fbpx Press "Enter" to skip to content

हीरे का उल्कापिंड भी हो सकता है अंतरिक्ष में

  • दो विश्वविद्यालयों का संयुक्त शोध अभियान

  • कार्बन का शुद्ध रुप ही बनाता है कीमती पत्थर

  • उच्च ताप और दबाव से ही बनता है डायमंड

  • खगोल अनुसंधान के आंकड़ों पर नया निष्कर्ष जारी

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः हीरे का नाम सुनते ही अधिकांश लोगों की आंखों में चमक आ जाती है। दुनिया

के लोगों के लिए हीरे की औकात एक बेशकीमती पत्थर के तौर पर है। दरअसल इसकी

उपलब्धता बहुत कम होने की वजह से ही इसकी इतनी अधिक कीमत है। कई प्राकृतिक

गुणों की वजह से भी इसे एक दुलर्भ पत्थर माना जाना है। मसलन पृथ्वी में पाये जाने वाले

सबसे शुद्ध कार्बन का स्वरुप हीरा है जो सबसे अधिक कड़ा भी माना गया है।

अब एरिजोयाना स्टेट विश्वविद्यालय और यूनिवर्सिट ऑफ शिकागो के शोधकर्ताओं ने

इसके बारे में रोचक जानकारी दी है। उनलोगों की शोध का निष्कर्ष है कि अंतरिक्ष में कई

स्थानों पर परिस्थितियां ही कुछ ऐसी है कि वहां अपने आप ही हीरा बन सकता है।

इसलिए ऐसी परिस्थिति के बीच से गुजरते वाले खंड भी पूरी तरह हीरा के बने हो सकते हैं।

यह बात सुनने में अजीब लगती है लेकिन वैज्ञानिक सिद्धांत के अनुसार ऐसा हो सकता है।

इस शोध के बारे में एक लेख भी प्रकाशित किया गया है। उल्लेखनीय है कि इससे पहले ही

वैज्ञानिकों ने एक ऐसे उल्कापिंड की पहचान कर ली है, जिसका अधिकांश हिस्सा सोने का

है। सोना और लोहा के बने इस उल्कापिंड पर भी खनन करने की तैयारियों में अमेरिका के

वैज्ञानिक जुटे हुए हैं। वैसे कई अन्य देश भी अंतरिक्ष के दूसरे स्थानों से पृथ्वी के काम के

लिए खनिज लाने की योजना पर काम कर रहे हैं।

हीरे के पिंड होने के संकेत खगोल अनुसंधान से

नासा के हब्बल टेलीस्कोप के आंकड़ों के अलावा टेस और केप्लर अंतरिक्ष यान के आंकड़ों

से भी वैज्ञानिकों को अपने शोध को आगे बढ़ान में मदद की है। कई ऐसे खगोलीय पिंडों का

पता चलने के बाद उनके बारे में अब और अधिक जानकारी एकत्रित करने के प्रयास चल

रहे हैं। वैसे इसी शोध के तहत पृथ्वी के बाहर भी कहीं मानव जीवन के लायक माहौल है

अथवा माहौल बनाने की परिस्थितियां हैं, इस पर भी शोध चल रहा है।

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों ने कहा कि हीरा जड़ा उल्कापिंड अथवा खगोलीय पिंड होने की

संभावना हीरे के निर्माण के तथ्यों पर आधारित है । यह सभी जानते हैं कि कार्बन का यह

अत्यंत शुद्ध स्वरुप अत्यधिक ताप और दबाव से ही बनता है। पृथ्वी की गहराई में भी जहां

हीरे की खदानें हैं, वहां भी लाखों वर्षों की परिस्थितियों की वजह से अंदर दबे पदार्थ हीरे में

तब्दील हो गये हैं। इसलिए अगर अंतरिक्ष में कार्बनयुक्त खगोलीय पिंड गुजर रहे हैं, जहां

यह दोनों ही परिस्थितियां हैं तो हीरा बनना सैद्धांतिक तौर पर संभव है। इस हीरे के

निर्माण की रासायनिक प्रक्रिया की समझ रखने वालों ने कहा कि पृथ्वी में कार्बन और

ऑक्सीजन का अनुपात काफी कम है। इसी वजह से यहां करीब 0.001 प्रतिशत हीरा है।

पृथ्वी में इसके बनने लायक माहौल बहुत कम है

लेकिन जहां यह अनुपात अधिक है वहां प्राकृतिक तौर पर ही हीरा अधिक होना

स्वाभाविक प्रक्रिया है। जिस किस भी खगोलीय पिंड में कार्बन और सिलिकेट होंगे, वे इसी

परिस्थितियों के बीच से गुजरते वक्त हीरे में तब्दील होते जा रहे हैं। हो सकता है कि

निरंतर इस प्रक्रिया से गुजरने की वजह से अंतरिक्ष में ऐसे अनेक पिंड चक्कर काट रहे

होंगे, जो पहले से ही पूरी तरह हीरा में तब्दील हो चुके हैं। इनमें कुछ हीरे से जड़े उल्कापिंड

भी हो सकते हैं। इस संभावना से आगे की शोध के लिए अत्याधुनिक यंत्रों और खगोल

दूरबीनों का सहारा लिया जा रहा है। उनकी मदद से पृथ्वी से अनेक प्रकाश वर्ष की दूरी पर

स्थिति ऐसे पिंडों की एक एक कर पहचान की जा रही है, जो इसी माहौल के बीच से गुजरते

रहते हैं। निरंतर इस प्रक्रिया से गुजरने की वजह से ऐसे पिंडों में से कितनों में हीरा का

निर्माण हुआ है, उसकी खोज अब तेज हो रही है। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि ऐसे खगोलीय

पिंड पृथ्वी से अनेक प्रकाश वर्ष की दूरी पर है।


 

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
More from अंतरिक्षMore posts in अंतरिक्ष »
More from ताजा समाचारMore posts in ताजा समाचार »
More from प्रोद्योगिकीMore posts in प्रोद्योगिकी »

Be First to Comment

Leave a Reply

error: Content is protected !!