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सिंहपर्णी से तैयार रबर के टायर ज्यादा बेहतर हैं देखे वीडियो

  • पुरानी रुसी तकनीक को सुधारा और आजमाया

  • जर्मनी में इसके टायर ने पहला पुरस्कार पाया

  • बनाने की विधि भी पर्यावरण के अनुकूल है

  • नष्ट नहीं होने वाले कचड़ों में रबर भी है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः सिंहपर्णी फूल से हम सभी परिचित हैं। पीले रंग के गेंदा जैसा यह फूल दूर से

सूरजमुखी होने का भी भ्रम देता है। यह भारत में सबसे अधिक हिमाचल प्रदेश के इलाके

में पाया जाता है। पहली बार इस बात का परीक्षण हुआ है कि इससे तैयार रबर टायर

उद्योग में ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है।

उसकी जड़ से लेटेक्स तैयार कर उसका टायर बनाया देखें वीडियो

दरअसल पर्यावरण के प्रति सचेतन होती कंपनियों ने रबर के वैसे विकल्पों की तलाश की

थी, जो दोबारा इस्तेमाल के लायक हो। इसी वजह से पुरानी रुसी तकनीक को फिर से

आजमाया गया है और उसके बेहतर परिणाम सामने आये हैं। आचेन विश्वविद्यालय के

साथ मिलकर जर्मनी की एक कंपनी ने इस पर काम किया है। इससे गड्डों को भरने के

लिए नष्ट नहीं होने वाले कचड़ों का प्रयोग, माइक्रो प्लास्टिक और जंगल काटने जैसी

समस्याओं से भी मुक्ति मिल पायेगी। वर्तमान में रबर बनाने के लिए रबर के पेड़ों को

काटा जाता है, इससे पर्यावरण को भी काफी नुकसान पहुंचता है। ऐसा नहीं है कि यह कोई

नई ईजाद है। अविभाजित सोवियत संघ नें सिंहपर्णी फूल के रबर बनाने की तकनीक

पहले विकसित को गयी थी। दरअसल उस वक्त का सोवियत संघ रबर के मामले में

निर्यात की निर्भरता को खत्म करना चाहता था। उस दौरान अभी के कजाकिस्तान में

उगने वाले सिंहपर्णी के फूल इस रबर के लिए सबसे उपयुक्त पाये गये थे। इसके लिए

सोवियत संघ के वैज्ञानिकों ने एक हजार से अधिक पौधों की जांच की थी। दूसरे विश्वयुद्ध

के पहले सभी देश ब्राजिल में उगाये जाने वाले रबर से ही अपना काम चलाते थे। लेकिन

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान सोवियत संघ, ब्रिटेन, अमेरिका और जर्मनी जैसे देशों ने

सिंहपर्णी फूल से रबर बनाने का काम प्रारंभ किया था।

सूर्यपर्णी पर यह प्रयोग कंटिनेंटल टायर ने किया है

अब कंटिनेंटल टायर नामक एक कंपनी ने सिंहपर्णी फूल से नये किस्म का रबर पैदा कर

उसके टायर भी बनाये हैं। इसका नामकरण भी हो गया है। टाराक्सागम नामक यह रबर

कंपनी द्वारा अपनी साइकिल के टायरों में इस्तेमाल किया गया है। इस टायर ने जर्मनी

के इस साल के सस्टेनेबल डिजाइन का खिताब भी जीता है। इसके बाद से ही सिंहपर्णी

फूल से बनने वाले रबर की चर्चा होने लगी है। इस विधि से तैयार रबर के टायरों मे कई

विशेषताओं का उल्लेख वैज्ञानिकों ने किया है। इस प्रतियोगिता में कुल 54 कंपनियों के

उत्पादों को शामिल किया गया था, जिसमें सिंहपर्णी से तैयार रबर का टायर बाजी मार ले

गया। पारंपरिक रबर के मुकाबले यह रबर टायर प्रदर्शन के लिहाज से बेहतर माना गया

है। अच्छी बात यह भी है कि सिंहपर्णी को उगाने के लिए कोई खास परिश्रम की

आवश्यकता नहीं होती। यह दूषण वाली जमीन अथवा वीरान हो चुके औद्योगिक प्रांगणों

में भी बड़ी आसानी से उगाया जा सकता है। लिहाजा उसके व्यापार और सिंहपर्णी के रबर

का अंतर्राष्ट्रीय बाजार भी विकसित हो सकता है। इस पौधे से रबर निकालने के लिए जो

अतिरिक्त जरूरत पड़ती है, वह सिर्फ गर्म पानी की है। दूसरी तरफ पारंपरिक रबर के पेड़

से रबर निकालने के लिए कई किस्म के रसायनों का प्रयोग किया जाता है। साथ ही रबर

निकालने के काम में इस्तेमाल होने वाले इन रसायनों को अगर सही तरीके से निष्पादित

नहीं किया गया तो वे पर्यावरण संकट के बड़े कारण बनते हैं। इस अंतर की वजह से भी

सिंहपर्णी फूल के विकसित रबर को पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से फायदेमंद माना जा

रहा है। अभी पूरी दुनिया में पर्यावरण संरक्षण की मांग तेज होती चली जा रही है क्योंकि

पर्यावरण संतुलन के बिगड़ने का नतीजा हम सभी को दिखने भी लगा है।

शोध वैज्ञानिक मधुमक्खियों के लिए भी इसे जरूरी मानते हैं

इस बारे में शोध करने वाले वैज्ञानिकों ने सिंहपर्णी के फूल से मधुमक्खियो को मिलने वाले

संरक्षण की भी बात कही है। उन्होंने कहा है कि यह पौधा अपने आप में पौष्टिकता से

भऱपूर होता है। इसलिए इस पौधे और उसके फूलों के प्रति मधुमक्खियां बहुत आकर्षित

होती हैं। इन पौधों को बचाने से मधुमक्खियों का भी जीवन बचता है। जो पर्यावरण के

लिए भी बहुत जरूरी है। दूसरी तरफ वैज्ञानिक यह भी दलील देते हैं कि इसी पर्यावरण

संरक्षण की बदौलत इंसान को पौष्टिक भोजन भी मिल पा रहे हैं।

इस संबंध में ब्रिस्टल विश्वविद्यालय की प्रोफेसर जेने मेमोट कहती हैं कि हम इंसान

व्यक्तिगत तौर पर शेर, ह्वेल आर हाथियों की मदद तो नहीं कर सकते। हम अपने आस

पास के सूर्यपर्णी जैसे पौधों और छोटे कीड़ों मकौड़ों और पक्षियों को बचाने का लिए बहुत

कुछ कर सकते हैं। इतना नुकसान समझ में आने के बाद अब सभी को प्रकृति को बेहतर

बनाने की दिशा में काम करना चाहिए।

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