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डेंगू से पीड़ित रोगियों में कोरोना प्रतिरोधक

  • मच्छरों से फैलता है डेंगू का वायरस

  • ब्राजिल के कई इलाकों में अंतर दिखा

  • अधिकाधिक आंकड़े जुटाने का काम तेज

  • वैश्विक संकट के बीच नई उम्मीद वैज्ञानिकों की

रांचीः डेंगू की परेशानियों को पूरा हिन्दुस्तान अच्छी तरह जानता है। अब इस परेशानी के

बीच से भी एक अच्छी बात निकलकर सामने आयी है। कुछ वैज्ञानिक मान रहे हैं कि डेंगू

की बीमारी से पीड़ित होने वाले रोगियों के अंदर कोरोना का प्रतिरोधक स्वाभाविक तौर पर

विकसित होता है। दरअसल कोरोना वायरस का स्वरुप बदल जाने के बाद यह नई

जानकारी वैज्ञानिकों की नजर में आयी है। कई वैज्ञानिक इंटरनेट मंचों पर इस संभावना

को प्रसारित भी किया गया है। इसे गंभीरता से इसलिए भी लिया जा रहा है क्योंकि अब

तक लगातार कोशिशों के बीच भी कोरोना वायरस के लिए न तो कोई वैक्सिन लोगों को

मिल पाया है और न ही इसके लिए कोई खास दवा बन पायी है। लिहाजा अगर डेंगू की

बीमारी से कोरोना प्रतिरोधक तैयार होने की बात सामने आयी है तो कोरोना से लड़ने के

लिए चल रहे वैश्विक अनुसंधान में यह नया पन्ना भी जुड़ सकता है। हो सकता है कि आने

वाले दिनों में इस पर हो रहे शोध के और भी परिणाम सामने आये। जो जानकारी सामने

आयी है उसके मुताबिक डियूक विश्वविद्यालय के प्रोफसर मिगुएल निकोलेलिस ने इस

बारे में बताया है कि कोरोना वायरस से प्रभावित कुछ इलाकों में डेंगू का प्रकोप नजर आने

के बाद यह अंतर सामने आया था। जहां जहां डेंगू का प्रकोप अधिक बढ़ा है वहां वहां

कोरोना का प्रभाव कम हो जाने की वजह से ही लोगों का ध्यान इस तरफ आकृष्ट हुआ था।

इसी वजह से यह प्रारंभिक सोच विकसित हुई है। इसी वजह से वैज्ञानिकों ने इस पर ध्यान

दिया कि क्या फ्लाविवायरस सेरोटाइप और सार्स कोव 2 के बीच कोई रिश्ता है। इस बारे

में हुए अध्ययन का प्रारंभिक निष्कर्ष है कि डेंगू का वैक्सिन भी कोरोना के खिलाफ

प्रारंभिक तौर पर बचाव का काम कर सकता है।

डेंगू से पीड़ित रोगियों का आंकड़ों से मिला संकेत

कई अन्य दवाइयों को भी इसी तरीके से कोरोना से बचाव के लिए सहज उपाय के तौर पर

देखा गया है। लेकिन इन सभी के बारे में अब तक कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकाला गया है।

शरीर के अंदर डेंगू के प्रभाव से क्या कुछ बदलाव होता है, उसकी जांच अभी जारी है और

यह अपने किस्म की नई जांच है क्योंकि इससे पहले कभी भी कोरोना के संदर्भ में डेंगू की

जांच नहीं हुई थी। शोध के तहत जिन लोगों के नमूने एकत्रित किये गये थे, उनकी

मेडिकल जांच में यह पाया गया है कि उन रोगियों में बुखार होने के बाद भी कोरोना का

वायरस सक्रिय अवस्था में नहीं जा पाया है। इसी वजह से निकोलेलिस मानते हैं कि इन

दोनों वायरसों के बीच कोई समानता है जिस कारण डेंगू की बीमारी से ठीक होने वाले

रोगियों के अंदर कोरोना से बचाव का प्रतिरोधक स्वाभाविक तौर पर विकसित हो जाता

है। याद रहे कि दुनिया में डेंगू का पहला प्रकोप 1779 में पहली बार रिकार्ड किया गया था।

लेकिन इसकी रोकथाम की दवाई 20वीं सदी में ही बन पायी है। यहां तक कि दूसरे

विश्वयुद्ध के दौरान भी अनेक सैनिक इस डेंगू से भीषण रुप से प्रभावित हुए थे। दुनिया में

इससे हर साल औसतन बीस हजार लोगों के मौत के आंकड़े हमारे सामने हैं।

उसकी दवा भी बीसवीं सदी में बन पायी है

जिन इलाकों में इस रोग का प्रकोप अधिक रहा है, उनमें ब्राजिल भी है। वहां यह पाया गया

है कि मच्छरों के माध्यम से फैलने वाले इस रोग के होने के बाद इंसान के शरीर के अंदर

एक खास प्रतिरोधक बनता है जो लोगों को कोविड 19 से बचाव दे रहा है। जिन इलाकों में

डेंगू के अधिक रोगी अधिक रहे हैं, वहां कोरोना का प्रसार अपेक्षाकृत धीमी गति से हुआ है।

इसी वजह से अब डेंगू प्रभावित इलाकों में इससे संबंधित अधिक से अधिक आंकड़े अब

एकत्रित करने का काम प्रारंभ हुआ है। इसका मकसद दोनों के बीच का रिश्ता खोजना और

डेंगू प्रभावित रोगियों के शरीर के अंदर कोरोना से लड़ने का हथियार खोजना है।


 

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