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कोविड-19 की वर्तमान लहर वाकई डरावनी है

कोविड-19 की दूसरी लहर अधिक तेजी से फैल रही है। यह अलग बात है कि इसके लिए

हमारी अपनी लापरवाही अधिक जिम्मेदार है। आंकड़ों की बात करें तो कोविड-19 की

दूसरी लहर पहली के मुकाबले कम घातक है या हमने वर्ष 2020 में जो मृत्यु दर देखी थी,

यह उससे कम दिखा रही है, इस जानकारी के विपरीत हाल के सप्ताहों में किए गए मौतों

के एक विश्लेषण में पता चला है कि दूसरी लहर पहली की तरह ही घातक है या उससे भी

ज्यादा घातक हो सकती है। वैसे इन आंकड़ों को दरकिनार कर भी दें तो झारखंड और रांची

की हालत से भी कोविड-19 की वर्तमान हालात का अंदाजा लग जाता है। हर रोज सैकड़ों

की संख्या में नये संक्रमित पाये जा रहे हैं। जिसका अर्थ यह है कि पिछले दो सप्ताह में

लोगों ने अपनी तरफ से कोरोना गाइड लाइनों का जबर्दस्त उल्लंघन किया है। नतीजा है

कि अस्पतालों में अब कोरोना मरीजों के लिए जगह ही नहीं बची है। शोध और डॉक्टरों के

हिसाब से कोविड-19 के कारण होने वाली मौतें आम तौर पर बीमारी की पहचान के दो से

तीन सप्ताह बाद होती हैं। यहां इस्तेमाल की गई विलंबित सीएफआर (संक्रमण से होने

वाली मृत्यु दर) किसी खास दिन होने वाली मौतों को अनिवार्य रूप से उस दिन से 18 दिन

पहले दर्ज किए गए मामलों के रूप में मापती है। हालांकि कुल मिलाकर देश की संयुक्त

सीएफआर गिरकर 1.3 प्रतिशत पर आ गई है, लेकिन कोविड-19 के आंकड़ों के विश्लेषण

के अनुसार मौजूदा सीएफआर धीरे-धीरे बढ़ रहा है।

कोविड-19 का मारक प्रभाव पिछले सिंतबर में था

देश की विलंबित सीएफआर अब बढ़कर 1.7 मौत प्रति 100 मामले हो चुकी है, जो पहली

लहर के चरम-सितंबर 2020 में नजर आए स्तर के बराबर है। सर्वाधिक पीड़ित राज्य

महाराष्ट्र के मामले में यह विलंबित सीएफआर बढ़ रही है, लेकिन जांच बढऩे के कारण

अधिक संख्या में मामलों का पता लगने की वजह से यह पहली लहर की तुलना में अब भी

कम है। लेकिन राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के संबंध में तस्वीर बिगड़ती दिख रही है। यह

विलंबित सीएफआर 2.6 प्रतिशत का स्तर पार कर चुकी है। यह वह स्तर है, जो वर्ष 2020

के चरम में भी नजर नहीं आया था। संक्रमण रोकने के लिए शहर में हाल ही में रात्रि कफ्र्यू

लगाया गया है। पंजाब भी सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में से एक है और ऐसा राज्य है,

जहां ब्रिटेन का अत्यधिक संक्रामक स्वरूप (बी.1.1.7) बड़े अनुपात में पाया गया था। इस

विश्लेषण के अनुसार यहां यह विलंबित सीएफआर 5 अप्रैल को 3.4 प्रतिशत के ऊंचे स्तर

पर था। दरअसल में, मार्च के तीसरे सप्ताह में यह बढ़कर 5.7 प्रतिशत तक पहुंच गया था।

आंकड़ों के अनुसार दूसरी लहर पहली के मुकाबले 1.7 गुना ज्यादा तेज है या दूसरे शब्दों में

कहें, तो इस बार दैनिक मामलों की संख्या 11,000 से बढ़कर 84,000 तक पहुंचने में 51

दिन लगे हैं, जबकि पहली लहर में 85 दिन लगे थे। साथ ही इन विश्लेषणों से पता चलता

है कि हालात जरा भी बेहतर नहीं हैं, बल्कि असल में स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे पर पिछले

साल के मुकाबले अधिक दबाव पडऩे के परिणामस्वरूप कम वक्त में ज्यादा मौतें हो

सकती हैं।

आंकड़े बताते हैं कि मौत का ग्राफ ऊपर जाएगा

डॉक्टरों और विशेषज्ञों ने कहा कि इस बीमारी के कारण मौत होने के कई कारक जिम्मेदार

हैं, जिनमें इसका पता लगने में देरी, उपचार की प्रकृति और संक्रमित व्यक्ति की उम्र

शामिल है। कुछ ने यह भी कहा कि इस समय कम गंभीर लक्षण देखे जा रहे हैं। इस

बीमारी से मौत होने के संबंध में कोई सामान्य समय-सीमा नहीं है। यह बात किसी

व्यक्ति की प्रतिरक्षा पर निर्भर करती है। कुछ लोगों के लिए यह समय-सीमा 10 दिन हो

सकती है, तो दूसरों के लिए यह अधिक हो सकती है। यह इस बात पर भी निर्भर करता है

कि इस बीमारी का किस चरण में पता लगाया गया था। रिपोर्टों से यह भी पता चलता है

कि इस दूसरी लहर में युवा लोग बड़ी संख्या में अस्पताल में भर्ती कराए जा रहे हैं।

मणिपाल हॉस्पिटल्स में फेफड़े प्रत्यारोपण चिकित्सक और कर्नाटक के कोविड-19

कार्यबल के सदस्य डॉ. सत्यनारायण मैसूर ने कहा कि मौतों की रोकथाम में शुरुआत में

बीमारी का पता लगना महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बीमारी की जल्द पहचान के लिए

राज्य सरकारों को बुखार की क्लीनिकों को फिर से सक्रिय करने की जरूरत है। वैसे इसके

बीच ही चुनाव वाले राज्यों में लाखों की संख्या में जुट रही भीड़ और लगातार रैलियों के

आयोजन के बीच कोरोना की जांच की गति के बारे में कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।

लिहाजा हम मान सकते हैं कि चुनाव निपट जाने के बाद इन राज्यों का आंकड़ा भी तेजी से

ऊपर की तरफ जाएगा और तब कोई भी इसकी जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं होगा।

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