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नोटबंदी का वह लाभ नहीं मिला जिसका वादा किया गया था

नोटबंदी के मुद्दे पर भी राजनीति तेज है। विरोधी दल इसे अब तक का सबसे बड़ा घोटाला

बता रहे हैं। दूसरी तरफ भाजपा इसे राष्ट्रहित में बताने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। खुद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्रीय टेलीविजन पर रातोरात 500 और 1,000 रुपये के नोट

बंद करने की घोषणा को चार वर्ष बीत चुके हैं। बीते वर्षों में नोटबंदी चर्चा का महत्त्वपूर्ण

विषय रही है। बहरहाल, यह कहना सही होगा कि नोटबंदी एक विवादास्पद नीतिगत

हस्तक्षेप था और इससे शायद ही कोई लाभ हुआ हो। इसके बावजूद सोमवार को मोदी ने

इसके पक्ष में ट्वीट किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि नोटबंदी से तीन व्यापक क्षेत्रों में

सफलता हासिल हुई है: काले धन में कमी आई, कर अनुपालन में सुधार हुआ और

पारदर्शिता में इजाफा हुआ। मुख्य आर्थिक सलाहकार समेत कई अधिकारियों ने भी हाल

में इस नीति का बचाव किया। सरकार के नजरिये से नोटबंदी को उन कदमों की शृंखला

का एक कदम माना जाना चाहिए जो अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने और भुगतान का

डिजिटलीकरण करने के इरादे से उठाए गए। इनमें से कई कदम मसलन जैम, एकीकृत

भुगतान व्यवस्था अथवा यूपीआई का बढ़ता प्रभाव आदि यकीनन सकारात्मक कदम हैं

और इनसे न केवल सुगमता बढ़ी है बल्कि पारदर्शिता भी बढ़ी है। इसके बावजूद इन

कदमों की सफलता और नीतिगत कदमों में नोटबंदी की स्थिति के बीच नोटबंदी के प्रभाव

को अन्य नीतियों के प्रभाव से अलग करके देखना आसान नहीं है।

नोटबंदी के गुण दोष समझने के लिए चार साल काफी

लेकिन पिछले चार वर्षों में देश और आम आदमी की अर्थव्यवस्था की स्थितियों पर गौर

करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह फैसला देश और देश की जनता को कोई फायदा

पहुंचाने वाला साबित नहीं हो पाया है। अगर कुछ फायदा हो भी सकता था तो पहले

जीएसटी और अब कोरोना से हरेक का बजट ही बिगाड़ दिया है। इसलिए अब नया प्रश्न

यह उभरता है कि क्या नोटबंदी औपचारिकीकरण और डिजिटलीकरण के पैकेज का

अनिवार्य हिस्सा थी? क्या इसका अन्य नीतियों से अलग आकलन किया जा सकता है?

सरकार की ओर से इन सवालों के जवाब आना बाकी है। इस मामले में जो आंकड़े उपलब्ध

हैं वे स्पष्ट रूप से सरकार के दावे का समर्थन नहीं करते। तात्कालिक भुगतान व्यवस्था

यानी आईएमपीएस में नोटबंदी के बाद पहले की अपेक्षा अधिक तेजी आई है। समस्त

लेनदेन में मोबाइल आधारित लेनदेन दोबारा नोटबंदी के पहले के वृद्धि स्तर पर लौट चुका

है। सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में प्रचलित मुद्रा 2015-16 में यानी नोटबंदी के

पहले वाले पूर्ण वर्ष में 12.1 थी लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार वर्ष 2018-19 में यह

वापस 11.2 फीसदी के स्तर पर आ चुकी है। अर्थशास्त्रियों की यह चेतावनी अब सही

साबित होती दिख रही हैं कि नोटबंदी जैसे कदमों की बदौलत उपभोक्ताओं के व्यवहार में

स्थायी बदलाव ला पाना मुश्किल दिखता है।

जो लक्ष्य बताये गये थे, वे तो पूरे नहीं हुए हैं

जहां तक कर वंचना, पारदर्शिता और काले धन के मामले में प्रधानमंत्री की दलीलों की 

बात है तो इस बारे में सफलता की घोषणा कर पाना मुश्किल है। यकीनन नोटबंदी के बाद

के वर्षों में कर में उछाल आई है। लेकिन यह उछाल केवल नोटबंदी के ठीक पहले वाले वर्षों

से तुलना करने पर ही नजर आती है। वास्तव में यह बमुश्किल 2012-13 के स्तर पर लौटा

है और वित्तीय संकट के पहले के स्तर से खासा नीचे है। कर दायरे में इजाफे की बात करें

तो वित्त मंत्रालय ने संसद में बताया था कि वित्त वर्ष 2018-19 के लिए करदाताओं ने

फरवरी 2020 तक कुल 5.8 करोड़ रिटर्न दाखिल किए। केवल 1.46 करोड़ लोगों ने ही 5

लाख रुपये से अधिक आय की घोषणा करते हुए रिटर्न दाखिल किए। 

कर चोरी रोकने का इंतजाम भी बेकार साबित हुआ

कर चोरी रोकने के लिए नोटबंदी और तमाम अन्य प्रयासों के बावजूद ऐसा हुआ। इन

उपायों में बड़ी निकासी में स्रोत पर कर कटौती और आधार में वृद्धि आदि शामिल हैं। काले

धन को एकबारगी झटका जरूर लगा होगा परंतु बैंकों में जितनी तादाद में नकदी वापस

लौटाई गई उसे देखते हुए स्पष्ट नहीं है कि इस एकबारगी प्रहार का असर कितना था।

इसके विरोध में दलीलें एकदम स्पष्ट हैं। असंगठित क्षेत्र के उद्यमों को नोटबंदी के कारण

तो झटका लगा ही था, जीएसटी और उसके बाद लॉकडाउन ने उन्हें और अधिक प्रभावित

किया। तमाम सर्वेक्षण बताते हैं कि रोजगार निर्माण पर भी असर हुआ। ऐसे में यह दावा

करना मुश्किल है कि नोटबंदी के सकारात्मक पहलू, उसके नुकसान पर भारी हैं। जो कुछ

फायदा हो सकता था वह इस वैश्विक संकट कोरोना ने पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।

सरकार और घर दोनों के बजट पर कोरोना की मार पड़ी है। इससे उबरने में अभी देश और

देश को जनता को वक्त लगेगा। लिहाजा अब माना जा सकता है कि नोटबंदी का वह

प्रयोग दरअसल विफल साबित हुआ है।

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