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क्रमिक विकास के दौर में ऐसा क्यों हुआ तलाशने में जुटे हैं वैज्ञानिक

  • अति प्राचीन काल में दोनों ही विद्यमान थे

  • उल्कापिंड की बारिश से स्वाहा गये डायनासोर

  • सिर्फ मगरमच्छों का आकार अब छोटा हो गया

  • मगरमच्छ बच गये लेकिन डायनासोर विलुप्त हो गये

राष्ट्रीय खबर

रांची: क्रमिक विकास के दौर से ही चलते हुए हमारी पृथ्वी आज तक आ पहुंची है। जीवन

की उत्पत्ति के बाद लगातार इसमें बदलाव हुए हैं। एक एमिवा से कई किस्म के जीवन का

विकास हुआ है। लेकिन अब वैज्ञानिक इस सवाल का उत्तर तलाश रहे हैं कि आखिर वह

कौन सी बात थी जिसकी वजह से डायनासोर प्रजाति के विलुप्त हो जाने के बाद भी उसी

काल के मगरमच्छ आज तक पृथ्वी में मौजूद हैं। प्राचीन धरती पर यह दोनों ही प्राणी रहते

थे, इसकी वैज्ञानिक पुष्टि पहले ही हो चुकी है। यह भी पता चल चुका है कि प्राचीन काल

के मगरमच्छों का आकार इतना विशाल होता था कि वे डायनासोर को भी अपना शिकार

बना लेते थे। अब ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं

कि पृथ्वी पर वह कौन से कारण थे जिसकी वजह से डायनासोर के विलुप्त होने के दौर में

मौजूद मगरमच्छ जिंदा रह गये। यूं तो माना जाता है कि एक बहुत बड़े आकार के

उल्कापिंड के धरती पर टकराने की वजह से पूरी दुनिया में जो आग लगी थी, उसी में

डायनासोर की सारी प्रजातियां जलकर समाप्त हो गयी थीं। लेकिन उसी दौर में आसमान

से गिरते उल्कापिंड की वजह से पैदा आसमानी शीशा के पानी में गिरने की वजह से पानी

के जीवन का भी अधिकांश हिस्सा खत्म हो गया था। ऐसे में मगरमच्छ कैसे जिंदा बचे

रहे, यह सवाल वैज्ञानिकों को मथ रहा है। वैज्ञानिक इसके लिए एक कड़ी से दूसरी कड़ी को

जोड़ते हुए आगे बढ़ रहे हैं। यह पता चल रहा है कि अति प्राचीन पृथ्वी यानी करीब दो सौ

मिलियन वर्ष पूर्व यहां मौजूद जीवन के सिर्फ 25 प्राणी ही अब जीवित बचे हैं।

क्रमिक विकास के दौर में सिर्फ 25 प्राचीन प्रजातियां शेष हैं

यहां जूरासिक काल के दौरान मौजूद अधिकांश प्राणी इस दौर तक आते आते समाप्त हो

चुके हैं। जो प्राणी तब से लेकर आज तक जीवित हैं, उनमें मगरमच्छ प्रमुख है। वैसे

वैज्ञानिकों ने शोध के क्रम में यह बार बार स्पष्ट किया है कि प्राचीन काल में जो

विशालकाय मगरमच्छ पृथ्वी पर मौजूद थे, अब वे नहीं रहे लेकिन उनका आकार छोटा

होने के बाद भी वे मगरमच्छ के तौर पर ही हमारे जल जीवन में जीवित हैं। उनकी भी कई

प्रजातियां अलग अलग कालखंड में विकसित हुई हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि क्रमिक

विकास का यह काम अत्यंत धीमी गति से चलता है। इसी वजह से एक प्रजाति के मौजूद

जीवन को अपने अंदर होने वाले परिवर्तनों का एहसास भी नहीं होता। कई पीढ़ियों के बाद

यह बदलाव प्रमुख तौर पर उभरता जाता है। वैसे यह भी समझा गया है कि जैसे जैसे

तापमान बढ़ता है, क्रमिक विकास की गति भी तेज होती है। इसके साथ ही उनके शरीर का

आकार भी बढ़ता गया है। इस शोध के बारे में प्रकाशित प्रबंध के मुख्य लेखक डॉ मैक्स

स्टॉकडेल कहते हैं कि उनलोगों ने इसके लिए भी कंप्यूटर पद्धति का इस्तेमाल किया है।

इसके माध्यम से वे क्रमिक विकास के लाखों वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण कर पा रहे हैं।

पहले की प्रजातियों के फॉसिल्स और वर्तमान प्रजाति के आंकड़ों का मिलान करने से यह

पता चल रहा है कि पहले एक प्रजाति में कौन कौन से गुण थे, जो अब नहीं हैं अथवा

वर्तमान प्रजाति के कौन कौन से वर्तमान गुण पहले की प्रजाति में विद्यमान नहीं थे।

शायद मगरमच्छ बाहर से गर्मी लेने की वजह से बच गये हैं

इसी का नतीजा है कि मगरमच्छ के शरीर की आंतरिक बनावट कुछ ऐसी बन गयी थी कि

पृथ्वी पर होने वाले बदलावों से उनपर कोई ऐसा प्रभाव नहीं पड़ पाया जो उन्हें विलुप्ति के

कगार पर धकेल देता हो। शोध का एक निष्कर्ष यह भी है कि मगरमच्छ के शरीर के अंदर

तापमान नियंत्रित करने की कोई प्रक्रिया मौजूद नहीं होने का भी शायद उसे लाभ मिला

है। वह गर्म माहौल में अथवा सूर्य की रोशनी में पड़े हुए अपने शरीर के लिए तापमान

एकत्रित करते हैं। डायनासोर के पास यह विशेषता नहीं थी। शायद इस वजह से भी वे

बदलाव के शिकार हो गये जबकि मगरमच्छ आज के दौर में भी जीवित हैं। सिर्फ क्रमिक

विकास के दौर में उनका आकार पहले से काफी छोटा हो गया है। यह भी माना जा रहा है

कि बाहर से गर्मी ग्रहण करने की वजह से ही मगरमच्छ पानी में रहते हुए उल्कापिंडों से

पैदा गर्म शीशा की बारिश में खुद को बचा ले गये। दूसरी तरफ उल्कापिंड की बारिश से

लगी आग में डायनासोर जलकर राख हो गये

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