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देश के प्रमुख सात संगठनों की मांग बेकसूरों की गिरफ्तारियों का सिलसिला बंद हो

नयी दिल्लीः देश के प्रमुख सात सांस्कृतिक संगठनों ने कोरोना काल में लेखकों, पत्रकारों

और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की कड़ी निंदा की है और उनके अविलंब

रिहाई की सरकार से मांग की है। जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच, दलित लेखक

संघ, प्रगतिशील लेखक संघ, न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव, प्रतिरोध का सिनेमा, संगवारी

ने सोमवार को एक बयान जारी कर यह मांग की है। बयान मे कहा गया है कि सरकार

राजनीतिक उत्पीड़न और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए पूर्णबन्दी का इस्तेमाल कर रही

है और मानवाधिकार-कर्मियों लेखकों-पत्रकारों को गिरफ्तार कर रही है। बयान में कहा

गया है कि बुद्धिजीवियों और राजनैतिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां सरकारी काम में

बाधा डालने (धरने पर बैठने) जैसे गोलमोल आरोपों में और अधिकतर विवादास्पद

गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) ‘यूएपीए’ कानून के तहत की जा रही हैं। यूएपीए

कानून आतंकवाद से निपटने के लिए लाया गया था। यह विशेष कानून ‘विशेष परिस्थिति

में’ संविधान द्वारा नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकारों को परिसीमित करता है।

जाहिर है, इस Ÿकानून का इस्तेमाल केवल उन्हीं मामलों में किया जाना चाहिए जिनका

सम्बन्ध आतंकवाद की किसी वास्तविक परिस्थिति से हो दूसरी तरह के मामलों में इसे

लागू करना संविधान के साथ छल करना है। संविधान लोकतंत्र में राज्य की सत्ता के

समक्ष नागरिक के जिस अधिकार की गारंटी करता है, उसे समाप्त कर लोकतंत्र को

सर्वसत्तावाद में बदल देना है।

देश के प्रमुख संगठनों ने कहा कानून के गलत इस्तेमाल हो रहा है

बयान में कहा गया है कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (जेएनयू) की दो छात्राओं,

देवांगना कलिता और नताशा नरवाल को भी गिरफ्तार किया गया जो प्रतिष्ठित नारीवादी

आन्दोलन ‘पिंजरा तोड़’ की संस्थापक सदस्य भी हैं। इन्हें पहले ज़ाफराबाद धरने में

अहम भूमिका अदा करने के नाम पर 23 मई को गिरफ्तार किया गया अगले ही दिन

अदालत से जमानत मिल जाने पर तुरंत अपराध शाखा की स्पेशल ब्रांच द्वारा हत्या और

दंगे जैसे आरोपों के तहत गिरफ्तार कर लिया गया ताकि अदालत उन्हें पूछताछ के लिए

पुलिस हिरासत में भेज दे। आखिरकार उन्हें दो दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया गया

है। बयान में कहा गया है कि कुछ ही समय पहले जेएनयू के एक महिला छात्रावास में

सशस्त्र हमला करने वाले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के जाने पहचाने गुंडों में से

किसी को भी गिरफ्तार नहीं किया गया है। कुछ ही समय पहले जामिया मिलिया

इस्लामिया के पूर्व-छात्रों के संगठन के अध्यक्ष शिफा-उर रहमान को ‘दंगे भड़काने’ के

आरोप में गिरफ्तार किया गया था। गुलफिशा, खालिद सैफी, इशरत जहां, सफूरा ज़रगर

और मीरान हैदर को पिछले कुछ हफ्तों के दौरान गिरफ्तार किया गया है। ये सभी

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) विरोधी आन्दोलन के सक्रिय कर्मकर्ता रहे हैं।

