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उल्कापिंडों का पृथ्वी पर तेजी से बढ़ता जा रहा है खतरा




  • नासा की सूचना गलत साबित कर आ गिरा उल्कापिंड

  • सारे उल्कापिंडों की नये सिरे से जांच प्रारंभ हुई

  • नासा की गणना को गलत साबित किया

  • पिछले जुलाई माह की घटना है यह

प्रतिनिधि

नयीदिल्लीः उल्कापिंडों का पृथ्वी की तरफ बढ़ते आना इनदिनों अचानक कुछ बढ़ सा गया है।

वैसे वैज्ञानिक यह मानते हैं कि दरअसल खगोल विज्ञान में प्रगति होने की वजह से हमलोगों को

इन उल्कापिंडों के बारे में पहले से अधिक जानकारी मिल रही है।

लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि नासा की जानकारी को एक उल्कापिंड ने गलत साबित कर दिया है।

इससे पूरी तैयारी की नये सिरे से समीक्षा करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

हाल के दिनों में कई उल्कापिंड पृथ्वी के काफी करीब से गुजर गये हैं।

इनमें से कुछ आकार में वाकई इतने बड़े थे कि पृथ्वी पर गिरने से तबाही आ सकती थी।

वीडियो में देखिये कैसे मंडरा रहे हैं उल्कापिंड पृथ्वी के आस पास

लेकिन इस बार एस्ट्रॉयड 2019 नासा को गलत साबित कर पृथ्वी पर आ गिरा है।

आकार में छोटा होने की वजह से इससे अधिक नुकसान नहीं हुआ है।

लेकिन अब नासा भी अपनी गणना की गलतियों को सुधारने में युद्ध स्तर पर जुट गया है।

नासा ने इस उल्कापिंड के बारे में कहा था कि यह पृथ्वी के बगल से गुजर जाएगा।

नासा की इस टिप्पणी के चंद घंटे बाद ही नासा को गलत साबित करता हुआ यह उल्कापिंड पृथ्वी पर आ गिरा।

यह कैरेबियन इलाके में गिरा है।

यह घटना पिछले 22 जुलाई की है लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इसके बारे में सार्वजनिक जानकारी दी है।

आकार में महज तीन मीटर का होने की वजह से इससे किसी बड़े खतरे की आशंका तो पहले से ही नहीं थी

लेकिन इसकी दिशा को समझने में नासा की गलत को गंभीर चूक माना गया है।

उल्कापिंडों का पृथ्वी पर तेज गति से आना ही खतरे का कारण

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक पृथ्वी की तरफ यह छोटा सा उल्कापिंड 14.9 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से आता गया।

अंत में यह पृथ्वी से थोड़ी ऊंचाई पर अपनी गर्मी से ही विस्फोट कर गया।




इसके छोटे छोटे टुकड़े कैरेबियाई इलाके में गिरे हैं।

इस वजह से उल्कापिंडों के पृथ्वी की तरफ आने का आकलन करने वाली पद्धति को नये सिरे से जांचा परखा जा रहा है

ताकि किसी बड़े उल्कापिंड के बारे में दोबारा ऐसी कोई गलती नहीं हो।

वरना गलत विश्लेषण के बाद अगर कोई बड़े आकार का उल्कापिंड पृथ्वी पर आ गिरा तो बड़ी तबाही का आना तय है।

आम तौर पर पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते ही तेज गति से आते उल्कापिंड गर्म हो जाते हैं।

इसी वजह से उनमें विस्फोट भी हो जाता है।

रूस के एक इलाके में इसी तरह के एक उल्कापिंड के विस्फोट से आसमान पर बने शीशा की बारिश से अनेक लोग घायल हुए थे।

वहां नुकसान भी काफी हुआ था।

वैज्ञानिक इस बात से चिंतित हैं कि आकार में बड़ा होने की स्थिति में ऐसे सौर मंडल के पत्थर दुनिया में भूकंप और सूनामी जैसी तबाही ला सकते हैं।

साथ ही इसके टकराने से पैदा होने वाले कंपनी और तेज गति की हवाओं से भी तबाही आ सकती है।

ऐसा पहले भी प्राचीन पृथ्वी में कई बार हो चुका है।

नासा की सफाई कि छोटे पत्थर तो वायुमंडल में आते ही जल जाते हैं

इस उल्कापिंड के बारे में वैज्ञानिकों की गणना गलत साबित होने के बाद अब यह बताया गया है कि

इस उल्कापिंड को पहली बार तब देखा गया था जब यह पृथ्वी से करीब पांच लाख किलोमीटर की दूरी पर था।

उस वक्त इसकी स्थिति चंद्रमा से अधिक की दूरी पर थी।

इस दूरी पर किसी पत्थर को देखना कुछ ऐसा था कि करीब पांच सौ किलोमीटर की दूरी से किसी छोड़े कीड़े को देखा जाए।

लेकिन यह तब भी वैज्ञानिकों की गणना के बाहर रहते हुए पृथ्वी के अंदर आ धमका।

इस घटना के बाद वैज्ञानिक नये सिरे से सारे वैसे उल्कापिंडों की जांच में जुट गये हैं,

जिनके बारे में पहले यह अनुमान लगाया गया था कि वे पृथ्वी के करीब से गुजर जाएंगे।

इनमें से एक उल्कापिंड 2019 जीटी 3 के बारे में पहले से ही आशंका है कि यह पृथ्वी पर आकर टकरा सकती है।

लेकिन इस एक घटना के बाद पृथ्वी के करीब से गुजरने की आशंका वाले तमाम उल्कापिंडों की जांच हो रही है।

इनमें 2019 ओएन, 2006 क्यू क्यू 23, 454094, 2013 बीजेड 45, 2018 पीएन 22, 2016 पीडी, 2002 जेआर100 और 2019 ओयू 1 शामिल हैं।

वैसे इस गणना के गलत प्रमाणित होने के बाद नासा के वैज्ञानिक डेविड फॉरोशिया ने सफाई दी है कि

आम तौर पर इतने छोटे आकार के उल्कापिंडों पर नजर नहीं रखी जाती है।

इनपर नजर इसलिए भी नहीं रखी जाती है क्योंकि यह तय है कि इतने छोटे आकार के उल्कापिंड

पृथ्वी के वायुमंडल के अंदर आते ही अपनी गति से गर्म होकर विस्फोट कर जाएंगे।

इसलिए उनके बड़े आकार में पृथ्वी पर टकराने की कोई आशंका भी नहीं होती।

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