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सूर्य की रोशनी पर भी वैज्ञानिकों और डब्लूएचओ की राय भिन्न

  • सूर्य किरणों के प्रभाव से दो मिनट में वायरस खत्म

  • कई वैज्ञानिक मानते हैं कि इससे कोरोना खत्म होता है

  • अमेरिकी प्रयोगशाला में इसकी जांच की गयी

  • निष्पक्ष जांच रिपोर्ट की अभी प्रतीक्षा हो रही है

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन की राय फिर सवालों में

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः सूर्य की रोशनी वह दूसरा मुद्दा है, जिसमें अन्य वैज्ञानिक और विश्व स्वास्थ्य

संगठन एक राय नहीं रखते हैं। अन्य वैज्ञानिकों ने अपने अपने शोध के आधार पर यह

राय दी है कि सूर्य की रोशनी में कोरोना वायरस का प्रभाव तेजी से कम होने लगता है और

एक खास अवधि के बाद वह पूरी तरह से निष्क्रिय हो जाता है।

वीडियो में जाने वैज्ञानिकों का नया निष्कर्ष

दूसरी तरफ विश्व स्वास्थ्य संगठन की राय है कि सूर्य की रोशनी से इस वायरस से बचाव

नहीं हो सकता है। जटिल वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के बीच की यह परस्पर विरोधी राय और भी

भ्रम पैदा करने वाली है। लेकिन जिस तरीके से हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का मामला सामने

आया है, उससे अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय अब डब्ल्यूएचओ की राय पर अधिक भरोसा

नहीं कर पा रहे हैं। वैज्ञानिक भी धीरे धीरे यह मानने लगे हैं कि दरअसल यह संगठन भी

चीन के प्रति अधिक झूका हुआ है और इस संगठन की राय पर बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों

का वर्चस्व कायम हो गया है।

अमेरिका में हुए एक नये शोध के बारे में वहां के होमलैंड सिक्यूरिटी विभाग के सचिव

विलियम ब्रायन ने यह जानकारी दी है। उन्होंने कहा कि इस शौध के परिणामों को अभी

सार्वजनिक नहीं किया गया है। शोध निष्कर्ष को जनता के बीच सार्वजनिक करने से पहले

निष्पक्ष संगठनों के पास इसे शोध और परीक्षण के लिए भेजा गया है। उनकी राय प्राप्त

होने के बाद इस निष्कर्ष को विधिवत सार्वजनिक कर दिया जाएगा।

सूर्य की रोशनी के शोध की जानकारी ह्वाइट हाउस से

अमेरिकी राष्ट्रपति के आवास सह कार्यालय व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए

ब्रायन ने कहा कि सरकारी वैज्ञानिकों ने यह खोज निकाला है। इन वैज्ञानिकों ने पाया है

कि सूर्य की रोशनी में मौजूद अल्ट्रावॉयोलेट किरणें कोरोना वायरस पर असर डालती है।

इसलिए अमेरिका में गरमी का मौसम आने की स्थिति में यह संक्रमण खुद ब खुद भी

निष्क्रिय होता चला जाएगा। उनके मुताबिक वैज्ञानिक अपने अनुसंधान में यह देख चुके

हैं कि सूर्य की तेज रोशनी में यह वायरस मर जाता है। यह असर हवा और किसी सतह पर

बराबर रुप से काम करता है। अलबत्ता अलग अलग सतह पर रखे वायरस के समाप्त

होने में अलग अलग समय लगता है। इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों का हवाला देते हुए उक्त

अधिकारी ने कहा कि इसमें तापमान के साथ साथ नमी के आंकड़ों को भी जांचा परखा

गया है। दोनों के उपस्थिति में वायरस का प्रभाव कम होता है यानी दोनों ही वायरस

संक्रमण को कम करने में मददगार साबित हुए हैं।

वैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर यह पहले से ही प्रमाणित तथ्य है कि पारा बैंगनी किरणें

यानी अल्ट्रा वॉयोलेट किरणों का किसी भी वस्तु पर संक्रमण मुक्ति का प्रभाव पड़ता है।

