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दिल्ली के जनादेश से देश को मिलता नया संदेश

दिल्ली के जनादेश से यह स्पष्ट हो गया है कि अब देश के अन्य हिस्सों में भी राजनीति

और खास तौर पर चुनावी राजनीति का तेवर बदलेगा। सिर्फ काम के आधार पर वोट

मांगने वाली पार्टी के सफल होने के बाद इसका प्रभाव पूरे देश पर पड़ना तय है। यह अलग

बात है कि दिल्ली में आबादी का मिश्रण दरअसल पूरे भारत की आबादी का प्रतिनिधित्व

करता है। दूसरे राज्यों में यह स्थिति तो नहीं है लेकिन इन तमाम इलाकों से दिल्ली का

किसी न किसी रुप में जुड़ाव तो अवश्य है। रोजगार की तलाश में विभिन्न प्रांतों और

इलाकों से दिल्ली जाने वाले अपने गांव से नियमित संपर्क में रहते हैं।

ऐसे में दिल्ली में जो कुछ बदल रहा है, उसके आधार पर अपने इलाके में भी सामान्य

सुविधाओं का विस्तार तथा बेहतरी की मांग जनता के बीच लोकप्रिय होगी। दिल्ली के

जनादेश को इसलिए भी महत्वपूर्ण समझा जा रहा है क्योंकि इस चुनाव में भाजपा ने

अपने पुराने हथियार आजमाने के साथ साथ बड़े नेताओं की पूरी फौज ही मैदान में उतार

दी थी। इसके बाद भी अगर उसे यहां अपने फार्मूले से कामयाबी नहीं मिली तो उसे भी

अपनी रणनीति में तब्दीली करने की जरूरत महसूस होगी।

आम तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐसे निर्णायक अवसरों पर खुद को चुनावी राजनीति

से दूर ही रखता है। लेकिन भैयाजी जोशी के उस बयान की गंभीरता को समझा जाना

चाहिए। अपने बयान में श्री जोशी ने साफ शब्दों में कहा है कि हर राजनीतिक मोर्चे पर हिंदू

को जोड़ना उचित नहीं है। किसी बात पर किसी दल का विरोधी हिंदुत्व का विरोध तो कतई

नहीं हो सकता।

दिल्ली के घटनाक्रमों को भैयाजी जोशी के बयान से भी देखें

दिल्ली के संदर्भ में इस बयान को देखें तो स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है। श्री जोशी ने

पणजी में कहा है कि राजनीतिक लड़ाई अपने जगह पर है। इसे हिंदू के मुद्दे से बार बार

नहीं जोड़ा जाना चाहिए। भाजपा का विरोध करना हिंदुओं का विरोध करने के बराबर नहीं

है। उन्होंने कहा है कि हमें भाजपा के विरोध को हिंदुओं का विरोध नहीं मानना चाहिए। यह

एक राजनीतिक लड़ाई है जो चलती रहेगी। इसे हिंदुओं से नहीं जोड़ना चाहिए। हिंदू

समुदाय का मतलब भाजपा नहीं है। उनकी यह टिप्पणी संशोधित नागरिकता कानून

(सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों के

बीच आई है। जोशी ने कहा, एक हिंदू अपने साथी (हिंदू) के खिलाफ लड़ता है क्योंकि वे

धर्म भूल जाते हैं। यहां तक कि छत्रपति शिवाजी महाराज को भी अपने ही परिवार से

विरोध का सामना करना पड़ा था। जहां भ्रम और आत्मकेंद्रित व्यवहार होता है, विरोध

होता है। भैयाजी जोशी ने गिरजाघरों पर लोगों की अज्ञानता और गरीबी का फायदा

उठाकर ईसाई धर्म में धार्मांतरण कराने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि अगर कोई

अपनी इच्छा से ईसाई धर्म अपनाता है तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं लेकिन जबरन

धर्मांतरण को आपराधिक कृत्य माना जाना चाहिए।

यहां शाहीन बाग को केंद्र में रखकर भाजपा ने मतदान से पूर्व हिंदू और मुसलमान के

विभेद के आधार पर मत हासिल करने की चाल चली थी। ऐसे नहीं है कि लोग इसके प्रभाव

में नहीं आये हैं। लेकिन इतना कुछ करने के बाद भी अगर उसे अपेक्षित सफलता नहीं

मिली तो अब उस पुरानी चुनावी तकनीक को नजरअंदाज करने की मांग शायद भाजपा के

अंदर से भी उठेगी। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है वर्तमान भाजपा अपने

स्थापना काल के नीति सिद्धांतों से काफी अलग हट चुकी है।

सीट जीतने की लालच में भाजपा भी बदली है

कई अवसरों पर सिर्फ जीत की संभावना वाले अन्य दलों अथवा विचारधारा के लोगों को

टिकट देना भी इसी बदलाव का एक हिस्सा है। झारखंड के विधानसभा चुनाव में यह और

भी खुले तौर पर नजर आया है। इसके बाद भी अगर दिल्ली के जनादेश में हिंदू कार्ड का

प्रभाव कम रहा है तो आने वाले दिनों में अन्य राज्यों में भी काम का हिसाब मांगने की

प्रवृत्ति तेज होगी। ऐसी स्थिति में भाजपा चाहकर भी अपने चुनावी हथियार को नहीं

आजमा सकेगी, यह अपने आप में एक बड़ी बात है। दिल्ली के जनादेश की वजह से देश

की राजनीति के अब बदलने के भी आसार नजर आने लगे हैं। नागरिकता कानून के मुद्दे

पर केंद्रीय गृह मंत्री का बयान और कानून में वर्णित पेंचों का परस्पर विरोधी होना अपने

आप ही भाजपा को कटघरे में खड़ा कर रहा है। ऐसे में भाजपा को निश्चित तौर पर पार्टी के

अंदर से ही कई नई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। दिल्ली के जनादेश से यह स्पष्ट

हो गया है कि अगर जनता धैर्य के साथ अपनी बात पर अड़ी रही और सरकार सिर्फ अपने

काम के आधार पर वोट की मांग करे तो निरक्षर जनता भी ऐसे अवसरों पर भारतीय

लोकतंत्र में सही फैसला लेने का माद्दा रखती है।

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