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नदियों में बहती लाशों का सच ही असली कहानी बयां करती

नदियों में बहती लाशों की अब हर तरफ से शिकातयतें मिलने लगी हैं। पहले सिर्फ गंगा में

लाश बहाने की जानकारी सार्वजनिक हुई थी। अब तो देश की अन्य नदियों से भी लाबारिश

लाशों के बहते जाने की सूचनाएं आम हो चुकी हैं। इससे समझा जा सकता है कि देश किस

आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के बीच से गुजर रहा है। हर बात पर राष्ट्रवाद की

दुहाई देने वाले इस मुद्दे पर चुप है क्योंकि उन्हें भी पता है कि ऐसी हालत क्यों आयी है।

यह अलग बात है कि राजनीतिक निष्ठा की अंधभक्ति में बंधे लोग इस सच को अपने मुंह

से स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में आखिर

अचानक इतनी बड़ी संख्या में नदियों में तैरती हुई लाशें कैसे सामने आईं यह अभी तक

रहस्य बना हुआ है। बिहार के बक्सर में गंगा नदी में बहती हुई कई लाशों के मिलने के कई

दिनों बाद भी अभी तक प्रशासन ने इस बात की पुष्टि नहीं की है कि लाशें कोविड-19 से

संक्रमित थीं या नहीं। मंगलवार 11 मई को बक्सर के एक गांव में नदी किनारे मिले दर्जनों

शव बरामद करने के बाद जिला प्रशासन ने वहां नदी में एक बड़ा जाल लगा दिया था।

बुधवार को इस जाल में कम से कम पांच शव और मिले। इस तरह मिलने वाले शवों की

कुल संख्या 81 हो गई है और प्रशासन का कहना है कि सभी के जांच सैंपल और डीएनए

सैंपल लेकर उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया है। बिहार और उत्तर प्रदेश के

अधिकारियों के बीच झगड़ा इस बात पर हो रहा है कि लाशें बिहार के लोगों की थीं या

उत्तर प्रदश की या कहीं और दूर से बह कर आई थीं।

नदियों में बहती लाशें परिस्थितियों को दर्शा रही है

बिहार के जल संसाधन मंत्री संजय झा ने कहा है कि शवों के पोस्टमार्टम के बाद पता चला

कि वो कम से कम 3-4 दिन पुराने हैं, जिसका मतलब है कि वो कहीं दूर से बह कर आए हैं।

उन्होंने यह भी कहा है कि बिहार में शवों को पानी में बहा देने की कोई प्रथा नहीं है। दूसरी

तरफ औरेया जिले में यमुना में कई अधजले शव दिखे। जानकारी के मुताबिक औरैया

जिले में श्मशान घाट पर लोग शवों को पूरा जलने से पहले अधजला ही पानी में बहा दे रहे

हैं। औरैया के शेरगढ़ घाट के किनारे पड़े शव कुत्ते नोंच रहे हैं, जिससे संक्रमण फैलाने का

खतरा बना हुआ है। औरैया के यमुना नदी के शेरगढ़ घाट पर एक ओर कई चिताएं जलती

नजर आ रही हैं, तो वही दूसरी ओर यमुना नदी में शव बहते दिखे रहे हैं। शेरगढ़ घाट पर

मौजूद देखरेख करने वाले शख्स ने बताया कि प्रतिदिन 8 से 10 लोगों का अभी अंतिम

संस्कार हो रहा है। लोग शव को अधजला छोड़ कर ही चले जाते हैं। वहीं कई लोग हैं जो

जल्दबाजी में शवों को अधजला ही यमुना में प्रवाहित कर देते हैं। कुछ दिन पहले तक 20-

25 शवों का प्रतिदिन अंतिम संस्कार होता था। कोई अगर देखरेख न करे तो कुत्ते भी शवों

को खींच ले जाते हैं। वहीं घाट के पुरोहित ने कहा कि मना करने के बाद भी लोग शवों को

पानी में अधजला फेंक कर चले जाते हैं। श्मशान घाट पर ऐसे लोगों का अंतिम संस्कार भी

हो रहा है जो कई दिनों से बुखार से पीड़ित थे और उनमें कोरोना के लक्षण थे। गुरुवार को

प्रशासन ने घाट की साफ-सफाई कराने के बाद से अधजले शवों को यमुना में बहाने पर

सख्ती से रोक लगा दी है।

देश के अन्य राज्यों के लोगों की भी यही मजबूरी

बीते 4 दिनों से बिहार के बक्सर से शुरू हुआ सिलसिला यूपी के गाजीपुर, बलिया, बनारस

और चंदौली तक पहुंच गया है। यहां लगातार गंगा नदी में लाशें बहती नज़र आ रही हैं।

इसके आलावा गंगा के किनारे उन्नाव में सैंकड़ों शव दफनाए हुए मिले थे। इसके पीछे का

असली सच तो यही है कि कोरोना अथवा सामान्य बीमारी से मरे लोगों के परिजनों के पास

अभी दाह संस्कार तक के पैसे नहीं हैं। इसी वजह से या तो अधजली लाशों को या बिना

जली लाशों को नदियों में बहाया जा रहा है। कई स्थानों पर नदी तट पर बालू खोदकर

दफनाये गये शव भी जल प्रवाह के साथ आगे बह रहे हैं। दरअसल सच यह है कि दाह

संस्कार बहुत महंगी प्रक्रिया बन गई है। यही कोरोना की दूसरी लहर के पीड़ित ग्रामीण

भारत का असली सच है। इस सच को स्वीकारने में सरकारों को भले ही परहेज हो लेकिन

ग्रामीण इलाकों से जुड़े लोग बहुत अच्छी तरह वहां की परिस्थितियों से वाकिफ हैं और

मानते हैं कि अत्यधिक मजबूरी में ही लोग ऐसा कदम उठाने पर विवश हो रहे हैं।

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