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तुम से मिलके, ऐसा लगा तुम से मिलके चुनाव में ऐसी मिठास तो दिखेगी

तुम से मिलके और हंसते हुए आपसे जो मिल रहे हैं, उनके झांसे में मत आइयेगा। पहला

ही सवाल पूछ लीजिए कि भाई साब पिछले पांच साल से कहां थे, कभी तो सुख दुख में

नजर नहीं आये। कोरोना का ऐसा संकट गया कभी खोज खबर ली थी क्या। बस इतना

पूछ लीजिए और देखिये कि तुम से मिलके ऐसा लगा गाने वालों का चेहरा ही बदल

जाएगा। जी हां फिर से पांच राज्यों में जारी विधानसभा चुनाव की गर्मी के साथ साथ देश

में फिर से कोरोना संक्रमण के बढ़ने के दौरान उपजे संकट के लिए यह सबसे प्रासंगिक

सवाल है। आखिर बार बार हिदायत के बाद भी लोगों को सही तरीके से मास्क लगाने में

तकलीफ किस बात की है, यह बात समझ से परे है। महिलाओं का तो एक बार मान लिया

कि एक घंटा मेकअप कर बाहर निकली हैं तो चाहेंगी कि उस परिश्रम का फल मीठा हो।

लेकिन तुम से मिलके कउन खुश होने वाला है, जो मास्क के ठुड्डी पर लटकाये घूम रहे

हो।

चुनावी जनसभाओं में कोरोना नहीं फैलता है क्या

खैर छोड़िये अधिक डराना भी उचित नहीं। इंडियन पॉलिटिक्स के वेदर रिपोर्ट की बात करे

लें। चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में कौन कहां से जीतेगा, यह बताया जा चुका है। लेकिन इसे अंतिम

सत्य मत मान लीजिएगा। दिल्ली के विधानसभा चुनाव में भी सारे सर्वेक्षण भाजपा की

जीत पक्की बता रहे थे। नतीजा क्या आया, आपके सामने हैं। अब तो दिल्ली में नया

बखेड़ा खड़ा हो गया है। तुम से मिलके मुस्कुराने वाला दिल्ली का कोई भाजपा नेता मिले

तो लगे हाथ यह भी पूछ लेना कि भइया आपका भी तो चुनावी वादा दिल्ली को पूर्ण राज्य

का दर्जा दिलाने का था। उस मांग पर जोर देने के लिए जंतर मंतर पर धरना क्यों नहीं

देते। ऐसा सवाल है कि अधिकांश लोग गधे के सर से सींग की तरह गायब हो जाएंगे।

तुम से मिलके का कथन तो हर कोई बंगाल मे गाने लगा है

खैर बंगाल के अखाड़े की बात करें तो कांटे की टक्कर बनाने की भरसक कोशिश चल रही

है। टीवी चैनल वाले लोगों के मुंह में माइक ठूंसकर यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि

खेला होबे या नहीं। खेला होबे शब्द अब बंगाल की सीमा से बाहर निकल कर अन्य चुनावी

राज्यों तक जा पहुंचा है। हर जगह लोग आपसी चर्चा में भी यही पूछते हैं कि खेल होगा या

नहीं। अब इस खेल का होना तो तय है सिर्फ कौन जीतेगा इस खेल में यह तय नहीं है।

इसी बात पर फिर से एक फिल्मी गीत याद आने लगा है। फिल्म परिंदा अपने जमाने में

चर्चित फिल्म थी। दरअसल इस फिल्म की कहानी ही लीक से हटकर थी। जिस वजह से

पूरी फिल्म अब तक अनेक लोगों के जेहन में याद रह गयी होगी। जिस गीत की चर्चा कर

रहा हूं, उस गीत को राहुल देव वर्मन ने सुर दिया था और उसे स्वर दिया था आशा भोंसले

और सुरेश वाडकर ने।

गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

तुम से मिलके, ऐसा लगा तुम से मिलके अरमाँ हुए पूरे दिलके
ऐ मेरी जाने वफ़ा, तेरी मेरी मेरी तेरी एक जान है
साथ तेरे रहेंगे सदा, तुम से ना होंगे जुदा

तुम से मिलके, ऐसा लगा तुम से मिलके, अरमाँ हुए पूरे दिलके
मेरे सनम, तेरी कसम, छोड़ेंगे अब ना ये साथ
ये ज़िन्दगी, गुज़रेगी अब, हमदम तुम्हारे ही साथ
अपना ये वादा रहा, तुम से ना होंगे जुदा 
तुम से मिलके … 

मैने किया, है रात दिन, बस तेरा ही इन्तज़ार
तेरे बिना आता नहीं, एक पल मुझे अब क़रार
हमदम मेरा मिल गया, हम तुम ना होंगे जुदा

हमदम मेरा मिल गया, हम तुम ना होंगे जुदा
तुम से मिलके, ऐसा लगा तुम से मिलके
अरमाँ हुए पूरे दिलके

ऐ मेरी जाने वफ़ा, तेरी मेरी मेरी तेरी,
एक जान है
साथ तेरे रहेंगे सदा, तुम से ना होंगे जुदा
तुम से मिलके, ऐसा लगा तुम से मिलके
अरमाँ हुए पूरे दिलके।

अब किसानों की बात के बिना तो बात ही अधूरी रहेगी

अब चुनावी सर्वेक्षण से लौटकर फिर से किसान आंदोलन की चर्चा करते चले। मुख्य धारा

की मीडिया में भले ही इस आंदोलन की चर्चा कम हो गयी हो लेकिन उसकी धार अब भी

कमजोर नहीं पड़ी है। जो किसान अपने खेतों में फसल काटने गये हैं, वे भी क्रमवार तरीके

से धरनास्थल पर डियूटी दे रहे हैं। किसान आंदोलन के नेता अब जिस तेवर में बात कर

रहे हैं, उससे तय है कि उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव में ऊंट उल्टी करवट भी बैठ सकता

है। लेकिन इतना भी तय है कि अगर इतना कुछ होने के बाद भी योगी बाबा अपनी नैय्या

खींच ले जाते हैं तो उनका अगला दावा दिल्ली का तख्त होगा। उत्तर प्रदेश की कुर्सी भी

उनको तेवर कड़ा करन के बाद ही मिली थी। वरना साहब तो मनोज सिन्हा जी को गद्दी

सौंपने का मन बना चुके थे। लेकिन कंफ्यूजन इस बात का भी है कि आखिर उत्तराखंड में

चार साल बीत जाने के बाद जब मुख्यंत्री बदला गया तो क्या हरियाणा और किसी अन्य

भाजपा शासित राज्य में भी ऐसी नौबत आ सकती है। सिचुएशन फेबरेबुल नहीं है।

इसलिए तुम से मिलने का रट लगाने वालों से सावधान रहना वरना हाथ मिलाने के बहाने

हाथ काट ले जाएंगे, उस्ताद।

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