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नारायणगंज मसजिद विस्फोट में मरने वालों की संख्या बढ़कर 31

  • पूरे इलाके में शोक का माहौल

  •  जब कभी रोने की आवाज गूंजती है

  •  मसजिद के नीचे नहीं थी गैस लाइन

अमीनूल हक

ढाकाः नारायणगंज मसजिद में हुए विस्फोट से मरने वालों की संख्या बढ़कर 31 हो गयी

है। इतने सारे लोगों के मारे जाने की वजह से पूरे इलाके में शोक का माहौल व्याप्त है।

वीडियो में देखिये वहां का माहौल

इलाके से गुजरते वक्त कभी भी किसी घर से रोने की आवाज आने लगती है। इतने सारे

लोगों की मौत के बाद मृतकों की शांति के लिए स्थानीय मसजिद में विशेष प्रार्थना सभा

का भी आयोजन किया गया है। नारायणगंज के तल्लाबाग इलाका का यही दृश्य है। हर

तरफ शोक के लिए काला झंडा भी लहराता हुआ नजर आता है। हर तरफ मरने वालों के

प्रति सम्मान व्यक्त करने के बैनर भी टंगे हुए हैं।

यहां के विस्फोट के आज आठ दिन पूरे हो गये हैं। अब भी पांच लोगों की हालत गंभीर है।

इलाके के हर मसजिद में विशेष प्रार्थना सभाओं के आयोजन का क्रम जारी है।

इस बीच तितास गैस कंपनी के बयान ने भी स्थानीय लोगों को नाराज कर दिया है। इस

गैस कंपनी ने दलील दी थी कि गैस पाइप लाइन के ऊपर ही मसजिद का निर्माण किया

गया था। स्थानीय लोगों ने कहा कि नारायणगंज की इस मसजिद का निर्माण करीब तीस

वर्ष पूर्व किया गया था। तितास गैस की पाइप लाइन सलन 2000 के बाद की है। इसलिए

गैस पाइप लाइन के ऊपर मसजिद बनाने की बात गलत है। स्थानीय लोग मानते हैं कि

इस किस्म की अनर्गल दलील देकर कंपनी अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है। लोगों ने

कहा कि मसजिद ने अपनी जमीन दी थी तभी गैस के पाइप लाइन को ले जाना संभव हुआ

है। अचानक मसजिद के अंदर विस्फोट होने की वजह से आग की लपटें सामने की एक

लॉंड्री तक जा पहुंची थी। मसजिद के अंदर जो मौजूद थे सभी इस भीषण आग की चपेट में

आ गये थे।

नारायणगंज मसजिद की घटना की प्रत्यक्षदर्शी भी आग से जली

घटना के वक्त दवा खरीदकर अपने घर लौट रही थी सलमा बेगम। आग से वह भी झुलस

गयी हैं। शरीर के अनेक हिस्सों में आग से जल जाने का जख्म है। घटना की जानकारी

पाकर वहां भागकर आये थे सामाजिक कार्यकर्ता आलम विप्लव। वहां अपने सहयोगियों

के साथ संकरी गली से घायलों को बाहर खड़े एंबुलेस तक लाते रहे। पहले स्थानीय

अस्पताल और फिर ढाका के शेख हसीना बर्न एवं प्लास्टिक सर्जरी इंस्टिट्यूट में उन्हें

भेजा गया है। आलम ने अब तक पहले ही झटके में 17 लाशों को दफनाने का काम किया

है। उसके बाद मरने वालों के परिवारों तक भोजन पहुंचाने की जिम्मेदारी भी निभा रहे हैं।

लेकिन नारायणगंज का यह इलाका अब भी लगातार रो रहा है।


 

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