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डिजिटल इंडिया की लठ्ठमारी कैसे सुलझेगी




डिजिटल इंडिया का सपना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खुद की प्राथमिकता का विषय है।

अनेक अवसरों पर वह उसका उल्लेख भी करते हैं। यह सही है कि सूचना क्रांति का पहुंच

जैसे जैसे गांवों तक बढ़ रही है लोगों तक सूचनाओं का प्रवाह तेज होता जा रहा है। आज के

दौर में टीवी पर कोई सूचना आने अथवा अगले दिन समाचार पत्र में उसके प्रकाशित होने

तक सोशल मीडिया में वह मुद्दा बासी हो चुका होता है। इसलिए डिजिटल इंडिया सूचना के

मामले में हमें आगे ले जा रहा है,इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन इसी

डिजिटल इंडिया की वजह से गांव देहात तक क्या कुछ अच्छा और बुरा पहुंच रहा है, इस

पर भी चिंतन मनन होना चाहिए। मोबाइल रिचार्ज करने वाली कंपनियों को ग्रामीण और

गरीब वर्ग से ज्यादा फायदा है, इस बात को वे खुलकर स्वीकार नहीं करते। भोजपुरी गाने

से लेकर अन्य अश्लील गाने और अन्य सामग्री का डाउनलोड होना इसमें शामिल है।

इसके अलावा किसी से बदला निकालने अथवा अपनी कोई भड़ास निकालने के लिए भी

सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल भारत में अब एक प्रचलित तथ्य है। इसके काफी

नुकसान भी हुए हैं। ऐसे में डिजिटल इंडिया में जो लठ्ठमारी हो रही है, उसकी गहराई को

समझना चाहिए। दरअसल यह लट्ठमारी मोबाइल कंपनियों और ब्राड बैंड सेवा पर हॉट

स्पॉट उपलब्ध कराने वालों के बीच है। दूरसंचार कंपनियों ने यह पूरी कोशिश की है कि

विवाद का विषय बने ई एवं वी स्पेक्ट्रम बैंड की भी दूसरे स्पेक्ट्रम की तरह नीलामी की

जाए।

डिजिटल इंडिया की पहली शर्त सरकार तटस्थ रहे

पिछले हफ्ते इन कंपनियों ने भारतीय सेल्युलर ऑपरेटर संघ (सीओएआई) के जरिये

संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद को एक पत्र लिखकर इस मांग से अवगत भी कराया है।

उन्होंने कहा है कि कोई अन्य तरीका अपनाना कानूनी तौर पर अरक्षणीय एवं सबको

समान मौका मिलने की धारणा को नष्ट करने वाला होगा और इससे सरकार को भी भारी

राजस्व क्षति होगी। दूसरी तरफ फेसबुक, गूगल और क्वालकॉम जैसी कंपनियों के मंच

ब्रॉडबैंड इंडिया फोरम (बीआईएफ) ने भी इसका मुखर विरोध किया है। उनकी मांग है कि

इस स्पेक्ट्रम को लाइसेंस के दायरे से बाहर कर देना चाहिए ताकि सार्वजनिक वाई-फाई

हॉटस्पॉट लगाने की मंशा रखने वाले करोड़ों उद्यमियों की राह आसान हो सके। उनका

कहना है कि दूरसंचार कंपनियों के पास स्पेक्ट्रम चले जाने से इस साल देश भर में 50

लाख से अधिक वाई-फाई हॉटस्पॉट लगाने और वर्ष 2023 तक इसे दोगुना कर देने का

सरकार का सपना धराशायी हो जाएगा। फिलहाल देश भर में वाई-फाई हॉटस्पॉट की

संख्या 3 लाख से थोड़ा ही अधिक है। डिजिटल इंडिया के सपने को पूरा करने के लिए

सार्वजनिक हॉटस्पॉट की संख्या में भारी वृद्धि की जरूरत होगी। ई एवं वी-बैंड के स्पेक्ट्रम

में तगड़ा बैंडविड्थ होने से वे भारी पैमाने पर डेटा भेज सकते हैं। लाइसेंस-मुक्त कर दिया

जाने पर वी-बैंड ऐसा स्पेक्ट्रम दे सकता है जिसमें अभी इस्तेमाल हो रहे वाई-फाई राउटर्स

की तरह दूसरे बिना लाइसेंस वाले बैंड से कम व्यवधान हो।

क्यों व्याकुल हो रही है मोबाइल कंपनियां

आखिर यह शोर शराबा क्यों मचा हुआ है? दूरसंचार कंपनियां इन स्पेक्ट्रम बैंड के पाने के

लिए इतनी लालायित क्यों हैं? हमें ध्यान रखना होगा कि रिलायंस जियो ने ही इनकी

नीलामी की मांग रखी थी। पहले से सक्रिय ऑपरेटर चाहते थे कि ई एवं वी-बैंड को उनके

पास पहले से मौजूद स्पेक्ट्रम के साथ संबद्ध किया जाए। स्पष्ट है कि पुराने ऑपरेटर इन

दोनों स्पेक्ट्रम बैंड की नीलामी के पक्ष में नहीं थे। लेकिन डेटा खपत की विस्फोटक वृद्धि

और ब्रॉडबैंड इंटरनेट की आपूर्ति बढ़ाने की फौरी जरूरत ने पूरी तस्वीर बदल दी है। ई एवं

वी-बैंड अपने पास होने से ऑपरेटर खाली जगह की भरपाई कर सकेंगे। मोबाइल टॉवरों के

बीच अंतिम दौर का संपर्क स्थापित करने (तकनीकी शब्दावली में बैकहॉल) में इन बैंड का

इस्तेमाल हो सकता है। फिलहाल करीब 30 फीसदी दूरसंचार टावर ही फाइबर के जरिये

जुड़े हुए हैं और अनुमान है कि इस आंकड़े को दोगुना स्तर पर ले जाने के लिए दूरसंचार

कंपनियों को करीब 3.5 अरब डॉलर का निवेश करना पड़ेगा। इसलिए बिना पैसा लगाये वे

भारत के डिजिटल बाजार पर अधिक हिस्सेदारी चाहते हैं। उन्हें यह भय भी सता रहा है कि

इओन मस्क के सैटेलाइट इंटरनेट के आने की स्थिति में मोबाइल टावर अथवा ऑप्टिकल

फाइबर के मोबाइल अथवा इंटरनेट सेवा का क्या होगा। इसलिए भारत में कार्यरत

कंपनियां बिना पैसा लगाये ही मुनाफा और बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाना चाहती हैं। केंद्र

सरकार यदि चाहे तो सबसे बड़े आधारभूत संरचना वाले बीएसएनएल को इसकी छूट दे दे

तो भारत में जिओ को असली प्रतिस्पर्धा का स्वाद भी चखने को मिलेगा। लेकिन यह

देखना रोचक होगा कि केंद्र सरकार अपनी कंपनी बीएसएनएल और जिओ में से किसे

ज्यादा पसंद करती है।

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