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जहर को जहर से काटने की पद्धति पर आगे बढ़ रहे हैं जेनेटिक वैज्ञानिक

  • कोरोना वायरस की नकल बनाकर उसके वैक्सिन पर काम

  • वायरस को भी बचाया है यही प्रोटिन कवच

  • एक सौ नमूनों में से चार पर परीक्षण हो गया

  • दस गुणा गति से प्रोटिन बनाने का काम जारी है

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः जहर को जहर से काटने की बात पुरानी प्रचलित कहावत है। इसका खास तौर

पर वैज्ञानिक जगत में सबसे अधिक इस्तेमाल सांप के जहर के लिए किया जाता रहा है।

यानी सांप के काटने की दवा भी सांप के जहर से ही तैयार की जाती है। अब जेनेटिक

वैज्ञानिकों ने इसी तकनीक को आजमाते हुए प्रयोगशाला में कोरोना वायरस की प्रति

तैयार कर ली है। इस इस कृत्रिम कोरोना वायरस से ही वैक्सिन बनाने का काम चल रहा

है। इसके लिए प्रयोगशाला में तैयार किये गये इस कृत्रिम कोरोना वायरस में

आवश्यकतानुसार जेनेटिक संशोधन भी किये जा रहे हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस

विधि से कोरोना के खिलाफ ज्यादा असरदार वैक्सिन बनाना संभव होगा और उसका

असर काफी दिनों तक भी कायम रह पायेगा। दरअसल इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों ने

कोरोना वायरस में मौजूद एक महत्वपूर्ण प्रोटिन को ही संशोधित किया है। यह प्रोटिन ही

शरीर के अंदर जाने के बाद इंसानी शरीर में मौजूद कोष के साथ जुड़कर घातक असर पैदा

करता है। इस प्रोटिन के काम करने के तरीके के बदला जा रहा है ताकि यह इंसानी शरीर

में पहुंचने के बाद अपना घातक प्रभाव नहीं छोड़ पाये। इस अनुसंधान के साथ कई

वैज्ञानिक दल जुड़े हुए हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सॉस (ऑस्टिन) में उस स्पाईक प्रोटिन को

ही अब वायरस से लड़ने के लिए तैयार किया जा रहा है। इसी काम के लिए प्रयोगशाला में

ही यह वायरस नये सिरे से बनाया गया है।

जहर को जहर से काटने के लिए स्पाइक प्रोटिन की नकल

मालूम हो कि यह स्पाईक प्रोटिन ही वायरस का वह आवरण है, जो दवाइयों से वायरस को

बचाये रखता है और इंसानी शरीर में मौजूद कोषों के साथ रिश्ता कायम कर वायरस को

वंशवृद्धि करने का अवसर प्रदान करता है। वंशवृद्धि होने के बाद ही यह वायरस गले से नीचे

उतरते हुए फेफड़ों और आंत को अपनी चपेट में ले लेता है।  इसी स्पाइक प्रोटिन के

प्रयोगशाला संस्करण में कुछ वैसी तब्दीलियां की जा रही है जो दस गुणा तेज गति से

काम कर सके। इस गति के तेज होने से वायरस के मरने और संक्रमित इंसान के स्वस्थ

होने की गति भी तेज हो जाएगी। दुनिया भर में चल रहे वैक्सिन अनुसंधान में से अनेक में

इसी स्पाइक प्रोटिन में ही सुधार करने का काम जारी है।

इस शोध से जुड़े यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सॉस के वरीय वैज्ञानिक जैसन मैक्लेन ने कहा कि

इस संशोधित किस्म के प्रोटिन के आकार और डोज को आवश्यकतानुसार कम या बेशी

किया जा सकता है। यह वैक्सिन उत्पादन की दिशा में बहुत काम आने वाला है। खास कर

इस विधि से मरीजों तक सबसे तेज गति से वैक्सिन पहुंच पायेगी। इस नये प्रोटिन का

नाम हेक्साप्रो रखा गया है। इसके पहले भी प्रयोगशाला में ऐसा ही प्रोटिन बनाया गया था

लेकिन वह ज्यादा देर तक टिक नहीं पाया था। नया प्रोटिन संस्करण ज्यादा स्थायित्व

वाला है। अधिक समय तक टिके रहने में सक्षम इस प्रोटिन को आसानी से रखा जा सकता

है और उसे भेजा भी जा सकता है। वैज्ञानिकों ने प्रारंभिक परीक्षण में यह जांच लिया गया

है कि यह ताप के दबाव को भी झेल सकता है। अधिक ठंड और सामान्य तापमान के बीच

भी यह अपने आकार को नष्ट नहीं होने देता। यह स्थिति ही किसी दीर्घकालीन वैक्सिन के

लिए सबसे अच्छी बात है।

अनेक नमूने तैयार कर सिर्फ चार पर काम आगे बढ़ाया

इस शोध के बारे में बताया गया हैकि इस स्पाइक प्रोटिन की पहचान कर लेने के बाद

वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में इसके एक सौ से अधिक नमूने तैयार किये थे। सारे नमूनों में

अलग अलग बदलाव कियागया था। इस प्रोटिन का इंसानी कोष के साथ संपर्क हो सके,

उसकी भी जांच कर ली गयी थी। इन तमाम परीक्षणों के माध्यम से ही नये संस्करण

तैयार हुआ है। जांच में एक सौ में से 26 ऐसे प्रोटिन स्वरुपों को अलग किया गया था, जो

ज्याद टिकाऊ थे। इनमें से सिर्फ चार को आगे के अनुसंधान के लिए चुना गया था। अब

हेक्साप्रो की मदद से दस गुणा अधिक तेजी से प्रोटिन तैयार करने की विधि को विकसित

किया जा रहा है। यह भी बताया गया है कि एंटीबॉडी टेस्ट में भी इसका इस्तेमाल किया

जा सकता है क्योंकि यह इंसानी खून में प्रतिरोधक है अथवा नहीं, उसकी तुरंत पहचान

बता सकता है।


 

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