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बैंकों की घटती विश्वसनीयता के लिए भी सरकार जिम्मेदार

बैंकों की घटती साख इनदिनों चिंता का विषय है। दरअसल लगातार ऐसे सरकारी फैसले

ही लिये गये हैं, जिससे जनता के बीच भारत के सार्वनिक बैकों के बारे में गलत संदेश गया

है। आम आदमी अब बैकों पर भरोसा उतना नहीं रख पा रहा है, जितना पहले कभी हुआ

करता था। दरअसल बड़े कर्जदारों के भाग जाने और बड़े बकायेदारों के प्रति सरकारी रुख

की वजह से जनता को ऐसा महसूस हो रहा है कि उनका पैसा सिर्फ बैंक के लोगों को वेतन

देने और बड़े लोगों का कर्ज माफ करने में खर्च हो रहा है। बड़े कर्जदारों के मामलों में यह

स्पष्ट है कि ऐसे कर्ज बिना सरकारी सहमति के जारी नहीं किये जाते। वैसे भी अधिक

रकम के कर्ज के लिए जो कागजी कार्रवाई होती है, उसमें हर कदम पर सरकारी स्वीकृति

भी आवश्यक होती है। ऐसे में अगर लगातार बैंकों का पैसा ऐसे बड़े कर्जों में डूबता जा रहा

है तो वैसी परियोजनाओं को स्वीकृति देने वाले विभागों और सरकारी संस्थानों पर भी

जनता का भरोसा कम होना स्वाभाविक है। बैंकिंग क्षेत्र अपनी बदकिस्मती को दूर कर

पाने में नाकाम नजर आ रहा है। वर्षों तक प्रदर्शन में सुधार से जो बेहतरी हासिल होती है

वह किसी न किसी बाहरी झटके से नष्ट होती नजर आती है। सुधार के बाद के दौर में यानी

सन 1996-97 में इस क्षेत्र का फंसा हुआ कर्ज 16 फीसदी था। आज जब विश्लेषक बैंकिंग

क्षेत्र को लेकर भविष्यसूचक ढंग से बात करते हैं तो इस आंकड़े को ध्यान में रखना भी

आवश्यक है। तेज आर्थिक वृद्धि और सरकारी बैंकों में अपनाए गए सुधारों ने इस क्षेत्र की

हालत सुधारने में मदद की। एक दशक बाद सन 2007 में फंसे हुए कर्ज का स्तर घटकर

2.6 फीसदी रह गया।

बैकों की घटती साख को बढ़ा गया वैश्विक वित्तीय संकट

इसके बाद वैश्विक वित्तीय संकट का आगमन हुआ। मानो इतना ही काफी न था कि

अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों को लेकर अदालतों से नकारात्मक निर्णय आने शुरू हो गए

और परिसंपत्ति गुणवत्ता की समीक्षा होने लगी। सन 2017-18 तक फंसे हुए कर्ज का

स्तर दोबारा बढ़कर 11 फीसदी पहुंच गया। यह अपने आप में बैंकिंग क्षेत्र के लिए संकट

का संकेत था।

फंसे कर्ज की पहचान और उसके निस्तारण को लेकर किए गए प्रतिबद्ध प्रयासों की

बदौलत सन 2019-20 में इसका स्तर एक बार पुन: घटकर 8.5 फीसदी रह गया। महामारी

ने अर्थव्यवस्था को नए सिरे से झटका दिया है और भारतीय रिजर्व बैंक की वित्तीय

स्थिरता रिपोर्ट (जुलाई 2020) के मुताबिक यह एक बार फिर बढ़कर 12.5 फीसदी से 14.7

फीसदी पहुंच सकता है। ऋण पुनर्गठन का ताजा प्रयास इन आशंकाओं को ही दूर करने का

प्रयास है। इसके तहत फंसे हुए कर्ज से निपटने के व्यापक प्रयासों में बदलाव देखने को

मिला। महामारी के आगमन के पहले पूरा ध्यान फंसे हुए कर्ज की पहचान और उसका

ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) के जरिये निस्तारण करने तथा

बैंकों का आवश्यकतानुसार पुनर्पूंजीकरण करने पर केंद्रित था। शक्तिकांत दास के

आरबीआई गवर्नर बनने के बाद आरबीआई के रुख में बदलाव आने लगा। जनवरी 2019

में आरबीआई ने सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रमों (एमएसएमई) के लिए एकबारगी

पुनर्गठन योजना की शुरुआत की जो 31 मार्च, 2020 तक वैध थी। बाद में इस योजना को

31 दिसंबर, 2020 तक बढ़ा दिया गया।

कोरोना महामारी के दौरान बट्टा खाता का मामला भी आया

महामारी के बाद आईबीसी की प्रक्रिया को एक वर्ष के लिए स्थगित कर दिया गया। बैंकों

के नेतृत्व में पुनर्गठन की प्रक्रिया की वापसी हो चुकी है। ऐसा गत अगस्त में रिजर्व बैंक

की नई योजना के तहत हुआ जो 7 जून, 2019 के पुनर्गठन दिशानिर्देशों पर आधारित है।

ये दिशानिर्देश 24 फरवरी, 2018 के उस परिपत्र का संशोधित रूप हैं जिसे सर्वोच्च

न्यायालय ने निरस्त कर दिया था। अगस्त में पेश की गई योजना में कई शर्तें हैं। यह

योजना केवल उन फर्म पर लागू होती है जो महामारी से प्रभावित हैं। योजना उन कंपनियों

पर लागू नहीं होगी जो 31 मार्च, 2020 की तिथि से 30 दिन से ज्यादा पहले डिफॉल्ट हुई

होंगी। 100 करोड़ रुपये मूल्य से अधिक के सभी प्रस्तावों को एक स्वतंत्र एजेंसी की पुष्टि

की आवश्यकता होगी जबकि 1,500 करोड़ रुपये से अधिक के प्रस्ताव आरबीआई द्वारा

गठित केवी कामत समिति की जांच से गुजरना होगा। निस्तारण ढांचे के अधीन ऋण की

अवधि को दो वर्ष से अधिक आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। बैंकों को निस्तारण अर्हता तय

करने के लिए 31 दिसंबर, 2020 तक का समय दिया गया है। व्यक्तिगत और

एमएसएमई ऋण 31 मार्च, 2021 तक निस्तारित करने होंगे और कॉर्पोरेट ऋण 30 जून,

2021 तक। इनके जरिए जनता के बीच भरोसा कायम करने की कवायद फिर से बड़े

कर्जदारों की कर्जमाफी से ध्वस्त हो चुकी है क्योंकि इस कर्जमाफी को सरकार बट्टा खाता

में रकम को डालने का बताकर अपनी गलती छिपा रही है।


 

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