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मजदूरों को फुटबॉल मत समझिये हुजूर,धक्के खाने के लिए मजबूर नहीं होता

मजदूरों के नाम पर राजनीति साधने का जो गंदा खेल हो रहा है, वह आम आदमी अच्छी

तरह समझ रहा है। कर्जमाफी का पूरा लाभ उठाने वाले उद्योगपतियों के लिए जितना

आपलोगों को दिल पसीजता है, उसका दसवां हिस्सा भी अगर इन मजदूरों के हिस्से में

आता तो वह आज लॉक डाउन के दो महीने बाद भी धक्के खाने के लिए मजबूर नहीं होता।

रेलगाड़ी, बस और मजदूरों के स्वास्थ्य जांच के नाम पर जो टालमटोल चल रहा है, वह

बच्चों का खेल नहीं है। ऐसा नहीं है कि देश की जनता इसे समझ नहीं रही है। लिहाजा यह

स्पष्ट है कि आग से खेलने की यह राजनीति दरअसल कई नेताओं के चेहरे भी जला

सकती है। विदेश में फंसे भारतीयों को लाने के लिए अगर आपके पास संसाधन हैं तो

भारतीय रेल के इतने बड़े आधारभूत ढांचा का एक साथ इस्तेमाल कर मजदूरों को अपने

अपने राज्य में क्यों नहीं भेजा जा सकता। केंद्र इस विलंब के लिए राज्य सरकारों को

जिम्मेदार ठहरा रहा है जबकि राज्य सरकारों का आरोप है कि केंद्र इस रेल की व्यवस्था में

भी गड़बड़ी कर रही है। यानी देश का मजदूर विभिन्न शहरों में मजबूरी में फंसा हुआ

राजनीति का फुटबॉल हो गया है, जिसके सहारे राजनीतिक दल अपना अपना खेल खेल

रहे हैं। लेकिन यह कोई स्थायी समस्या नहीं है। भारतीय परिवेश में संकट की घड़ी में

जुगाड़ साफ्टवेयर एक प्रचलित परंपरा है। अगर आपलोगों ने ध्यान नहीं दिया तो यकीन

मानिये किसी न किसी तरीके से वे अपने घर लौटने का इंतजाम तो कर ही लेंगे।

चेन्नई से साइकिल चलाकर रांची आ गये तो हिम्मत समझिये

ऐसा हाल में एक उदाहरण रांची में भी देखने को मिला है, जहां चेन्नई से साइकिल से

अपने गांव के लिए चले मजदूर रांची तक आ पहुंचे थे। उन्हें राजगीर जाना था और

उम्मीद है कि अब तक वे सभी लोग अपने गांव पहुंच भी गये होंगे। सड़कों पर पैदल और

सपरिवार चलने को मजबूर इनलोगों की दशा देखकर भी अगर आपलोगों का दिल नहीं

पसीज रहा है तो यकीन मानिये कि देश के करोड़ों मजदूर जब आपको फुटबॉल बनाकर

लात मारेंगे, तो आप देश की राजनीति में दोबारा नजर नहीं आयेंगे। इसके लिए जो भी

दलीलें दी जा रही हैं, वे स्वीकार्य नहीं हैं। लेकिन जो संदेह उपज रहा है वह यह है कि कहीं

इसके पीछे भी पूंजीपतियों को परोक्ष तौर पर मदद पहुंचाने की कोई और साजिश तो नहीं

है। दरअसल अनेक राज्यों के उद्योग अब मजदूरों की कमी झेलने जा रहे हैं। खास तौर पर

हिन्दी पट्टी के जो ग्रामीण देश के विभिन्न इलाकों से मजबूरी में भाग आये हैं, वे दोबारा

वहां लौटने के लिए फिलहाल तो तैयार नहीं है। देश के विकसित राज्यों के इन उद्योगों को

भी चालू रखने के लिए मजदूर चाहिए। मजबूरी की चरम सीमा पर पहुंचने के बाद मजदूरों

ने अपने आप ही रास्ता निकला है और लाखों लोग अपने अपने गंतव्य तक या तो पहुंच

चुके हैं अथवा उसके रास्ते में हैं। इसके बाद भी अगर गरीबों के लिए भारतीय रेल मुफ्त

रेल यात्रा तक का इंतजाम नहीं कर पा रही है तो यह साफ साफ राजनीति है।

मजदूरों को फुटबॉल समझकर राजनीति हो रही है

भारतीय रेलवे की जो आधारभूत संरचना है, उसे पूरी तरह काम में लगाने की स्थिति में

यह काम एक सप्ताह में पूरा किया जा सकता था। सामान्य आंकड़ों के मुताबिक देश में

सामान्य परिस्थितियों में औसतन बीस हजार पैसेंजर ट्रेनों का संचालन होता रहा है।

इसमें से अगर हरेक में एक हजार लोग भी भेजे जाते तो हर ट्रेन के हिसाब के प्रतिदिन

बीस लाख लोगों को भेजा जा सकता है। चूंकि इन श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में एक स्टेशन से

खुलकर अपने गंतव्य पर पहुंचकर ही रुकने का प्रावधान था तो रेलवे के हर स्टेशन पर

उपलब्ध मानव और तकनीकी संसाधन के इस्तेमाल पर भी अधिक जोर नहीं पड़ता।

जाहिर है कि राजनीतिक मैदान में अधिक कब्जा करने का जो खेल अभी चल रहा है वह

दरअसल राजनीति के अलावा कुछ और नहीं है। लेकिन कोरोना संकट के लॉक डाउन ने

देश की जनता को ऊंच नीच का भेद समझने का पर्याप्त अवसर प्रदान किया है। नतीजा है

कि वह देश में इस किस्म के लज्जाजनक भेदभाव को भी अच्छी तरह समझ रहे हैं। यह

चंद ऐसे मुद्दे हैं, जिनके झूठ को अधिक दिनों तक छिपाया नहीं जा सकता है। इसलिए

यकीन मानिये कि जब इस झूठ का पुलिंदा पकड़ा जाएगा तो मजदूर आपको भी फुटबॉल

बनाकर खेलेंगे। लोकतंत्र में संख्या बल महत्वपूर्ण होता है। इसलिए मजदूरों की संख्या

अधिक होने की वजह से उनकी जीत भी उस लड़ाई में सुनिश्चित है। ऐसे में उनकी लात

का क्या कुछ असर हो सकता है, इसे कमसे कम उन्हें अच्छी तरह समझ लेना चाहिए जो

लंबे समय तक राजनीति में टिके रहने की इच्छा रखते हैं। वरना इस देश ने चार दिन की

चांदनी वाले अनेक नेता पहले भी देखे हैं।


 

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