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पर्यावरण से छेड़छाड़ का खामियजा भुगतने तैयार रहिये







  • भारत में बेमौसम बारिश का कहर इस साल ज्यादा
  • मॉनसून भी बदल रहा अपने आने जाने का तरीका
  • महानगर और ग्रामीण इलाकों पर एक जैसा असर
  • जमीन के अंदर का पानी कम होने से बढ़ा खतरा
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः पर्यावरण से छेड़छाड़ की अब अति हो गयी है। इसी वजह

से अब प्रकृति भी अपना तेवर बदल रही है। भारतवर्ष में इस वर्ष यह

कहर कई स्थानों पर देखने को मिल चुका है। अभी भी केरल और

तमिलनाडू में बेमौसम बारिश से करीब एक दर्जन लोगों की मौत और

भारी तबाही इसी का नतीजा है।

वैज्ञानिक मानते हैं कि यह दरअसल मौसम चक्र में बदलते चले जाने

की शुरुआत भर है। आने वाले दिनों में इसका और अधिक खामियजा

हमें यानी पूरे भारतवर्ष को भुगतना पड़ सकता है।

वैज्ञानिक इस साल की बारिश के तौर तरीकों के आधार पर इस नतीजे

पर पहुंचे हैं कि खास तौर पर मॉनसून का आना और बारिश के

प्राकृतिक नियम अब बदलते हुए नजर आ रहे हैं। इसी वजह से इस

बार पूरे देश के अनेक स्थानों पर अति वर्षा का प्रकोप हुआ है।

राजस्थान जैसे रेगिस्तानी इलाकों में भी बाढ़ की तबाही के अलावा

पिछले साल केरल में आयी तबाही इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।

इन घटनाक्रमों पर नजर रखने वाले वैज्ञानिक यह भी मान रहे हैं कि

मौसम के इस बदलाव का असर भारतीय कृषि पर भी पड़ने वाला है।

यह और भी खतरनाक स्थिति है क्योंकि भारत की अर्थनीति मुख्य

तौर पर कृषि प्रधान ही है। कुछ इलाकों में कृषि की उपज इस अधिक

वर्षा से अधिक होने के बाद भी अब फसल पर कीड़ों का जबर्दस्त हमला

हो रहा है।

उत्तर पश्चिम बंगाल के कुछ इलाकों को मिलाकर करीब साठ हजार

हेक्टेयर पर लगी धान की फसल को काटे जाने के बाद कीड़े चट कर

गये हैं।

पर्यावरण से छेड़छाड़ का असर एक जैसा

मौसम के इस बदलाव का असर ग्रामीण और शहरी इलाकों में एक

जैसा पड़ रहा है। मुंबई और चेन्नई जैसे महानगरों में कई कई दिनों

तक जलजमाव की वजह से जनजीवन ठप हो जा रहा है। अभी भी

तमिलनाडू के कई इलाकों में हो रही भारी बारिश की वजह से स्कूल-

कॉलेज बंद करने पड़े हैं।

दूसरी तरफ ग्रामीण इलाकों में अधिक अथवा कम बारिश से खेती

प्रभावित हो रही है। कम वर्षा वाले कुछ इलाके ऐसे भी हैं, जहां बारिश

नहीं होने की वजह से गांव के कुएं सूख गये हैं। जाहिर है कि यह

बदलाव अभी ही लाखों परिवारों को प्रभावित कर रहा है। इसी क्रम में

वैज्ञानिकों ने हो रहे बदलावों को गंभीर संकेत मानते हुए बारिश खत्म

होने के बाद के कुप्रभावों को भी रेखांकित किया है।

इस बार बाढ़ उतर जाने के पंद्रह दिन बाद मालदा (पश्चिम बंगाल)

इलाके के कई सौ हेक्टेयर जमीन अचानक ही अपने मूल से टूटकर

धीरे धीरे गंगा के अंदर समा गयी। इसकी प्रक्रिया धीमी होने की वजह

से वहां से लोगों को भागने का मौका मिल गया।

आम तौर पर इस तरह का भूस्खलन बाढ़ के दौरान हुआ करता था।

यह पहली बार देखा गया कि बाढ़ का पानी उतर जाने और जमीन

ऊपर से पूरी तरह सूख जाने के बाद अंदर से अचानक यह कटाव हुआ।

देश में भूगर्भस्थ पानी का स्तर भी घट रहा है

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों का मानना है कि दरअसल भारत में

भूगर्भस्थ जल के भंडार को सुधारने की दिशा में त्वरित कार्रवाई नहीं

होने की वजह से भी प्रकृति का संतुलन तेजी से बिगड़ता जा रहा है।

दूसरी तरफ पेड़ों की कटाई से भी पर्यावरण पहले से ही बिगड़ चुका है।

इसी वजह से अब मौसम का चक्र भी बदल रहा है। पूरे देश के इस बार

के बारिश के आंकड़े यही बताते हैं कि इस बार मॉनसून के दौरान पूरे

देश में औसतन सबसे अधिक बारिश सितंबर माह में हुई। दूसरी तरफ

अक्टूबर में फसल की कटाई का मौसम होने के दौरान भी अनेक इलाके

बारिश की चपेट में रहे।

इस वैज्ञानिक अनुसंधान के आंकड़ों की खोज खबर रखने वाले

वैज्ञानिक इसके लिए देश के लोगों की लालच को भी जिम्मेदार मानते

हैं। पैसे की ताकत स प्रकृति के सारे नियमों को धता बताकर अपनी

हैसियत बढ़ाने की कोशिश में लोगों ने इस पर्यावरण के संतुलन को

इतना अधिक बिगाड़ दिया है कि अब प्रकृति समान रुप से सबसे

बदला ले रही है।

वैज्ञानिक मानते हैं कि मौसम के इस बदलाव से पैसा भी लोगों को

बचा नहीं पायेगा। प्रकृति का यह कहर आगे और भीषण बना तो हर

कोई इसकी चपेट में बराबर तरीके से आयेगा। इसके कहर से कोई बच

नहीं पायेगा।



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