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भारतवर्ष में कोरोना के आंकड़े और परिणाम सतर्क रहने का संदेश देते हैं

  • कोरोना से ठीक होने के बाद भी सावधानी जरूरी

  • कोरोना संक्रमण का दूसरा दौर भी खतरनाक है

  • ठीक हो चुके मरीजों की एंटीबॉडी समाप्त होती है

  • संक्रमण की संभावना वाले सतहों से बचना जरूरी है

रांचीः भारतवर्ष में कोरोना के आंकड़े और उनके निष्कर्ष बार बार लोगों को कोरोना से

सावधान रहने की हिदायत दे रहे हैं। दुनिया के कई अन्य देशों में कोरोना का दूसरा हमला

इस रविवार से प्रारंभ हुआ है। इन देशों में फिर से कोरोना के नये मरीजों का पता चल रहा

है। भारतवर्ष की राजधानी दिल्ली में भी यह दूसरा दौर आया है। इन तमाम परिस्थितियों

के बीच कोरोना के आंकड़े देश को अधिक सावधानी बरतने की हिदायत दे रहे हैं। यह

इसलिए भी जरूरी है क्योंकि कई बार कोरोना संक्रमण फैलाने वाले अत्यधिक बीमार नहीं

पड़ते लेकिन उनके करीब आने वालों पर इसी वायरस का मारक असर हो रहा है। इसलिए

किसी भी माध्यम से इस वायरस के फैलने के प्रति सावधानी और सुरक्षात्मक रवैया

अधिक जरूरी है। भारतवर्ष के लिए यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह अत्यंत घनी

आबादी वाला देश होने के साथ साथ अपेक्षाकृत कम स्वास्थ्य सुविधाओं वाला देश है।

आंकड़े यह दर्शा रहे हैं भारतवर्ष में अभी कोरोना के खिलाफ सामुदायिक प्रतिरोधक

विकसित नहीं हो पाया है। साथ ही दूसरा खतरा यह है कि संक्रमण की समाप्ति के चंद

दिनों बाद स्वस्थ्य हो चुके मरीजों में कई विकार भी पैदा हो रहे हैं। कई बार कोरोना की

बीमारी से ठीक हो चुके मरीजों के प्लाज्मा डोनेशन के दौरान इसका पता चला है। दिल्ली

के एक ऐसे ही मरीज की चर्चा करें तो वह स्वस्थ होने के बाद अभी से करीब दो माह पूर्व

प्लाज्मा दान कर चुका था। लेकिन जब वह फिर से प्लाज्मा डोनेट कर आया तो पता चला

कि उसके शरीर की प्रतिरोधक शक्ति समाप्त हो चुकी है।

भारतवर्ष में कोरोना से ठीक होने वालों की एंटीबॉडी समाप्त 

जो एंटीबॉडी कोरोना से बचाव करती है वह उसके खून में तब मौजूद नहीं थी। इसलिए जो

कोरोना से जंग जीत चुके हैं, उन्हें भी पूरी तरह सावधान रहना चाहिए। कोरोना के हमलों

के तौर तरीकों के अध्ययन से यह पता चल चुका है कि संक्रमण के प्रारंभिक दौर में अगर

प्लाज्मा पद्धति से एंटीबॉडी विकसित किये जाएं तो वह वायरस की वंशवृद्धि को रोक देता

है और मरीज को जल्द स्वस्थ होने की स्थिति प्रदान करता है। इसी काम के लिए

कनवलसेंट प्लाज्मा का इस्तेमाल किया जाता है।

दूसरी तरफ कोरोना संक्रमण किस व्यक्ति से कहां तक पहुंचा, इसे पकड़ पाना अब भारत

जैसे देश में कठिन हो चुका है। प्रारंभ में कॉंटेक्स ट्रेसिंग का यह काम हुआ था। अब मरीजों

की संख्या ही इतनी अधिक है कि यह कर पाना संभव नहीं है। इसलिए सभी से और

खासकर कोरोना की बीमारी से स्वस्थ हो चुके लोगों को भी संक्रमण के दायरे में दोबारा

आने से बचने की सलाह बार बार दी जा रही है।

वायरक के संपर्क में आने से बचने के लिए नियमों का पालन जरूरी

अपने आस पास कोरोना का वायरस किसी के खांसने अथवा छींक से निकलने वाले सुक्ष्म

कणों से ही फैलता है। सार्वजनिक स्थानों पर मास्क का सही उपयोग कर इससे बचा जा

सकता है। ऐसा देखा जा रहा है कि लोग मास्क पहनने में भी लापरवाही बरत रहे हैं।

चिकित्सकों ने यह साफ कर दिया है कि सिर्फ दिखावे के लिए मास्क पहनने से संक्रमण से

नहीं बचा जा सकता क्योंकि अनेक लोग मास्क होने के बाद भी उसे सही तरीके से नहीं

पहन रहे हैं।

इस वायरस के फैलने के तौर तरीकों का पता होने की वजह से बचाव की पद्धति पर

आधारित लाईफ स्टाईल को अपनाने की सलाह दी जा रही है। अपने हाथ पर किसी

माध्यम से आने वाले वायरस को समाप्त करने का आसान तरीका सैनेटाइजर का

इस्तेमाल है। वरना शरीर के चमड़े पर यह वायरस आठ घंटे से लेकर 14 दिनों तक जिंदा

रह सकता है। तापमान जितना कम होता, वायरस उतने अधिक दिनों तक जिंदा रहेगा,

यह बात प्रमाणित है। ऐसे में हाथ में किसी तरीके से चिपकने वाले इस वायरस को समाप्त

करने का आसान तरीका अल्कोहल युक्त सैनेटाइजर का इस्तेमाल है। साबुन से दो मिनट

तक हाथ धोना भी बचाव का बेहतर रास्ता है।

देश में भी संक्रमण के तौर तरीकों पर अध्ययन का क्रम जारी

भारतवर्ष में संक्रमण के तौर तरीकों का अध्ययन करने वालों के मुताबिक लोगों के हाथ के

संपर्क में आने वाले हर स्थान पर वायरस चिपक सकता है। यह दरवाजे के हैंडल से लेकर

टीवी के रिमोट कंट्रोल और बिजली के स्विच भी हो सकते हैं। वैज्ञानिकों ने भारतवर्ष में

संक्रमण से बचाव के लिए यह बता दिया है कि किसी धातु की पर्त, शीशे की सतह और

सेरामिक्स की सतह पर यह पांच दिन रहता है। इसके अलावा लकड़ी पर चार दिन,

प्लास्टिक और स्टेनलेस स्टील पर भी पर दो से तीन दिन, कार्डबोर्ड पर 24 घंटे, तांबा पर

चार घंटे और अल्युमिनियम की किसी सतह पर दो से आठ घंटे तक संक्रमण फैलाने

लायक स्थिति में होता है। कागज पर यह कुछ मिनट से लेकर पांच दिन तक, कपड़ों पर

अनिर्धारित समय तक रहता है। कपड़ों के बारे में स्पष्ट पता इसलिए नहीं चला है क्योंकि

साबुन से धुलने की वजह से उनका वायरस स्वतः समाप्त हो जाता है।


 

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