fbpx Press "Enter" to skip to content

हीरों की बारिश हो रही है अरुण और वरुण ग्रह पर

  • इन दोनों ग्रहों पर पहले बहुत कम शोध हुआ है

  • सिर्फ वॉयजर दो इनके करीब से गुजर पाया है

  • सतह पर बर्फ के घने गहरे आवरण बने हुए हैं

  • अंदर की सतह पृथ्वी के बराबर और कठोर

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः हीरों की बारिश सुनने में किसी सपने जैसा लगता है। ऐसा सपना भी आम

इंसान के लिए एक बहुत ही सुखद सपना है। लेकिन अब वैज्ञानिक यह बता रहे हैं कि

वाकई यूरेनस और नेप्चुन ग्रह यानी अरुण और वरुण ग्रह पर बिल्कुल ऐसी ही स्थिति है।

वहां की स्थिति का अध्ययन करने के बाद वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में वैसी सारी

परिस्थितियां पैदा कर हीरों के बारिश की सोच को जांचने का काम किया था। परीक्षण में

यह सिद्धांत सही साबित हुआ है और प्रयोगशाला में भी हीरों के कणों का निर्माण हुआ है।

लिहाजा अब वैज्ञानिक यह मान रहे हैं कि आम विज्ञान की नजरों से ओझल रहे इन दोनों

ग्रहों पर हीरों की बारिश हो रही है।

इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि इन दोनों ही ग्रहों की सतहों पर हीरों का भंडार बिछा हुआ है

और यह बारिश वहां के वायुमंडल की परिस्थितियों की वजह से ही निर्मित होती है।

इन दोनों ग्रहों पर अब तक खगोल विज्ञान में बहुत कम शोध हो पाया है। अब तक के

आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ वोयजर 2 अंतरिक्ष यान ही इन दोनों के करीब से गुजरा है। वहां

की स्थितियों का खगोल दूरबीन से निरंतर निरीक्षण किया गया है। वहां की सतह पर बर्फ

ही बर्फ है। अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित एक शोध लेख के मुताबिक इन

दोनों ही ग्रहों की स्थिति हीरों की वर्षा करने के बिल्कुल अनुकूल है।

हीरों की बारिश होने की वजह उनका बाहरी वायुमंडल

वैज्ञानिक मानते हैं कि इनके वायुमंडल में हाइड्रोजन और हिलियम मौजूद हैं। इनके केंद्र

में पृथ्वी के आकार का एक सख्त पत्थर है। इसी वजह से वहां हीरा वायुमंडल में ही पैदा

होने लायक माहौल है। इसी सोच की वजह से स्टैनफोर्ड लिनियर एक्सीलरेटर सेंटर

(एसएलएसी) के केंद्र और नेशनल एक्सीलरेटर लैबरोटरी (एलसीएलएस) इस पर शोध

किया है। वहां के जैसा सारी परिस्थितियां पैदा करने की वजह से वायुमंडल कार्बन को

सीधे हीरे के कण में बदले के योग्य बन गया था। इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक डॉ डोमिनिक

क्राउस ने कहा कि इसके लिए प्रयोगशाला में उच्च दबाव भी पैदा किया गया। उन्होंने आम

आदमी की समझ के हिसाब के बताया कि एक नाखुन जैसे इलाके पर करीब ढाई सौ

अफ्रीकी हाथियों का बल लगाया गया था। वहां का तापमान भी नौ हजार डिग्री किया गया

था। इससे जो परिस्थितियां बनीं, वे हीरा पैदा करने के लायक थी। प्रयोग के दौरान हीरे के

अत्यंत सुक्ष्म कण बनाये गये थे।

प्रयोगशाला की जांच में अनुमान सही साबित हुआ

इस प्रयोग के बाद यह समझा गया कि इन दोनों ग्रहों पर हीरों की बारिश होने जैसा माहौल

विद्यमान है। वहां के हाइड्रोजन और कार्बन इन्हीं परिस्थितियों की वजह से हीरा पैदा कर

रहे हैं। वायुमंडल में जो हीरे पैदा हो रहे हैं, वे निश्चित तौर पर प्रयोगशाला में तैयार सुक्ष्म

कणों के मुकाबले बड़े होंगे। कुछ लोगों का मानना है कि धरती पर जिस तरीके से

ओलावृष्टि होती है, उसी तरह इन दोनों ग्रहों पर बड़े आकार के हीरों के टुकड़े ही बारिश में

बरसते होंगे। समझा जाता है कि अत्यंत तेज गति यानी करीब 62 सौ मील प्रति घंटे की

रफ्तार के सतह पर गिरने वाले यह सारे कण अंदर धंसते चले जा रहे हैं। इससे ग्रहों के

अंदर की सतह और कड़ी होती जा रही है। उनके ऊपर वहां के वातावरण की वजह से बर्फ

की मोटी चादर पड़ी हुई है। हीरों के कण भी इसी बर्फ की चादर के नीचे धंसकर सुरक्षित हो

जाते हैं।


 

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
More from अंतरिक्षMore posts in अंतरिक्ष »
More from ताजा समाचारMore posts in ताजा समाचार »
More from प्रोद्योगिकीMore posts in प्रोद्योगिकी »

2 Comments

Leave a Reply

error: Content is protected !!