किसी भी सतह पर अगर किसी किस्म का वायरस हो तो वह इन किरणों से संपर्क में आने

पर अपना प्रभाव खोने लगता है क्योंकि इन किरणों का विकिरण ही वायरस के जेनेटिक

संरचना को गला देते हैं और वे अपनी वंशवृद्धि नहीं कर पाते हैं।

अल्ट्रा वॉयोलेट किरणों की मारक क्षमता पहले से ज्ञात है

इस विषय पर वैज्ञानिक अल्ट्रा वॉयोलेट किरणों की प्रभाव और उसके तरंगों को भी तौल

रहे है ताकि परीक्षण के दौरान जिन पैमानों का इस्तेमाल हुआ है, वह वास्तविक

परिस्थिति में भी कारगर साबित हो सकें। यह बताया गया है कि वैज्ञानिकों ने अपनी

तरफ से प्रयोगशाला में प्राकृतिक रोशनी जैसी परिस्थिति पैदा की थी। खासकर

प्रयोगशाला में इस रोशनी को अमेरिकी के गर्मी के दिनों में पड़ने वाली सूर्य की रोशनी के

जैसा ही बनाया गया है। इसी परीक्षण में यह पाया गया है कि वायरस मर रहे हैं।

इस जानकारी के सामने आने के बाद टेक्सास के एएंड एम विश्वविद्यालय के जैव

विज्ञानी बेंजामिन न्यूमैन ने कहा कि परीक्षण कैसे और किन मापदंडों पर हुआ है, उसे

जान लेने के बाद ही इस पर कोई स्पष्ट राय दी जा सकती है। उनके मुताबिक ऐसा नहीं है

कि जिनलोगों ने यह परीक्षण किया है, उन्होंने गलत किया होगा लेकिन असली बात यह

है कि वायरस कहां है और कितना सक्रिय है, उसे जांचने की विधि अलग अलग हो सकती

है।

होमलैंड सिक्यूरिटी के ब्रायन ने कहा कि मैरीलैंड के नेशनल बॉयोडिफेंस एनालाइसिस एंड

काउंटरमेजर्स केंद्र में इसका परीक्षण किया गया है। यह केंद्र अमेरिका पर किसी जैविक

हथियार के हमले की स्थिति में बचाव की पद्धतियों को विकसित करने पर काम करता है।

इससे स्पष्ट है कि अमेरिका भी अंदर से यह मान रहा है कि यह एक किस्म का जैविक

हथियार भी हो सकता है। जिसके बारे में पहले से ही चीन के वुहान शहर की प्रयोगशाला

को जिम्मेदार ठहराया गया है।

वुहान की प्रयोगशाला को फिर से जिम्मेदार ठहराया गयाचीन के वुहान में कोरोना संबंधी आंकड़े संशोधित किये गये

वहां हुए शोध के बारे में ह्वाइट हाउस में पत्रकारों को यह बताया गया है कि 21 से 24 डिग्री

तापमान और बीस प्रतिशत नमी में यह किसी कठोर धरातल पर 18 घंटे में पूरी तरह

समाप्त हो गया। इस किस्म के सतह में दरवाजे के हैंडल और स्टेनलेस स्टील भी थे।

लेकिन जब सूर्य की रोशनी को इस प्रयोग में शामिल कर दिया गया तो वायरस का

जीवनकाल छह घंटे रह गया जबकि नमी को भी 80 प्रतिशत बढ़ाया गया। तेज सूर्य की

रोशनी में यह वायरस मात्र दो मिनट में समाप्त हो गया।

हवा में इस वायरस को बिखेरे जाने के बाद इन्हीं परिस्थितियों के बीच वह एक घंटे में

समाप्त हो गया, ऐसा वैज्ञानिकों ने पाया है। लेकिन हवा में तैरते वायरस जब सूर्य की

रोशनी के संपर्क में आये तो मात्र डेढ़ मिनट में वे पूरी तरह समाप्त हो गये। इसलिए ब्रायन

मानते हैं कि अमेरिकी में गरमी का मौसम आने पर वायरस का संक्रमण खुद ब खुद

प्राकृतिक तौर पर समाप्त होने लगेगा। लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि इसके

बाद भी सोशल डिस्टेंसिंग और बचाव के वर्तमान तरीकों को लंबे समय तक अपनाना

पड़ेगा ताकि अदृश्य वायरस किसी छिपे हुए स्थान से फिर लोगों पर हमला नहीं कर सके।


 

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