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कोरोना जांच और ईलाज में पारदर्शिता का घोर अभाव

कोरोना जांच और ईलाज क्या कुछ हो रहा है, इस बारे में आम आदमी अब तक अंधेरे में

है। कई मामलों में यह भी पता चला है कि दरअसल जांच में गलती और अशुद्धि के पर्याप्त

अवसर हैं। इसलिए यह समय की मांग है कि सरकार के स्तर पर इसका एक स्पष्ट और

पारदर्शी पैमाना भी तय किया जाए। इस बात पर कोई बहस नहीं कर सकता कि निजी

अस्पताल मरीजों के ईलाज के बदले दरअसल भय का कारोबार करते हैं। मरीज के

परिजनों को कुछ इस तरीके से डराया जाता है कि वे पैसों की मांग के आगे विवश हो जाते

हैं। गंभीर किस्म की बीमारी में मरीज के परिजन को अच्छी तरह यह पता होता है कि उसे

ठगा जा रहा है लेकिन विकल्प के अभाव में वह कुछ नहीं कर पाता और सारा गोरखधंधा

अपनी आंखों के आगे होते हुए देखता रहता है। इसके चंद अपवाद भी हैं लेकिन उनकी

संख्या नगण्य है। दरअसल बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तरफ से डॉक्टरों को दिये जाने वाले

लाभ की जानकारी अब सार्वजनिक हो चुकी है। इसलिए नीति निर्धारकों में से अधिकांश

भी अंततः सिर्फ बहती गंगा में हाथ धोने को लालायित रहते हैं। अरबों रुपये की विदेशी

पूंजी के हर साल विदेश चले जाने के पीछे इसकी बहुत बड़ी भूमिका है। लेकिन अब कोरोना

के मामले में ऐसी छूट सिर्फ और सिर्फ राष्ट्रीय हितों पर जबर्दस्त कुठाराघात करने जैसा

ही होगा। देश की राजधानी दिल्ली से लेकर झारखंड की राजधानी रांची तक में कोरोना की

जांच में गड़बड़ी का मामला पकड़ में आ चुका है।

कोरोना जांच – गड़बड़ी दिल्ली से रांची तक 

इसलिए यह समय की मांग है कि अब मरीजों के परिजनों का यह जानने का अधिकार

मिले कि आखिर उसके मरीज के साथ हो क्या रहा है। कोरोना की वजह से जिन मौतों की

चर्चा हुई, वहां संक्रमण फैलने से रोकने के लिए लाश का खास तरीके से अंतिम संस्कार

किया गया। लेकिन लाश के अंतिम संस्कार से ही मामला समाप्त नहीं हो जाता। उसे

ईलाज के दौरान क्या कुछ दिया गया, उसके इस्तेमाल में कौन कौन सी दवाइयां आयी,

यह सारा कुछ अब संकलित किया जाना चाहिए। सरकारी अस्पतालों के साथ साथ निजी

अस्पतालों में भी एकरुपता कायम किया जाना भी समय की मांग है। वरना सक्षम लोग

निजी अस्पतालों में कोरोना का ईलाज कराने के बहाने बहुत कुछ गंवाकर लौट रहे हैं।

किसे कितनी महंगी और कौन सी दवा क्यों दी गयी, यह बताना बाध्यकारी किया जाना

चाहिए ताकि इस भय के कारोबार में राष्ट्रीय हितों पर परोक्ष कुठाराघात नहीं हो। दरअसल

चिकित्सीय गोपनीयता की आड़ में फिलहाल किसी गोरखधंधे को प्रोत्साहन देना राष्ट्रीय

अर्थव्यवस्था को और नुकसान पहुंचाने वाला साबित होगा। कोरोना के वैश्विक संकट की

वजह से देश से लेकर आदमी तक का बजट पूरी तरह बिगड़ चुका है। इस बुरी आर्थिक

परिस्थितियों के बीच किसी को भी विशेषाधिकार के तहत नाजायज लाभ की छूट तो

कतई नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि देश का बहुमत अभी भीषण संकट के दौर से गुजर रहा

है। वैसे कोरोना संकट ने जो परिस्थितियां हमारी बीच पैदा कर दी है, उससे हमें चिकित्सा

विज्ञान की तकनीकी पहलुओं के बीच छिपी व्यापारिक गतिविधियों को समझने का भी

पूरा अवसर दिया है।

वैश्विक संकट भारत को अपनी दशा सुधारने का अवसर देता है

लिहाजा यह भारत जैसे देश के लिए कठिन परिस्थितियों की वजह से उत्पन्न होने वाला

एक ऐसा अवसर हैं, जिसमें हम बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों और उनके देसी दलालों की

गतिविधियों पर भी स्थायी तौर पर अंकुश लगाने के लिए कोई नियम बना सकते हैं। जिस

संकट के दौर से देश गुजर रहा है, उसमें किसी को नाजायज छूट का अवसर प्रदान करना

भी राष्ट्रद्रोह के जैसा ही अपराध है। अगर हम इसमें पारदर्शिता का प्रावधान लागू कर पाये

और सभी अस्पतालों को ईलाज के बारे में मरीजों के परिजनों को जानकारी देने के लिए

बाध्य कर पाये तो हो सकता है कि कोरोना के मद में हो रहा बेहिसाब खर्च भी अपने आप

कम होने लगेगा। अभी की स्थिति में सभी ऐसे लोगों को मालूम है कि उनसे कोई हिसाब

मांगने नहीं आयेगा। इसलिए इसमें मनमानी की लगातार शिकायतें मिल रही हैं। इन

शिकायतों को दूर करने के साथ साथ हम अपनी स्वास्थ्य सेवा की आधारभूत संरचना की

असली जरूरतों को भी बेहतर ढंग से समझ पा रहे हैं। यकीन मानिये कि इस वैश्विक

संकट ने हमें सच्चाई से सीधे आंख मिलाने का यह अनोखा अवसर प्रदान किया है। इस

अवसर का अगर भारत लाभ उठा पाया तो निश्चित तौर पर देश को दीर्घकालीन लाभ

होगा। अलबत्ता इससे चिकित्सा को भी व्यापार का सबसे कुशल हथियार बना चुके अनेक

लोगों की कमाई निश्चित तौर पर बहुत कम हो जाएगी। ऐसे लोगों की कमाई कम हो जाए,

और देश की जनता के बहुमत का कोरोना जांच में कल्याण हो, यह समय की मांग है।


 

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