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कोविड 19 के मूल विषाणु की पहचान करने वालों में भारतवंशी वैज्ञानिक

  • अरिंजय बनर्जी है शोध वैज्ञानिक दल के सदस्य

  • अब उस अदृश्य विषाणु की पहचान कर ली गयी है

  • दुश्मन की पहचान के बाद दवा बनाना सहज होगा

  • वैश्विक चुनौती का निदान तलाशने की तरफ प्रगति

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः कोविड 19 यानी जानलेवा कोरोना वायरस के मूल विषाणु की पहचान करने

में अब सफलता मिल गयी है। कनाडा के विषाणु विशेषज्ञों के एक दल ने यह काम पूरा

किया है। उल्लेखनीय है कि यह सफलता हासिल करने वाले दल में एक भारतीय मूल के

वैज्ञानिक अरिंजय बनर्जी भी है। यह शोध दल मानता है कि इस विषाणु के अन्य तमाम

मिश्रणों से अलग कर दिये जाने के बाद इसके काम करने के तरीकों को समझना

आसान होगा। वह अपनी शोध को दुनिया भर के अन्य विशेषज्ञों के बीच बांट चुके हैं।

लिहाजा दुनिया भर में चल रहे शोध के माध्यम से इस विषाणु को स्थायी तौर पर

नियंत्रित करने का कोई रास्ता भी जल्द निकल आयेगा।

उल्लेखनीय है कि कोविड 19 अब पूरी दुनिया के लिए एक खतरा बन गया है। चीन में

जैसे जैसे इस वायरस का प्रकोप कम हो रहा है, दुनिया के कई अन्य देशों में अब यह

तेजी से फैलता जा रहा है। चीन से बाहर सबसे बुरी हालत इटली की है। इसके अलावा

अमेरिका और ईरान में भी इसका प्रसार हो रहा है। जापान और दक्षिण कोरिया में यह

वायरस तेजी से फैला था। लेकिन इन दो देशों में भी अब स्थिति नियंत्रण में आती नजर

आ रही है।

दो नमूनों से प्रारंभ की गयी थी विषाणु की जांच

कोरोना वायरस को ही वैज्ञानिक तौर पर कोविड 19 का नाम दिया गया है। इसके मूल

विषाणु की पहचान करने का काम दुनिया भर में चल रहा है। टोरंटो विश्वविद्यालय के

शोधदल ने इसकी पहचान करने तथा उसे अलग करने में सफलता पा ली है। इसी तरह

वाटरलू के मैकमास्टर विश्वविद्यालय के विषाणु वैज्ञानिकों को भी काफी सफलता

मिली है। कनाडा के शोध दल ने कोविड 19 से प्रभावित दो मरीजों से वायरस के नमूने

प्राप्त किये थे। उन्हीं नमूनों के आधार पर शोध को आगे बढ़ाया गया था। शोध

वैज्ञानिक मानते हैं कि अब जबकि वायरस को अलग किया जा सका है तो उसे मारने

का नया रास्ता भी शीघ्र ही तैयार हो जाएगा।

भारतीय मूल के वैज्ञानिक अरिंजय बनर्जी मैकमास्टर विश्वविद्यालय में शोध कर रहे

हैं। वह पहले से ही चमगादड़ और अन्य जीवों से फैलने वाले विषाणु के शोध से ही जुड़े

हुए हैं। श्री बनर्जी ने इस उपलब्धि के बारे में कहा कि सार्स कोव-2 वायरस की पहचान

हो चुकी है। इस जानकारी को दुनिया भर के वैज्ञानिकों के बीच उपलब्ध करा दिया गया

है। जाहिर है कि अब तमाम वैज्ञानिक मिलकर इसके निदान का कोई रास्ता जल्द ही

तैयार कर लेंगे। उन्होंने कहा कि जबतक वायरस के मूल की पहचान नहीं होती है,

चिकित्सकों के लिए भी अनुमान के आधार पर ईलाज की मजबूरी होती है। अब वायरस

अलग किया जा चुका है तो इस वायरस को मारने का उपाय सामने आते ही ईलाज भी

आसान हो जाएगा। इससे दुनिया भर में फैली इस महामारी से लड़ने का तरीका निकल

आयेगा। उनके मुताबिक पूरी दुनिया में इस वायरस की वजह से जो नुकसान हुआ वह

अत्यंत दुखद है। लेकिन अच्छी बात यह है कि अब इस अदृश्य शत्रु की पहचान हो चुकी

है। लिहाजा उससे लड़ने का हथियार भी विकसित किया जा सकेगा।

कोविड 19 की इस पहचान के बाद ईलाज होगा आसान

इस शोध में उनके साथ रहे डॉ समीरा मुबारका ने कहा कि उनलोगोंने सन्नीब्रूक

अस्पताल से ही वायरस के नमूने हासिल किये थे। अब इस वायरस को नियंत्रित करने

की दिशा में भी यह टीम काम कर रही है। लेकिन त्वरित फायदे के लिए दुनिया भर में

इस टीम ने अपनी जानकारी को साझा किया है। ताकि अन्य वैज्ञानिक भी अपने अपने

तरीके से इस पर काम कर कोई रास्ता निकाल सके। इस शोध दल ने वायरस को

बिल्कुल अलग थलग करने में सफलता पायी है। यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि

है। दुनिया भर में अब तक की सूचना के मुताबिक कोविड 19 से पीड़ित रोगियों की

संख्या दो लाख से अधिक हो चुकी है। वैसे आशंका है कि आने वाले दो सप्ताह में यह

संख्या और तेजी से ऊपर जा सकती है।

इस टीम की उपलब्धि पर टोरंटा विश्वविद्यालय के माइक्रोबॉयोलॉजिस्ट रॉब कोजाक

ने कहा कि यह खोज साबित करता है कि इस टीम ने पूरी दुनिया को राहत दिलाने की

दिशा में बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है। उन्होंने उम्मीद जतायी कि इस जैविक

शत्रु की पहचान कर लेने के बाद उससे समाप्त करने का उपाय भी अगले चंद हफ्तों में

निकल आयेगा


 

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