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कोविड-19 टीकों की मांग फिर से बढ़ेगी पूरी दुनिया में




कोविड-19 टीकों की मांग पहले कम होने लगी थी। इसी वजह से भारतीय वैक्सिन उत्पादकों ने अपना उत्पादन भी कम कर दिया था। वैसे इस फैसले के साथ ही वे केंद्र सरकार की आलोचना करने से भी नहीं चूके थे क्योंकि सरकार ने वैक्सिन के निर्यात पर रोक लगा रखी थी जबकि भारतीय कंपनियां इस आपदा में भी विदेशों में वैक्सिन बेचकर मुनाफा कमाना चाहती थी।




अब फिर से कोविड-19 टीकों के साथ-साथ बूस्टर टीके की वैश्विक मांग बढऩे से 2022 में देश के टीका उद्योग में अच्छी वृद्धि की संभावना बनेगी। उद्योग के अंदरूनी सूत्रों ने इसकी जानकारी दी है। इसके अलावा नई पीढ़ी के टीके पर भी काम शुरू हो गया है। वैश्विक स्तर पर कोविड 19 के टीके लगाने वालों की तादाद महज 48 प्रतिशत है।

आवरवल्र्डइन डेटा डॉट ओआरजी के मुताबिक अफ्रीकी देशों में मसलन इथियोपिया में केवल 1.24 फीसदी लोगों को ही 23 दिसंबर तक टीके की दोनों खुराक दी गई है। भारत बायोटेक में एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि देश में आबादी का एक ऐसा हिस्सा है जो बीमारी के डर से टीके लगवा ही लेता है।

देश में संक्रमण के मामले में कमी आने की वजह से टीके की मांग में कमी आ गई। अब कोरोनावायरस के बेहद संक्रामक स्वरूप ओमीक्रोन के आने से सरकार अब बुजुर्गों, स्वास्थ्यसेवा और अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं को तीसरी खुराक देने के लिए टीकाकरण की शुरुआत कर रही है।

ऐसे में मुमकिन है कि एक बार फिर से मांग में तेजी आएगी। इसके अलावा बच्च्चों के टीके की मांग भी बढ़ी है क्योंकि 18 साल उम्र से कम के बच्चों की तादाद करीब 40 करोड़ है। अब तक केवल 15-18 वर्ष की श्रेणी के लिए टीकाकरण की शुरुआत की गई है।

कोविड-19 के टीकों का प्रयोग बच्चों के लिए होगा

अगर देश में संक्रमण के मामले में तेजी नहीं होती तब टीके की मांग में कमी आती है लेकिन कई ऐसे देश हैं जो तीसरे बूस्टर खुराक की बात कर रहे हैं जबकि कुछ देश तो चौथे बूस्टर खुराक की भी बात कर रहे हैं। हालांकि 2021 के मुकाबले मांग कम होगी लेकिन वैश्विक स्तर पर कोविड-19 टीके की मांग बनी रहेगी।

एसआईआई ने इस महीने उत्पादन में आधी कटौती कर दी है और अब यह कोविशील्ड के 12-12.5 करोड़ मासिक खुराक के स्तर पर सिमट गई है। कंपनी का कहना है कि उसे 2022 की पहली तिमाही में पूर्ण उत्पादन करने की उम्मीद है। कंपनी के सूत्रों का कहना है, निर्यात की मांग में धीरे-धीरे बढ़ोतरी होने की उम्मीद है।




कुछ देशों में कोल्ड चेन को लेकर कुछ लॉजिस्टिक्स से जुड़ी दिक्कतें देखी जा रही हैं। एक बार इन सबका समाधान हो जाए तब निर्यात की रफ्तार तेज हो जाएगी। एसआईआई के पुणे संयंत्र में करीब 50 करोड़ खुराक है। 2021 का साल वैश्विक और देश के टीका उद्योग के लिए अहम रहा।

एसआईआई वित्त वर्ष 2019-20 में टीके की 1.5 अरब खुराक बना रही थी। अब इसने केवल कोविशील्ड के लिए अपनी क्षमता बढ़ाकर 4 अरब सालाना खुराक कर ली है। वहीं भारत बायोटेक ने इस साल मार्च में कोवैक्सीन बनाना शुरू किया और अब यह एक महीने में टीके की 5.5-6 करोड़ खुराक बना रही है और जल्द ही कोवैक्सीन की 8 करोड़ खुराक प्रतिमाह बनाना शुरू कर देगी।

टीका निर्माताओं के लिए कच्चे माल की आपूर्ति अहम रही। एसआईआई के सीईओ अदार पूनावाला ने अप्रैल में नोवावैक्स टीके के लिए कच्चे माल की कमी का संकेत दिया था। एसआईआई ने कच्चे माल के लिए वैकल्पिक स्रोत तैयार करने पर काम शुरू कर दिया है।

नये सिरे से उत्पादन बढ़ान की तैयारियों में कंपनियां

भारत बायोटेक ने कहा कि इसके सभी महत्त्वपूर्ण कच्चे माल भारत से ही लिए जा रहे हैं जिनमें पैकेजिंग तक की सामग्री शामिल है। इस बीच वेव 2 टीके पर काम शुरू हो चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना वायरस महामारी के की भविष्य की लहरों के लिए तैयारी शुरू करने की जरूरत है।

एक सकारात्मक बात यह है कि कोई भी टीका पूरी तरह से किसी भी स्ट्रेन से बचाव में पूरी तरह से असफल नहीं है। वेलूर के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर गगनदीप कांग कहती हैं, इस वक्त दुनिया में कहीं भी कोरोना वायरस का मूल स्ट्रेन चलन में नहीं है।

अब फिर से ओमीक्रॉन के साथ साथ कोरोना का प्रभाव देश में बढ़ने की वजह से कोविड-19 के टीकों की मांग का बढ़ना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। दुनिया के कुछ विकसित देशों में इसे नजरअंदाज किये जाने के परिणाम भी अब हमारी आंखों से सामने हैं, जहां हर रोज रोगियों की संख्या बढ़ रही है। ऐसे में बचाव का एकमात्र साधन कोविड-19 के टीकों का इस्तमाल ही है।



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