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दिल जलता है तो जलने दे.. .. …

दिल जलता है तो सही है आज के माहौल में। कोरोना ने हम सभी को एक ही कतार में

लाकर खड़ा कर दिया है। हरेक का दिल जलता है, भले ही दिल जलने के कारण अलग

अलग हों। पता नहीं दिल की यह जलन कब जाकर समाप्त होगी। सबसे अधिक परेशानी

तो उनलोगों को हैं, जो बिना काम के भी जहां तहां मंडराकर इधर उधर की खबरों के लेन

देन का कारोबार किया करते थे। अब कहीं जाना नहीं तो कहीं से खबर आना भी नहीं। जहां

जाओ पहले सैनेटाइजर लगाओ, फिर थर्मल स्कैनर के आगे खड़े हो। फिर जहां जाना है

वहां भी दूरी बनाकर रखो। बहुत कष्ट है भाई। वैसे राफेल के आने के बाद एक कष्ट तो दूर

हुआ। अब देखना है कि गलवान से लेकर दूसरी चीनी सीमा पर हम क्या कुछ तोप दाग

लेते हैं। वइसे इन दिनों भाई लोगों ने चीन का नाम लेना बंद कर दिया है। अपन प्रधान

सेवक को कॉपी करने का फैशन तो उनके कुर्ते से प्रारंभ हो गया था। अब अनेक लोग

उनकी शैली में भाषण देकर भी खुद को बड़ा नेता समझते हैं। लेकिन आचरण का का करें,

उसकी तो नकल नहीं हो सकती। झारखंड के भी एक शक्तिशाली नेता खूब नकल मारते

थे। इसके बाद भी बेड़ा गर्क हो गया। अब किसी तरह बचे रहने के लिए हाथ पैर मार रहे हैं।

पहले खूब नकल मारते थे अब खुद को बचा रहे हैं

दूसरी तरफ अपने राहुल गांधी खेमा से भी लगातार यही आवाज आती रहती है कि दिल

जलता है तो जलने दे। दरअसल जब से वह कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटे हैं, दोबारा पार्टी पर

उनकी पकड़ बन ही नहीं पा रही है। पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया और बाद में सचिन

पायलट प्रकरण से उनकी पकड़ और ढीली कर दी है। अब अंदरखाने में रोने से क्या होगा।

उसी आग की लपट तो अब झारखंड तक आ पहुंची है। इसी बात पर एक पुरानी फिल्म का

गीत याद आ रहा है। फिल्म का नाम था पहली नजर। फिल्म के लिए इस गीत को लिखा

था आह सीतापुरी ने और संगीत में ढाला था अनिल विश्वास ने। इसे मुकेश ने कुछ इस

अंदाज में गाया था कि बहुत दिनों तक लोगों को यह भ्रम बना रहा कि इस गीत को

दरअसल उस जमाने के सुपर सिंगर कुंदन लाल सहगल ने गाया है। गीत के बोल कुछ इस

तरह है

दिल जलता है तो जलने दे

आँसू ना बहा फ़रियाद ना कर
दिल जलता है तो जलने दे

तू परदा नशीं का आशिक़ है
यूं नाम-ए-वफ़ा बरबाद ना कर
दिल जलता है तो जलने दे

मासूम नजर के तीर चला
बिस्मिल को बिस्मिल और बना
अब शर्म-ओ-हया के परदे में
यूं छुप छुप के बेदाद ना कर
दिल जलता है तो जलने दे

हम आस लगाये बैठे हैं
तुम वादा करके भूल गये
या सूरत आके दिखा जाओ
या कह दो हमको याद ना कर

दिल जलता है, दिल जलता है, दिल जलता है …

तो असली बात पर लौटते हैं कि कांग्रेस में फिर से गुटबाजी का संघर्ष है। कांग्रेस का यह

शायद ब्रैंड बन चुका है कि सब कुछ ठीक रहने के बाद भी पार्टी के अंदर गुटबाजी कभी

समाप्त नहीं होती। एक तरीके से तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छा लक्षण है लेकिन इससे

पार्टी के आंतरिक ढांचे पर लगातार चोट भी पहुंचती रहती है। कांग्रेस की आज देश में जो

गत है, उसके लिए दूसरे नहीं बल्कि खुद कांग्रेस ही जिम्मेदार है। दरअसल सत्ता को

दिल्ली में समेटकर रखने की जो प्रथा स्वर्गीय इंदिरा गांधी के जमाने से चालू हुई, उसे

आज तक उसी ढर्रे पर रखा गया है। यह अलग बात है कि स्वर्गीय इंदिरा गांधी के कद का

कोई दूसरा नेता अब तक कांग्रेस में नहीं आ पाया। लेकिन राज्य में संगठन को मजबूत

होने का कोई अवसर नहीं देने का ही परिणाम है कि आज अनेक राज्यों में कांग्रेस दूसरे,

तीसरे अथवा चौथे नंबर की पार्टी बनकर रह गयी है। यह मुद्दा अभी इतनी आसानी से

सुलझने वाला भी नहीं है। कोरोना संकट ने सभी दलों को सुस्ताने का वक्त दे दिया है,

इसलिए बाकी घरों में क्या कुछ कोहराम मचा है, उसकी भनक कम मिल पा रही है।

कोरोना संकट है तो नेताजी क्वारेंटीन के बहाने बच रहे हैं

लेकिन इंडियन पॉलिटिक्स भी तो केकडा प्रवृत्ति है। एक ऊपर जाता है तो दस मिलकर

उसे नीचे खींचने लगते हैं। दलों की छोड़कर मुद्दों की बात करें तो हरेक के खाते में पंद्रह

लाख से हमारी यात्रा प्रारंभ हुई थी। वहां से जीएसटी, पाकिस्तान, आतंकवाद, कश्मीर,

370, तीन तलाक, कोरोना, गलवान घाटी होते हुए अब हम प्रभु श्री राम मंदिर तक आ

पहुंचे हैं। इतनी दूरी के बीच जिन्होंने वादा किया था वे खुद भी भूल चुके हैं कि आखिर वादा

क्या था। इसलिए मजे लीजिए और दिल जलता है तो वाकई उसे जलने दीजिए। बरसात में

आंसू बहाने का भी कोई फायदा नहीं है।


 

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