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उच्चतम न्यायालय में अयोध्या मामले की सुनवाई में पूरी जमीन की मांग







नयी दिल्ली :उच्चतम न्यायालय में अयोध्या के राम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले की सुनवाई बुधवार दूसरे दिन शुरू की।

न्यायालय ने मध्यस्थता प्रक्रिया विफल होने के बाद नियमित सुनवाई का फैसला किया है।

मामले में पक्षकार निमोर्ही अखाड़े की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सुशील जैन ने

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष दूसरे दिन भी दलीलें जारी रखी।

इससे पहले अयोध्या में राजनीतिक और धार्मिक दृष्टि से संवेदनशील राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में

मंगलवार को उच्चतम न्यायालय में एक हिन्दू पक्षकार ने समूची 2.77 एकड़ विवादित जमीन का नियंत्रण और प्रबंधन दिये जाने की मांग की।

मामले में एक अहम पक्षकार निमोर्ही अखाड़ा ने विवादित स्थल पर अपना

दावा पेश करते हुए कहा कि मुस्लिमों को 1934 से इस विवादित ढांचे में प्रवेश की इजाजत नहीं थी।

इसी जगह पर स्थित बाबरी मस्जिद को छह दिसंबर 1992 को गिरा दिया गया था।

अखाड़ा ने कहा कि वह भगवान राम की जन्मस्थली का प्रबंधक होने के नाते मुख्य मंदिर पर स्वामित्व और कब्जे के लिये दावा पेश कर रहा है।

इस विवाद का मध्यस्थता के माध्यम से समाधान खोजने का प्रयास विफल होने के बाद

उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ दायर 14 अपीलों पर मंगलवार से दैनिक सुनवाई शुरू की।

संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति धनंजय वाई चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल हैं।

निमोर्ही अखाड़ा ने पांच सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष कहा कि वह अपने महंत और सरबराहकार के माध्यम से

इसके (संपत्ति का) प्रबंधक के रूप में काम कर रहा है और धन के रूप में चढ़ावा स्वीकार कर रहा है।

निमोर्ही अखाड़े की ओर से उसके वकील वरिष्ठ अधिवक्ता सुशील जैन ने कहा कि

मुस्लिम विधि के तहत दूसरे की जमीन पर कोई भी मस्जिद नहीं बना सकता।

रिकॉर्ड का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, किसी भी मुस्लिम ने मंदिर भवन में प्रवेश नहीं किया।

यह खास तौर पर कहा गया है कि किसी भी मुस्लिम ने 1934 से इसमें घुसने का प्रयास भी नहीं किया

और इसलिये जमीन पर अखाड़े का दावा वैध है और उसका सम्मान किया जाना चाहिये।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि 16 दिसंबर 1949 से यह स्थल अखाड़े के कब्जे में है

और मुस्लिम पांच बार का दैनिक नमाज यहां नहीं पढ़ रहे थे।

वे सिर्फ जुमे की नमाज अदा कर रहे थे, वह भी पुलिस की निगरानी में।

एक अन्य साक्ष्य का हवाला देते हुए विवादित स्थल पर वजु के लिये व्यवस्था के अभाव को देखते हुए

उच्च न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि यहां लंबे समय से

नमाज नहीं अदा की जा रही थी और इसलिये यह मस्जिद नहीं रह गयी थी।



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