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बर्फ की घनी चादरों के नीचे हैं पृथ्वी की सबसे गहरी खाई

  • किसी ने उम्मीद नहीं की थी कि यहां ऐसा इलाका भी होगा
  • बर्फ पिघली तो समुद्री जलस्तर दो सौ फीट बढ़ेगा
  • मारियाना ट्रेंच है समुद्र का सबसे गहरा इलाका
  • बर्फ की मोटी चादरों के बीच शोध कम हुआ
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः बर्फ की घनी चादरों के नीचे कोई ऐसा राज भी हो सकता है,

इसकी कल्पना वैज्ञानिकों ने नहीं की थी। जब अत्याधुनिक उपकरणों

से इसकी जांच की गयी तो यह नया राज खुला है। पूर्वी अंटार्कटिका के

डेनेमन ग्लेशियर के पास यह इलाका खोजा गया है। आधुनिक

उपकरणों से जो आंकड़े सामने आये हैं, उसके मुताबिक यह इलाका

करीब साढ़े तीन किलोमीटर गहरा है। इससे पूर्व पृथ्वी के सबसे गहरे

इलाके के बारे में यही अनुमान था कि पृथ्वी का यह गहरा इलाका

समुद्र के अंदर मारियाना ट्रेंच है। लेकिन वह समुद्र के नीचे की गहराई

का नाप है। पृथ्वी की जमीन के ऊपर गहराई वाले इलाके में पहली बार

अंटार्कटिका के इस क्षेत्र का पता चला है। दक्षिणी ध्रुव के इलाकों पर

जारी शोध के बीच यह आंकड़ा सामने आया था। इन्हीं आंकड़ों के

विश्लेषण के बाद इस गहराई का पता चल पाया है। इसके पहले पृथ्वी

का सबसे गहरा इलाका महज 413 मीटर का पाया गया था, जो

समुद्र तल के नीचे थे और यह स्थान मृत सागर के छोर पर अवस्थित

था।

बर्फ की वजह से कम गहरा इलाका ही मानते थे 

जिस स्थान को जमीन के ऊपर का सबसे गहरा इलाका के तौर पर

पहचाना गया है, उसके बारे में पूर्वानुमान कुछ और ही था।  इस इलाके

के बनावट के आधार पर वैज्ञानिक खुली आंखों से इसे सतही इलाका

ही मान रहे थे।  आधुनिक उपकरणों से जब रेडियो संदेश के जरिए

मिट्टी की अंदर स्थिति की जांच की गयी तो यह भ्रम टूटा। दरअसल

यह एक खाई जैसी जगह है, जो साढ़े तीन किलोमीटर अंदर तक गयी

है। यह इलाका भी समुद्र के अंदर डूबा हुआ है। कई विश्वविद्यालयों के

शोध वैज्ञानिक यहां की तमाम परिस्थितियों का गहन अध्ययन कर

रहे हैं। दरअसल वे सभी दुनिया के पर्यावरण में हो रहे बदलाव और

उसके समाधान के रास्ते तलाशने के काम में जुटे हुए हैं। इसी क्रम में

इस इलाके में पहली बार इस किस्म का आंकड़ा एकत्रित किया गया है।

वरना जांच नहीं होने तक इसे औसत कम गहराई वाला इलाका ही

माना जाता रहा है। जिस मशीन के माध्यम से इस गहराई वाले इलाके

का मैप तैयार किया गया है, उसे वैज्ञानिकों ने बेड मेशिन अमेरिका का

नाम दे रखा है। इसी मशीन की मदद से गहराई का पता चला है।

किसी को अंदाजा भी नहीं था कि यहां कुछ ऐसा होगा

ग्लोबल वार्मिंग के लिए तमाम किस्म के आंकड़ों को एकत्रित करने के

क्रम में जब इस इलाके में अनुसंधान चलाया गया तो गहराई का पता

चला। अब आंकड़ों के विश्लेषण के बाद वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे

हैं कि समुद्र के अंदर यह इलाका भी किसी गहरे खाई की तरह है। पहले

इस इलाके में इतने गहरे किसी खाई जैसे स्थान के होने की कोई

उम्मीद भी नहीं की गयी थी। ऊपरी बनावट की वजह से वैज्ञानिक इसे

सतही गहराई वाला इलाका मान रहे थे। काफी ठंडा इलाका होने की

वजह से समुद्र की गहराई में यहां किसी ने अंदर झांककर देखने का

प्रयास भी नहीं किया था।

नई मशीन ने रेडियो तरंग से गहराई नापी और बताया

नई मशीन ने गहराई के इलाकों में ध्वनि संकेत से प्राप्त आंकड़ों के

आधार पर जब गहराई के नहीं नजर आने वाले इलाकों का मैप तैयार

किया तब जाकर वैज्ञानिकों को इस गहराई का पता चल पाया है।

इस शोध से जुड़े कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के डॉ मैथ्यू मोरलिघेम

कहते हैं कि इस नये आंकड़ों का विश्लेषण भी किया जाएगा ताकि

ग्लोबल वार्मिंग के मूल शोध में इसके प्रभाव को जोड़ा जा सके। बर्फ

की मोटी चादरों के नीचे कोई इतना गहरा इलाका भी हो सकता है,

इसकी उम्मीद पहले नहीं की गयी थी। उन्होंने कहा कि पहले भी ध्वनि

संकेत के माध्यम से पहले भी यहां आंकड़ा एकत्रित करने का काम

किया गया है। लेकिन इससे पहले कभी इस गहराई वाले इलाकों तक

शायद कोई रेडियो संदेश नहीं पहुंच पाया था। इसी वजह से वहां की

गहराई की नाप भी नहीं हो सकी थी।

पहले शायद इस खाई तक नहीं पहुंचे थे रेडियो संदेश

अब पृथ्वी की गहराई में साढ़े तीन किलोमीटर से रेडियो संकेत के

वापस लौटने के बाद वैज्ञानिकों का माथा ठनका है। वे नये सिरे से पूरे

इलाके की और गहन छानबीन कर रहे हैं। वैज्ञानिकों का यह भी

मानना है कि पहले इस इलाके की गहन शोध इसलिए भी नहीं हो पायी

होगी क्योंकि यहां समुद्र के ऊपर बर्फ की मोटी मोटी चादरें तैरती रहती

है। यहां के छोटे पहाड़ों पर भी बर्फ की मोटी मोटी पर्ते चढ़ने की वजह

से उनकी ऊंचाई काफी अधिक नजर आती है। दरअसल में इन छोटे

पहाड़ों के ऊपर ढेर सारी बर्फ की चादर मौजूद है। वैज्ञानिक यह मान

रहे हैं कि इस इलाके में इतना बर्फ मौजूद है कि यह अगर किसी वजह

से पिघल गया तो समुद्र का जलस्तर करीब दो सौ फीट तक ऊंचा उठ

जाएगा। उससे पूरी दुनिया में तबाही आ जाएगी। ग्लोबल वार्मिंग की

वजह से समुद्र का तापमान बढ़ने की वजह से बर्फ के पिघलने की गति

तेज होते जाने की वजह से यह खतरा दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है।

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