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उम्र को मात देने का सुराग मिला स्पेस स्टेशन गये चूहों से

  • अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन पर हुआ प्रयोग

  • सारे चूहों को एक जैसा ही भोजन मिला

  • अंतरिक्ष की यात्रा में भी मदद मिलेगी

  • इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर भी जारी है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः उम्र को मात देने की लालसा इंसान में काफी अरसे से रही है। साथ ही इसके साथ

साथ यह भी एक स्वाभाविक इच्छा है कि वह जबतक जीवित रहे स्वस्थ रहे और उम्र का

कोई असर उस पर नहीं दिखे। अब जाकर इस शोध में नई रोशनी दिखाई पड़ी है। यह

सुराग भी पृथ्वी से नहीं बल्कि अंतरिक्ष से आया है। पृथ्वी के बाहर काफी ऊंचाई पर

स्थापित अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन के चूहों पर चल रहे प्रयोग में इसका राज पता चला है।

खास मकसद से इस आइएसएस पर चूहों के एक दल को भेजा गया था। अब उनकी

दिनचर्या और इतन दिनों के अंतरिक्ष प्रवास के बाद एक प्रोटिन का पता चला है जिसका

सीधा संबंध उम्र से हैं। जापान की अंतरिक्ष एजेंसी जाक्सा और तोहोकू विश्वविद्यालय के

शोध दल ने इस बारे में अपनी जानकारी सार्वजनिक की है। एरिथ्रोयज 2 नाम के एक

प्रोटिन को उम्र को मात देने के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। इसके अंतर से चूहों के अंदर

उम्र बढ़ने की प्रक्रिया कम करने में सफलता मिली है। इन चूहों के अंदर जैविक परिवर्तन

भी देखे गये हैं। यह देखा गया है कि इसके प्रभाव से चूहों के शरीर के अंदर एंटीऑक्सीडेंट

की प्रक्रिया तेज होती है। इसके अलावा एनआरएफ 2 नामका न्यूक्लीयर फैक्टर भी तनाव

बढ़ाने अथवा कम करने में एक स्विच के जैसा काम करता है। प्रयोग के तहत एक दर्जन

चूहों को स्पेस एक्स फॉल्कन रॉकेट के जरिए भेजा गया था।

उम्र को मात देने में जेनेटिक संशोधन के चूहे काम आये

अंतरिक्ष भेजे गये चूहों में से आधे के पास यह एनआरएफ2 प्रोटिन नहीं था। लिहाजा

जेनेटिक तौर पर संशोधित चूहों के साथ उनकी तुलना आसान हो गयी थी। यह देखा गया

कि जिन चूहों के पास यह प्रोटिन नहीं था उनमें उम्र का असर तुलनात्मक तौर पर अधिक

होता चला गया। यहां तक कि सामान्य चूहों के खून की संरचना में भी बदलाव देखे गये।

ठीक उसी स्थान पर रखे गये जेनेटिक संशोधन वाले चूहों पर उम्र का बहुत कम असर देखा

गया। इसी आधार पर यह नतीजा निकाला गया है कि इस खास प्रकार की प्रोटिन का

रिश्ता उम्र के प्रभाव से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।

तोहोकू विश्वविद्यालय के प्रोफसर मासायूकी यामामोटो ने कहा कि इससे साबित हो गया

है कि इंसान के अंदर भी उम्र को मात देने का रास्ता इसी प्रोटिन की वजह से पड़ता है।

प्रोफसर यामामोटो इस शोध दल के नेता भी हैं। इसी आधार पर यह माना जा रहा है कि

अब इसी प्रोटिन पर आधारित चिकित्सा पद्धति की मदद से इंसानों के उम्र जनित

बीमारियों पर भी नियंत्रण पाया जा सकेगा। इसकी मदद से अलजाइमर औऱ मधुमेह से

होने वाली परेशानियों के साथ साथ भविष्य में अंतरिक्ष की यात्रा में भी बड़ी मदद मिल

सकती है।

अंतरिक्ष में इंसान पर विकिरणों का कुप्रभाव पड़ता है

इससे पहले के अनुसंधानों में यह पता चल चुका है कि अंतरिक्ष में जाने के बाद इंसान की

शारीरिक संरचना में भी काफी कुछ अंदर से बदल जाता है। यहां तक कि एक जुड़वा

भाइयों के बीच हुए परीक्षण में यह पाया गया है कि अंतरिक्ष से लौटे भाई की जेनेटिक

संरचना में भी तब्दीली आ चुकी है। चूहों को इसके तहत एक जैसा भोजन भी दिया गया

था लेकिन उनके अंदर यह प्रभाव दर्ज किया गया। अंतरिक्ष अनुसंधान में जाने वाले

अंतरिक्ष यात्रियों पर पड़ने वाले विकिरण के प्रभाव की जानकारी होने की वजह से ही यह

माना जा रहा है कि इस प्रोटिन के आधार पर उन्हें भविष्य में कई किस्म की परेशानियों से

बचाया जा सकेगा। साथ ही सुदूर की यात्रा में जाने वालों पर उम्र का प्रभाव भी बहुत कम

पड़ेगा।


 

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