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इस संकट के दौर में इंसानियत तो मत छोड़िये

  • दीपक नौरंगी

भागलपुरः इस संकट के दौर को हल्के में अब कोई नहीं ले रहा है। कोरोना की यह दूसरी

लहर वाकई भयावह है। लेकिन इस भयावह स्थिति के बीच जो कष्टदायक तस्वीर

उभरकर सामने आ रही है, वह इंसानियत का कम हो जाना भी है।

वीडियो में समझिये कि हम कहां कमजोर पड़ रहे हैं

ऐसा इसलिए कहना प्रासंगिक हैं क्योंकि अनेक स्तरों पर इस बात को काफी शिद्दत के

साथ महसूस किया जा रहा है कि लोग अब कोरोना के इस संकट के दौर में इंसानियत का

तकाजा भी छोड़ रहे हैं। कोरोना से पीड़ित रोगियों को छोड़ दें तो दूसरे किस्म की बीमारियों

से पीड़ित लोगों को भी इस दौर में कष्ट और उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है, जो वाकई

दुखदायी स्थिति है। वैसे भी चिकित्सकों और जानकारों ने कोरोना के मरीजों की देखभाल

के भी सही तौर तरीकों के बारे में बार बार लोगों को जागरुक किया है। यह ऐसी स्थिति

नहीं है कि मरीजों को असहाय स्थिति में छोड़ दिया जाए। उनकी सही देखरेख में सामान्य

किस्म की सावधानियों की जरूरत भर होती है। लेकिन फिलहाल इसकी जबर्दस्त कमी से

दिल व्यथित हो रहा है। हालत यह है कि कोरोना के मरीजों की मौत के बाद उनके अंतिम

संस्कार में भी लोगों की सहभागिता अब बहुत कम दिख रही है, जो इंसानियत के कमजोर

कड़ी की साफ निशानी है।

इस संदर्भ में एक बहुत पुरानी गीत भी याद आने लगा है। वर्ष 1958 में एक फिल्म बनी थी

नास्तिक। इस फिल्म का गीत याद दिला दें। इस गीत के बोल हैं, देख तेरे संसार की हालत

क्या हो गयी भगवान, कितना बदल गया इंसान। सूरज ना बदला, चांद ना बदला, ना

बदला यह आसमान, कितना बदल गया इंसान। अभी के माहौल में उस कालखंड का यह

गीत कहीं न कहीं सच साबित होता दिख रहा है।

इस संकट के दौर में उस पुराने गीत के बोल सच साबित हो रहे हैं

इस बात से इंकार नहीं है कि कोरोना की यह दूसरी लहर वाकई डरावनी है। लेकिन उससे

भी अधिक डरावनी यह स्थिति है कि लोग इंसानियत को छोड़ रहे हैं। नतीजा है कि जो

सामान्य किस्म के रोगी हैं, उनकी भी सही तरीके से देखभाल नहीं हो पा रही है। कोरोना के

मरीजों की देखभाल में भी जरा सी सावधानी से कोई खतरा नहीं होता, इस बात को जनता

तक और मजबूती के साथ पहुंचाने की जरूरत है ताकि हर मरीज को चाहे वह कोरोना का

मरीज ही क्यों ना हो, उसे पर्याप्त मदद मिल सके। हालत इतनी बुरी नजर आ रही है कि

मरे हुए लोगों को उठाने तक में लोग आगे नहीं आ रहे हैं और उसके लिए भी अलग से

मजदूरों को बुलाने की आवश्यकता पड़ रही है। अभी यह समय की मांग है कि इंसान को

इंसान के काम आना चाहिए। किसी भी भ्रम की स्थिति में डाक्टर से भी सलाह लेकर ऐसे

मरीजों की सेवा होनी चाहिए।

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