया गया है, उसे ही सच मान लेता हूं क्योंकि मैं खुद तो वहां

गया नहीं। सरकार ने बताया है कि चीन के साथ लद्दाख सीमा पर भारतीय फौज की 16 बिहार

रेजिमेंट के साथ यह झड़प हुई है। लद्दाख बॉर्डर जैसी भौगोलिक स्थिति में है, उसमें लड़ाई की

स्थिति में कुमाऊँ रेजिमेंट, गढ़वाल रेजिमेंट, डोगरा रेजिमेंट और गोरखा रेजिमेंट ज्यादा

कारगर होती है। क्योंकि ये जवान ऐसी भौगोलिक स्थितियों में ही पले बढ़े और ट्रेनिंग पाए होते

हैं।

तुम्हें याद है कि बिहार में चुनाव आ रहा है

उन भौगोलिक स्थितियों से अपरिचित 16 बिहार रेजिमेंट को वहां लगाना और वो भी बिना

हथियार के, यह विशुद्ध रूप से बिहार बंगाल विधानसभा चुनाव का एजेंडा है। पुलवामा कांड भी

इन्हीं परिस्थितियों में हुआ था। इसलिए भइया अब तो मजदूरों के घर लौटाने का भी श्रेय लूटने

का धंधा चल निकला है। हर कोई चाहता है कि बाजी उसके हाथ लगे। लेकिन इस बार का पेंच

बिल्कुल उल्टा फंसा हुआ है। जो खाली हाथ लौटे हैं उनलोगों ने जुबान पर ताला लगा रखा है।

पता हीं नहीं चल पा रहा है कि उनके दिमाग में क्या कुछ चल रहा है। वइसे भी इनलोगों को

शहर की हवा लगी हुई है, दूसरों से ज्यादा चालाक और समझदार हो गये हैं। पता नहीं कहां लंघी

मार देंगे। होशियार रहना भाई।


 

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