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कोरोना की वजह से वन्य जीवन पर प्राण का संकट

  • इस्तेमाल के बाद हम लापरवाही से फेंक देते हैं

  • उन्हें उठाने वाले जानवरों की जान पर शामत

  • इनको सही तरीके से निष्पादित करना चाहिए

  • पूरी दुनिया में नई किस्म की परेशानी नजर आयी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः कोरोना की वजह से जंगली जीवन पर दूसरे किस्म का संकट छा रहा है। जी नहीं

कोरोना विषाणुओँ से इन प्राणियों और पक्षियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। लेकिन

कोरोना से बचाव के लिए हम जो कुछ इस्तेमाल करते हैं, उससे वन्य प्राणियों क जान पर

आफत आ गयी है। पूरी दुनिया में यह एक जैसा नजर आ रहा है और उसके परिणाम भी

एक जैसे ही घातक नजर आ रहे हैं। शोधकर्ताओं ने इस स्थिति को रोकने के लिए इंसानों

को अधिक सावधानी बरतने की हिदायत दी है। इस बारे में बताय़ा गया है कि कोरोना से

बचाव के लिए हम जो मास्क और दस्ताने इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें जहां तहां फेंक देने की

वजह से यह संकट आयी है। जहां तहां पड़े इन कचड़ों को जानवर और पक्षी उठाकर ले

जाते हैं। कई बार इन्हीं की वजह से उनकी जान पर आफत आ जाती है। हाल के दिनों में

पर्यावरण प्रेमियों ने ऐसे कई पक्षियों, जानवरों और मछलियों को बचाया है, जो किसी

तरीके से इनमें फंस कर रह गये थे। इसके साथ ही इन्हें फेंक देने से प्लास्टिक का प्रदूषण

भी खतरनाक स्तर पर बढ़ रहा है। खास तौर पर बचाव के लिए पहने गये पीपीई किट

प्लास्टिक के बने होते हैं। उनके निष्पादन का सही इंतजाम नहीं होने की वजह से वे

जमीन में स्थान बना रहे हैं। बाद में वे पानी में बहते हुए आगे बढ़ते जा रहे हैं। यह दूसरे

किस्म के पर्यावरण के खतरे का कारण बनता जा रहा है। वैज्ञानिकों और पर्यावरण प्रेमियों

ने इस स्थिति के लिए इंसानों की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराते हुए ऐसे कचड़ों का सही

तरीके से निष्पादन करने की मांग की है। वरना वन्य जीवन को इससे अत्यधिक नुकसान

होगा, जिसकी भरपाई नहीं हो पायेगी।

कोरोना की वजह से इनका अधिक इस्तेमाल हो रहा है

कोरोना संकट के दौरान भी वन्य जीवन के रखरखाव से जुड़े लोगों ने हाल के दिनों में इस

खतरे का एहसास किया है। मास्क को सबसे अधिक पक्षी उठा ले जाते हैं। अपने घोंसलों में

ले जाने के बाद कई बार उनके पंख इसमें फंस जाते हैं। इस वजह से वे उड़ भी नहीं पाते।

अनेक पक्षियों को इस हालत से बचाया भी गया है। इसके अलावा आबादी के करीब

मंडराने वाले जंगली बंदर भी उत्सुकतावश हर ऐसे सामान को उठाते हैं। उन्हें भी खतरे का

एहसास नहीं होता लेकिन कई बार इसकी वजह से वे भी इसमें और खासकर पीपीई किट

में फंस जाते हैं। बंदरों का झूंड अपने साथी को बचाने की कोशिश में पीपीई किट में फंसे

बंदर का अधिक नुकसान कर देता है। वैसे इस बारे में पिछले वर्ष भी चेतावनी जारी की

गयी थी। लेकिन बाद में कोरोना संकट कम होने की वजह से लोगों का ध्यान इस ओर से

हट गया था। अब फिर से यह संकट सर उठाने लगा है। शोधकर्ताओं ने इस बारे में एक

रिपोर्ट भी प्रकाशित की है। जिसमें यह बताया गया है कि किस तरीके से जंगली जानवर

इसकी वजह से मर रहे हैं। कई बार पीपीई किट को फाड़कर उनके छोटे टुकड़ों को निगल

लेने की वजह से ही जानवरों और पक्षियों की जान जा रही है। इसी वजह से पीपीई किट,

मास्क और दस्तानों को सही तरीके स ठिकाने लगाने की बार बार वकालत की जा रही है।

शोध करने वालों ने इसके खतरों के बारे में कई स्पष्ट उदाहरण और तस्वीरें भी पेश की है।

सियार जैसे कई जानवर भी इसकी चपेट में आने की वजह से मरे हैं, उसका भी उल्लेख

इस रिपोर्ट में किया गया है।

वन्य प्राणी इन्हें अपने साथ ले जाते हैं और खतरा बढ़ता है

यह बताया गया है कि ब्राजिल में एक पेंग्विन ने एक मास्क को निगल लिया था। दूसरी

तरफ ब्रिटेन में सियार और जंगली जानवर इसे उठाने के चक्कर में उसी में फंस गये थे,

जिसकी वजह से उनका दम घुंट गया था। पिछले वर्ष नेदरलैंड में लीडेन में एक नहर की

सफाई के दौरान यह पाया गया कि एक लेटेक्स दस्ताने के अंदर एक मछली फंसी हुई थी।

लीडेन विश्वविद्यालय के जीव विज्ञानी लिसेलोटे रैंबोनेट और आउक फ्लोरियन हिमस्ट्रा

ने इस बारे में गहन शोध भी किया है। दोनों ने कोरोना से बचाव के लिए इंसानों द्वारा

इस्तेमाल किये गये सामानों को जहां तहां फेंक दिये जाने की वजह से जंगली जीवन को

क्या कुछ नुकसान पहुंचा है, उसके दर्ज किया है। अब पर्यावरण संरक्षण का काम करने

वाली संस्थाओं के स्वयंसेवकों ने जंगल के आस पास ऐसा कचडा नजर आने पर उन्हें

तुरंत हटा लेने की भी अपील की गयी है। वैसे अमेरिका सहित दुनिया के कई अन्य देशों में

पालतू बिल्ली और कुत्तों को भी इससे नुकसान होता हुआ पाया गया है। शोधकर्ता

वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि इंसान के एक बार काम आने वाले ऐसे उपकरणों का

निष्पादन सही ढंग से हो, यह इंसान की जिम्मेदारी है। जब इंसान अपनी यह जिम्मेदारी

सही ढंग से नहीं निभाते हैं, जब दुनिया के अन्य जीवन के लिए यही लापरवाही जानलेवा

बन जाती है। इसके पहले भी प्लास्टिक की वजह से समुद्र में ह्वेल से लेकर कछुओं तक

की जान जाने की सूचनाओं से हम वाकिफ हैं। इन वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि ऐसे

कचड़ों को अगर सही तरीके से निष्पादित करने का उपाय नहीं हो तो कमसे कम उन्हें

काटकर छोटे टुकड़ों में करना चाहिए ताकि वे वन्य जीवन के लिए जानलेवा ना बने।

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