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केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर भागने वाले को रोकना जरूरी

केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर भाग जाना दंडित होने के बचने का एक आजमाया हुआ

नुस्खा है। इसे पहले भी झारखंड में अनेकों बार आजमाया गया है।  सरकार के

समीकरण बदल चुके हैं। इसके तुरंत बाद कुछ अधिकारी निश्चित तौर पर

केंद्रीय प्रतिनियुक्ति की सुरक्षित छांव में जाना चाहेंगे। लेकिन नई सरकार को ऐसे

अफसरों को दिल्ली जाने से रोकना चाहिए। सरकार के समक्ष चुनाव प्रचार के

दौरान जो मुद्दे उठाये गये हैं, उनकी जांच होने तक ऐसे अफसरों को यहां रोके रखना

जरूरी है ताकि आवश्यकतानुसार उन्हें त्वरित तौर पर दंडित भी किया जा सके।

इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि श्रमिक संगठनों की एकता खंडित होने

के इस दौरान में अखिल भारतीय सेवा के अफसरों की एकता निश्चित तौर पर श्रेष्ठ

है। इसी वजह से जांच के आदेश के बाद भी जांच की गाड़ी तब तक आगे नहीं बढ़ती

जबतक कि संबंधित अफसर सुरक्षित नहीं हो जाता। अन्य तमाम उदाहरणों को

अगर छोड़ भी दें तो हजारीबाग में एनटीपीसी के एक अधिकारी की वहां के

तत्कालिक उपायुक्त द्वारा पिटाई का मामला देखा जा सकता है। इस मार-पीट में

संबंधित एनटीपीसी अधिकारी गंभीर रुप से घायल हुआ था। उसे कई महीनों तक

ईलाज कराना पड़ा था। ऊंचे पद पर होने की वजह से उक्त अधिकारी ने भी अपने

अपमान को यूं ही भूला देना उचित नहीं समझा। संबंधित थाना, पुलिस अफसर

और राज्य के अधिकारियों द्वारा उनकी बातों को अनसुना किये जाने के बाद

मामला अंततः केंद्र तक जा पहुंचा। वहां केंद्रीय मानवाधिकार आयोग ने संबंधित

अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की अनुसंशा की है। उसके बाद से सारे अधिकारी

मिलकर उस एक अफसर को बचाने की जद्दोजहद में जुटे हैं।

केंद्रीय प्रतिनियुक्ते में जाने से पहले गड़बड़ी की जांच हो

इस बार झारखंड में कई बड़े टेंडरों और ठेका पट्टों के विवाद के अलावा भी बहाली,

सरकारी योजनाओं में हुए खर्च पर सवाल उठे हैं। हाल के दिनों में स्वयंसेवी संगठनों

के माध्यम से गांवों में शौचालय निर्माण का काम भी विवादों के घेरे में है। गिरिडीह

के एक इलाके में इसी मुद्दे पर वोट वहिष्कार भी हो चुका है। इसलिए तमाम ऐसे

विवादास्पद मामलों पर फैसला लेने वाले अधिकारियों को केंद्र सरकार की सुरक्षा में

भाग जाने का अवसर नहीं मिलना चाहिए।

इससे भ्रष्ट और घूसखोर अफसरों को दंडित करने का काम आसान होगा। साथ ही

पूरी ब्यूरोक्रेसी में यह स्पष्ट संकेत दिया जा सकेगा कि घूसखोर और बेइमान

अफसरों को झारखंड में बचने का रास्ता नहीं मिलेगा। वैसे इस जांच के दायरे में

कुछ वैसे अधिकारी निश्चित तौर पर आयेंगे, जो वर्तमान में सेवानिवृत्त भी हो चुके

हैं। लेकिन ऐसे लोगों को भी कठोर दंड देना सुनिश्चित करना झारखंड के भविष्य के

लिए बेहतर होगा क्योंकि बेलगाम अफसरशाही भी झारखंड की बदहाली में प्रमुख

भूमिका निभाती आयी है।

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