महाकाश में जबर्दस्त किस्म की सौर आंधियों का दौर जारी

महाकाश में जबर्दस्त किस्म के सौर आंधियों का दौर जारी
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  • पृथ्वी पर कभी भी पड़ सकता है विनाशकारी असर

  • ध्वनि तरंग के संचार साधन हो जाएंगे ध्वस्त

  • दुनिया भर की तकनीकी सेवा पर पड़ेगा असर

  • 26 सौ साल पहले भी आयी थी आंधी

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः महाकाश यानी अंतरिक्ष में अजीब किस्म की खतरनाक सौर आंधियां चल रही हैं।

पृथ्वी का वायुमंडल इन आंधियों के प्रभाव को पृथ्वी तक पहुंचने से रोक देता है।

लेकिन आंधियों की तीब्रता की वजह से वैज्ञानिक मान रहे हैं कि कभी भी यह बाधा टूट सकती है।

उस स्थिति में पृथ्वी पर अचानक ही इन सौर आंधियों की वजह से तबाही भी आ सकती है।

वैज्ञानिको ने स्पष्ट कर दिया है कि इन सौर आंधियों का सबसे खतरनाक प्रभाव हमारी दूरसंचार व्यवस्था पर पड़ेगा।

वर्तमान में ध्वनि तरंगों की मदद से सूचना तकनीक का जो काम सुचारु रुप से चल रहा है, सौर आंधियों इन्हें पूरी तरह बिगाड़ देंगी।

जिसका नतीजा होगा कि ध्वनि तरंगों पर आधारित सारी व्यवस्था ही ध्वस्त हो जाएगी।

वैज्ञानिकों ने बताया है कि इस किस्म की सौर आंधी पहले भी पृथ्वी पर तबाही के निशान छोड़ गयी थी।

पिछली बार यह सौर आंधी करीब 26 सौ वर्ष पूर्व आयी थी।

ग्रीन लैंड के ग्लेशियरों के नीचे इसके रासायनिक प्रमाण मिले हैं।

उस वक्त की यह आंधी पृथ्वी पर अब तक आयी तमाम आंधियों के मुकाबले दस गुणा बड़ी थी।

लिहाजा इसकी तबाही का असर भी समझा जा सकता है।

वैज्ञानिक मानते हैं कि वर्तमान दौर में आबादी बढ़ने के साथ साथ इमारतें और संचार सुविधाएं भी बढ़ी हैं।

इसलिए अगर सौर आंधियों से हमारी सूचना तकनीक प्रभावित होती है तो इससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर जबर्दस्त प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

खास तौर पर सूचना तकनीक पर आधारित बैंकिंग व्यवस्था ही पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी और उसे बहाल करने में काफी वक्त भी लग सकता है।

महाकाश से पृथ्वी पर पहले भी आयी थी तबाही

26 सौ वर्ष पूर्व जब आंधी आयी थी तो दुनिया में निश्चित तौर पर इतने सारे वैज्ञानिक उपकरण नहीं थे।

लिहाजा उस जमाने का इंसान इस तकनीक पर निर्भर भी नहीं था।

लेकिन आज के दौर में बहुत सारा जीवन इसी तकनीक पर पूरी तरह निर्भर हो गया है।

यहां तक कि मौसम की जानकारी भी हमें जिन सैटेलाइटों की मदद से लगातार मिलती रहती है,

सौर आंधी की चपेट में आने से वे भी बेकार हो जाएंगे।

इन सौर आंधियों के बारे में वैज्ञानिकों ने बताया है कि अंतरिक्ष के कण जब अचानक पृथ्वी की तरह बढ़ने लगते हैं

तो चुंबकीय क्षेत्र में आने के पहले उनका प्रभाव बदलने लगता है।

ये किरणें किसी आग की लपटों की भांति पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर मौजूद चुंबकीय क्षेत्र पर किसी बम की तरह बरसने लगती हैं।

हमारे वायुमंडल की बाहरी संरचना कुछ ऐसी है कि वह खुद ही इन हमलों को वापस भेज देता है।

जब कभी वायुमंडल का यह प्रतिरोध टूटता है तभी तबाही के मंजर नजर आते हैं।

लुंड विश्वविद्यालय के डॉ रायमुंड मुशेलर ने इस बारे में कहा कि इस किस्म की सौर आंधियां कब और कैसे इनका प्रभाव होता है।

लेकिन इतना तय है कि इस युग में इस किस्म की सौर आंधियों का प्रभाव

हमारे जीवन पर ज्यादा पड़ेगा क्योंकि हम आज के दौर में सूचना तकनीक पर पूरी तरह आश्रित हो गये हैं।

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