गुलफिशा, सफूरा और मीरान को यूएपीए के तहत गिरफ्तार लिया गया है। सफूरा और

मीरान जामिया को-ओर्डिनेशन कमेटी के सदस्य हैं। एम फिल की शोध-छात्रा सफूरा

गिरफ्तारी के समय गर्भवती थीं।

सत्ता समर्थकों को सरकार का मौन समर्थन

इस बीच संघ-समर्थक ट्रोल सेना ने सफूरा के मातृत्व के विषय में निहायत घिनौने हमले

कर उनके शुभ-चिंतकों का मनोबल तोड़ने की भरपूर कोशिश की है यह निकृष्टतम श्रेणी

की साइबर-यौन-हिंसा है, लेकिन सरकार-भक्त हमलावर आश्वस्त हैं कि उनके खिलाफ

कोई कार्रवाई नहीं हो सकती। बयान के अनुसार बीते 14 अप्रैल को आनंद तेलतुम्बड़े और

गौतम नवलखा जैसे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के समाज-चिंतकों को गिरफ्तार किया गया।

यूएपीए के प्रावधानों के कारण सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें अग्रिम जमानत देने से इनकार कर

दिया था। हाल ही में कश्मीर के चार पत्रकारों के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दाखिल की

गयी है। इनमें से दो, मसरत ज़हरा और गौरव गिलानी को यूएपीए के तहत आरोपित

किया गया है। उत्तर पूर्वी दिल्ली में सीएए के खिलाफ सांप्रदायिक हिंसा से जुड़े एक

मामले में दिल्ली पुलिस ने जामिया के छात्रों मीरान हैदर और जेएनयू के छात्र नेता उमर

खालिद के खिलाफ भी यूएपीए कानून के तहत मामला दर्ज किया है। इन पर दंगे की

कथित ‘पूर्व-नियोजित साजिश’ को रचने और अंजाम देने के आरोप हैं। उधर मणिपुर

सरकार ने जेएनयू के ही एक और छात्र मुहम्मद चंगेज़ खान को राज्य सरकार की

आलोचना करने के कारण गिरफ्तार किया है। गुजरात पुलिस ने मानवाधिकारवादी

वकील प्रशांत भूषण के खिलाफ उनके एक ट्वीट के लिए रपट लिखी है। इसी तरह गुजरात

पुलिस ने जनवादी सरोकारों के लिए चर्चित पूर्व-अधिकारी कन्नन गोपीनाथन और

समाचार सम्पादक ऐशलिन मैथ्यू के खिलाफ भी प्राथमिकी दर्ज की है। इन संगठनों का

कहना है कि गत तीन अप्रैल को दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर

को दिल्ली की दंगा-प्रभावित गलियों से हर दिन कई नौजवानों के गिरफ्तार किये जाने का

संज्ञान लेते हुए नोटिस जारी किया है।

पत्रकारों को भी प्रताड़ित करने की साजिशें जारी

इसी के साथ ‘द वायर’ के सम्पादक सिद्धार्थ वरदराजन को भी उत्तर प्रदेश पुलिस

गिरफ्तार करने पहुंची। कोयम्बटूर में ‘सिम्पल सिटी’ समाचार पोर्टल के संस्थापक

सदस्य एंड्रयू सैम राजा पांडियान को कोविड-19 से निपटने के सरकारी तौर-तरीकों की

आलोचना करने के लिए गिरफ्तार किया गया है। उत्तर प्रदेश में पत्रकार प्रशांत कनौजिया

के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज हुआ है, हाईकोर्ट ने हालांकि गिरफ्तारी पर फिलहाल रोक

लगा रखी है। इसी तरह दिल्ली में आइसा की डीयू अध्यक्ष कंवलप्रीत कौर समेत डीयू और

जेएनयू अनेक छात्र-नेताओं के मोबाइल फोन बिना उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाए पुलिस

द्वारा जब्त कर लिए गए हैं। ये नेतागण छात्र-छात्राओं की आवाज़ उठाते रहे हैं। यह

पुलिसिया ताकत का बेजा इस्तेमाल करते हुए राजनीतिक असंतोष का दमन करने के

लिए उनकी निजता में सेंध लगाने की ऐसी नाजायज कोशिश है जिसकी किसी लोकतंत्र में

कल्पना भी नहीं की जा सकती। इन संगठनों ने इन सभी बेकसूर लोगों को तत्काल रिहा

करने की मांग की है।


 

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