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कोरोना ने दिखा दिया दवा के कारोबार का काला सच

कोरोना ने दिखा दिया वह सब कुछ जिसके बारे में हम सपने में भी नहीं सोच सकते थे।

पूरी दुनिया को इस वायरस की वजह से निश्चित तौर पर नुकसान बहुत अधिक हुआ है

लेकिन वास्तविक ज्ञान के मामले में यह वायरस हमारी आंख खोल गया है। खास तौर पर

दवा उद्योग का वह काला सच एक नहीं कई बार सामने आया है, जिसके बारे में हमलोग

सुनते थे लेकिन उसके बारे में हमारे पास ठोस जानकारी पहुंचने के पहले ही उसे रोक दिया

जाता था। ताजा उदाहरण कोरोना से बचाव के वे दो वैक्सिन हैं, जिन्हें भारत में आपात

स्थिति में इस्तेमाल की अनुमति दी गयी है। दोनों टीकों के संबंध में वैज्ञानिक बहस जारी

है। क्लीनिकल आंकड़ों पर सवाल दर सवाल उठ रहे हैं। इसके साथ ही आम लोगों को पता

चल पा रहा है कि दरअसल आंकड़ों के इस मकड़जाल में बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों ने अब

तक क्या कुछ गुल खिलाये हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट हो रहा है कि दरअसल दवा उद्योग

की व्यापारिक पहुंच कितनी फैली हुई है। जाहिर है कि इस कारोबार का अत्यधिक मुनाफा

ही अधिक कमिशन और विदेश दौरों की लालच में लोगों को फंसाता है। दवा के इस्तेमाल

की प्रक्रिया से जुड़े लोग इसी लालच के शिकार हैं लेकिन पहली बार कोरोना ने दिखा दिया

कि दवा कारोबार की इस दुनिया का असली सच क्या है। भारत में आपात स्थिति में

इस्तेमाल के लिए दो टीकों की मंजूरी दी गयी है। इनमें से एक पर कई प्रमुख वैज्ञानिकों ने

यह कहकर सवाल उठा दिया कि उसके क्लीनिकल ट्रायल के आंकड़े कहां हैं। जब बात

चर्चा में आयी तो दूसरी वैक्सिन कंपनी की तरफ से यह कह दिया गया कि उनके पास

आंकड़े अगर अभी नहीं हैं तो ऑक्सफोर्ड की वैक्सिन के पास भी भी तो पर्याप्त आंकड़े नहीं

है।

क्लीनिकल ट्रायल के आंकड़ों पर बड़े सवाल उठे

यहां तक कहा गया कि क्लीनिकल ट्रायल करने वाली कंपनियों में से किसी के पास भी

1,000 भारतीय लोगों पर दवा के सुरक्षित होने के आंकड़े नहीं थे, लेकिन उनकी कंपनी के

पास 25,000 से अधिक लोगों के आंकड़े उपलब्ध थे। सवालों के घेरे में आयी भारत

बॉयोटेक की तरफ से उनके प्रमुख एल्ला ने दावा किया कि कोवैक्सीन ने पशुओं के

परीक्षण से जुड़ी बेहतर जानकारी दी है। उन्होंने कहा, ‘यह सभी वैश्विक परीक्षणों के बीच

सबसे अच्छा है क्योंकि 100 फीसदी जानकारी पशुओं के परीक्षण से जुड़ी है। इसने

प्रभावशीलता का संकेत देने वाले एंटीबॉडी टाइटर को मजबूत तरीके से दिखाया है।’

चुनौती वाले परीक्षण ऐसे होते हैं जहां परीक्षण में इस्तेमाल किए जा रहे पशु या व्यक्ति

को इरादतन रोगजनक विषाणुओं के संपर्क में लाया जाता है ताकि यह देखा जा सके कि

टीका ठीक से काम कर रहा है या नहीं। भारत बायोटेक ने स्पष्ट किया है कि अनुमोदन के

लिए तीसरे चरण के परीक्षणों से कोई अंतरिम डेटा प्रस्तुत नहीं किया गया था। एक

क्लीनिकल शोध संगठन क्विनटाइल्स डेटा की जिम्मदारी संभाल रहा है और प्रोटोकॉल के

अनुसार एक बार जब नमूने में कोविड-19 से संक्रमित 146 लोग होंगे तब डेटा ज्यादा अन-

ब्लाइंडेड होगा। इसका अर्थ यह है कि कंपनी और जांचकर्ताओं को पता चल जाएगा कि

टीका किसे दिया गया और किसे प्रायोगिक दवा दी गई। दूसरी खुराक के 15 दिन बाद ही

कंपनी जानकारी का विश्लेषण शुरू करेगी। एल्ला ने कहा कि तीसरे चरण के डेटा मार्च के

करीब उपलब्ध होंगे। हालांकि, यह पूछे जाने पर कि क्या उनका टीका ब्रिटेन के स्ट्रेन

वायरस के खिलाफ काम करता है तब उन्होंने कहा कि ‘मुझे एक हफ्ते का समय दें, हमारे

पास वह डेटा होगा। मुझे विश्वास है कि यह काम करेगा।’

कोरोना ने दिखा दिया कि दुनिया का यह धंधा कितना काला है

एंटीबॉडी और मेमरी (टी सेल) सेल प्रतिक्रिया को बेअसर करना मुख्य बिंदु थे, जिनका

विश्लेषण कंपनी को मंजूरी दिलाने के लिए किया गया था। उन्होंने कहा, ‘यह एक ओपन

लेबल मंजूरी की तरह है जहां सुरक्षा और प्रभावशीलता पर लगातार नजर रखी जाती है।’

भारत बायोटेक को भरोसा है कि यह भारत सरकार द्वारा निर्धारित 50 फीसदी

प्रभावशीलता मानक को मात देगी। भारत बायोटेक के पास 2 करोड़ खुराक तैयार हैं ताकि

बांग्लादेश में परीक्षण शुरू किया जा सके। अब यह विचार का विषय है कि इतना जटिल

सब कुछ होने के बाद भी भारत में प्रकृति से इसका निदान खोजने का कोई प्रयास क्यों

नहीं हो रहा है। ऐसा इसलिए है कि इस किस्म के प्राकृतिक समाधान किसी को मोटा चंदा

अथवा विदेश दौरा का सारा खर्च उपलब्ध नहीं कराये हैं। जाहिर है कि दवा कारोबार का

कितना आर्थिक बोझ देश की आम जनता पर है यह तो कोरोना ने दिखा दिया। अब तो

बस इससे सबक लेकर आगे बढ़ने की जरूरत है

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