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देश की राजनीति का महत्वपूर्ण मोड़ साबित होगी दिल्ली

देश की राजनीति फिलहाल जिस स्थान पर खड़ी है वहां केंद्रीय स्तर

पर   भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में कोई भी दल नहीं है।

प्रचंड बहुमत के साथ साथ संगठन की मजबूती की वजह से अन्य

तमाम विरोधी दल मिल कर भी भाजपा का मुकाबला नहीं कर सकते।

इसके बीच ही भाजपा कई  राज्यों का विधानसभा चुनाव हार चुकी है।

अब दिल्ली में विधानसभा का चुनाव होने जा रहा है। इस चुनाव की

खास बात यह है कि यहां भाजपा का मुकाबला अपेक्षाकृत नई पार्टी से

है। इस नई आम आदमी पार्टी ने इस बार के चुनाव में जो लकीर खींची

है, उसे लांघने की दिशा में भाजपा आगे बढ़ने की कोशिश तक नहीं कर

रही है। दरअसल सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के दावों को गलत

साबित करने की कोशिश भाजपा के द्वारा की गयी थी। लेकिन

प्रारंभिक चरण में भी उनके नेता गलतबयानी करते पकड़े गये।

दरअसल राष्ट्रीय मीडिया और खासकर अधिक लोकप्रिय टीवी चैनलों

से इस दल ने पहले से ही दूरी बना रखी है। पिछले चुनाव में इन तमाम

मीडिया घरानों ने इस अपेक्षाकृत छोटी पार्टी को कमतर साबित करने

की हर संभव कोशिश की थी। जिसका नतीजा था कि इस दल ने अपने

ही माध्यमों से  सोशल मीडिया में नये हथियार पैदा किये। अब 67

सीट जीतकर पांच वर्ष शासन चलाने के बाद दल के मुखिया अरविंद

केजरीवाल ने जो नई चुनौती पेश की है, उसका सामना भाजपा नहीं

कर पा रही है। अरविंद केजरीवाल ने चुनाव प्रचार प्रारंभ होते ही खुले

शब्दो में यह दावा कर दिया कि अगर उनकी सरकार ने पिछले पांच

वर्षो में जनता का काम किया है तो जनता उन्हें वोट दे।

देश की राजनीति में अनोखी पहल थी यह बात

अगर जनता को लगता है कि उनकी सरकार ने संतोषजनक तरीके से

काम नहीं किया है तो उन्हें वोट नहीं दे। दिल्ली के मतदाताओं के लिए

यह बिल्कुल नई बात थी। क्योंकि इससे पूर्व दिल्ली ने कांग्रेस और

भाजपा दोनों के शासन देखा है। साथ ही एक केंद्र शासित उप राज्य

होने के नाते सीमित अधिकारों वाले इस राज्य की सरकार को उप

राज्यपाल के माध्यम से हर काम में विलंब कराते भी जनता ने देखा

है। यही वजह है कि काम के लिए वोट मांगने की यह परंपरा अब

भाजपा के लिए भारी पड़ रही है। इसी बीच फिर से देश का बजट भी

प्रस्तुत किया जा चुका है। इन कारणों से अब दिल्ली के मतदाताओं

के पास विकल्प चुनने का आसान माध्यम मौजूद है। अब तक बिना

किसी बड़ी मीडिया घराने के प्रचार के बाद भी आम आदमी पार्टी ने

जनता के बीच अपने काम की बदौलत जो पैठ बनायी है, उसके आगे

भाजपा के दिग्गज घुटने टेकते नजर आ रहे हैं। काम के नाम पर वोट

मांगने के रास्ते पर वह जाना तक नहीं चाहते जबकि अरविंद

केजरीवाल और उनकी पार्टी बार बार उसी मैदान में भाजपा और

कांग्रेस को खींच लाती है। यहां तक कि अपने पांच वर्षों के लिए इसी

पार्टी ने अपना नया कार्यक्रम भी जारी कर दिया है। इसका नतीजा है

कि काम के आधार पर दलों के मूल्यांकन का पहला परीक्षण दिल्ली

विधानसभा के चुनाव में होने जा रहा है। ऐसा नहीं है कि भाजपा ने

लड़ाई को दूसरे मोर्चे पर धकेल देने की कोई कोशिश नहीं की थी।

दिल्ली दरअसल पूरा मिला जुला देश जैसा ही है

अमित शाह के नेतृत्व में लड़ी जाने वाली इस लड़ाई में बार बार भारत-

पाकिस्तान, हिंदू -मुसलमान और कुप्रचार के अन्य हथियार निश्चित

तौर पर आजमाये गये। लेकिन यह समझ लेना होगा कि दिल्ली के

मतदाता एक समग्र भारत की सांस्कृतिक स्थिति में हैं। विभिन्न

राज्यों के गये लोगों के बीच सिर्फ काम के नाम पर वोट मांगने की

वजह से जनता को भी सिर्फ काम के आधार पर मूल्यांकन की यह

खुली छूट मिली है। अब अगर यहां फिर से आम आदमी पार्टी चुनाव

जीत जाती है, जिसका प्रवल संभावना बनती दिखाई पड़ रही है। जो

आने वाले दिनों में अन्य राज्यों में भी काम पर वोट मांगने अथवा

पार्टियों के मूल्यांकन करने की नई प्रथा चल पड़ेगा। भाजपा के लिए

संकट का विषय यह है कि काम के नाम पर वोट मांगने की इस

प्रथा में उसे अपने पुराने वादों के आधार पर हासिल उपलब्धि बताने के

लिए ज्यादा कुछ नहीं है। जो काफी बड़े मसले देश के थे उनसे भी

भाजपा के पास उपलब्धि का खाता लगभग शून्य है। नोटबंदी और

जीएसटी की मार झेलते देश में अन्य तर्कों से जनता कतई संतुष्ट नहीं

है। वैसे यह समझ लिया जाना चाहिए कि केंद्रीय नेता के तौर पर

नरेंद्र मोदी अब भी देश की एकमात्र पसंद हैं। लेकिन क्या दिल्ली

चुनाव के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की पकड़ पार्टी में कायम रह

पायेगी, यह बड़ा सवाल खुद भाजपा के अंदर उभर चुका है।

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