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समुद्री ज्वालामुखियों के पास रहता है अजीब किस्म का जीवन

समुद्री ज्वालामुखियों के पास रहता है अजीब किस्म का जीवन

रासायनिक तत्वों को बैक्टेरिया को भोजन बनाते हैं

जलज सुक्ष्म जीवन में कई सूर्य से ऊर्जा नहीं लेते 

प्रशांत महासागर की गहराई में हैं बुलबुले

वहां सूर्य की रोशनी पहुंच भी नहीं पाती 

राष्ट्रीय खबर

रांचीः समुद्री ज्वालामुखियों के विस्फोट वाले इलाकों में नये किस्म की जीवन रहता है।

समुद्र की गहराई में जारी शोध के दौरान उत्तर पूर्वी प्रशांत महासागर की गहराइयों में

इसका पता चला है। समुद्र के गहरे पानी में रहने वाले इस जीवन तक सूर्य की रोशनी नहीं

पहुंचती है। इस लिहाज से यह माना जा सकता है कि वहां के वनस्पति सूर्य की रोशनी से

होने वाले फोटो संश्लेषण की विधि से विकसित नहीं हो रहे हैं। आम तौर पर यह माना

जाता है कि किसी भी वनस्पति के जीवन की गाड़ी आगे बढ़ने के लिए फोटो संश्लेषण

विधि से सूर्य की रोशनी से ऊर्जा सोखकर उसे अपने विकास में खर्च करना एक प्राकृतिक

विधि है। वैसे अन्य जीवन के विकास में भी सूर्य किरणों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है

और उन किरणों के अभाव में इंसानी शरीर भी कई किस्म की विसंगतियों का शिकार हो

जाता है। लेकिन प्रशांत महासागर की उस गहराई में समुद्री ज्वालामुखियों  केपास जो

जीवन पनप रहा है, वहां तक तो सूर्य की रोशनी पहुंचती ही नहीं है। इसके बाद भी जीवन

का विकास यह साफ कर देता है कि वहां जीवन के विकास का कारण शायद वहां

ज्वालामुखी विस्फोट और उसके बाद के गर्म बुलबुले ही हैं। इतनी अधिक गहराई में अनेक

स्थानों पर ऐसे गर्म पानी के बुलबले समुद्री तल पर उठते नजर आये हैं। वहां के आस पास

समुद्री जलज होने की वजह से यह माना जा रहा है कि इन बुलबुलों में ही ऐसे जीवन की

कुंजी है। वरना इतनी अधिक गहराई में, जहां सूर्य की रोशनी ही नहीं पहुंचती है, फोटो

संश्लेषण से ऊर्जा हासिल करने का कोई आधार नहीं है।

समुद्री ज्वालामुखियों के इलाकों में निकलते हैं रासायनिक बुलबुले

वहां पर जो बुलबले निकल रहे हैं, उनके बारे में अनुमान है कि कभी समुद्र के अंदर

ज्वालामुखी विस्फोट के बाद वहां नीचे मौजूद गैस इसके जरिए बाहर निकल रहे हैं। शायद

इसके साथ नीचे का खनिज भी बाहर आकर यहां के जीवन के लिए ऊर्जा प्रदान कर रहा है।

वैज्ञानिक परिभाषा में इन्हें हाइड्रोथर्मल वेंट कहा जाता है, जिनसे तरल भी निकल रहे हैं।

इस दृश्य को काफी गहराई के गोरदा रिज के पास देखा गया है। इस आधार पर वैज्ञानिक

मान रहे हैं कि यहां का सुक्ष्म जीवन रासायनिक बैक्टेरिया को ही बतौर भोजन ग्रहण कर

रहा है। शोध को आगे बढ़ाते हुए वैज्ञानिकों ने यह पता लगाया है कि ऐसे रासायनिक

बैक्टेरिया का 28 से 62 प्रतिशत तक वहां मौजूद प्रोटिस्ट्स का भोजन के काम आता है।

समुद्री ज्वालामुखियों के करीब और समुद्र की गहराई में भी कार्बन के रिसाइक्लिंग का

काम चलता रहता है। जिस जगह पर यह शोध किया गया है वह दक्षिणी ओरेगन से करीब

दो सौ किलोमीटर की दूरी पर है। वहां से हर किस्म का नमूना खास उपकरण की मदद से

एकत्रित करने के बाद प्रयोगशाला में उनका विश्लेषण किया गया है। उसी विश्लेषण के

आधार पर यह निष्कर्ष निकलकर सामने आया है। इस किस्म का रासायनिक भोजन

ग्रहण करने वाले जीवन की संरचना भी धरती के आम जीवन से भिन्न माना गया है।

रासायनिक भोजन ग्रहण करने वालों का जीवन चक्र भी भिन्न

इस बारे में शोध करने वाले वूड्स होले ओशनोग्राफिक इंस्टिट्यूट के समुद्री रसायन और

जिओ कैमिस्ट्री विभाग के शोध कर्ता साराह हूं कहते हैं कि दरअसल में इन सुक्ष्म जीवन

के भोजन चक्र को पूरी तरह समझना भी कठिन है क्योंकि वे आम जीवन से बिल्कुल

भिन्न हैं। लेकिन इस प्रक्रिया को समझने की कोशिश की जा रही है। दरअसल पृथ्वी पर

इंसानों के लिए तेजी से बढ़ते भोजन संकट के बीच समुद्री जीवन से खास तौर पर वहां के

पेड़ पौधों से हम क्या भोजन के लायक हासिल कर सकते हैं, इस पर शोध हो रहा है ताकि

खेती से उपजने वाले अनाज का बेहतर और पौष्टिक विकल्प खोजा जा सके। समुद्री खर

पतवार को खास प्रक्रिया के तहत इंसानी भोजन के लायक बनाने का काम पहले से ही

प्रगति पर है। फिर भी बिना सूर्य की रोशनी से समुद्री ज्वालामुखियों के पास पनप रहे

जीवन को भोजन जिस तरीके से हासिल हो रहे हैं, वह जानना महत्वपूर्ण हो गया है।

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