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कोरोना के मरीजों पर कई अन्य प्रभाव भी पड़ते देखे गये

  • बीमार होने के बाद सूंघने की शक्ति में कमी

  • नाक के अलावा जीभ पर भी असर पड़ने की आशंका

  • मानसिक अवसाद भी है ऐसे मरीजों के लिए चुनौती

  • कई देशों में इस पर परीक्षण प्रारंभ कर दिया गया

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः कोरोना के मरीजों पर लगातार शोध चल रहा है। इन शोधों का नतीजा है कि

कोरोना संक्रमण सिर्फ फेफड़ों तक ही नुकसान नहीं पहुंचा रहा। कई ऐसे मरीज भी पाये

गये हैं जिन्होंने इस कोरोना संक्रमण की वजह से अपने सूंघने की शक्ति खो दी है। इसके

अलावा मानसिक अवसाद से पीड़ित ऐसे मरीजों की संख्या भी तेजी से बढ़ती जा रही है। 

जो दुनिया भर के डाक्टरों के लिए एक नई चुनौती बनी हुई है। दिमागी हालात बिगड़ने का

नतीजा है कि पश्चिमी दुनिया के अनेक ऐसे मरीज हैं जो कोरोना के मरीजों की गिनती में

शामिल थे उनके ठीक होने के बाद भी अस्पताल से नहीं छोड़ा गया है। दरअसल कोरोना के

मरीजों में से ऐसे लोगों को भूलने की बीमारी, अपने रिश्तेदारों को पहचान नहीं पाने की

कमी तथा मानसिक अवसाद के कई अन्य लक्षणों की वजह से अस्पताल में रोके रखा

गया है। परीक्षण में यह भी पाया गया है कि कई लोगों को सूंघने की कमी के अलावा

स्वाद की कमी भी महसूस हो रही है। वैसे दुनिया में इस किस्म की बीमारी पहले से ही

मौजूद है, जिसमें लोगों को सूंघने की कमी होती है अथवा किसी अन्य कारण से उन्हें

स्वाद नहीं मिल पाता है। अधिक उम्र में लोगों को भूलने की बीमारी होती है,

यह एक आम बात है। लेकिन कोरोना के मरीजों में यह लक्षण नजर आने के बाद

चिकित्सक नये सिरे से सभी परिस्थितियों का अध्ययन कर रहे हैं ताकि कोई विज्ञान

सम्मत नतीजा निकाला जा सके। वरना इससे पहले इस किस्म की कमजोरी की वजह

लंबी बीमारी, सर पर चोट जैसे कारणों को ही समझा जाता था।

कोरोना के मरीजों के पहले भी थी यह शिकायत

वायरल संक्रमण के दौरान भी ऐसी शिकायतें पहली भी मिली थी लेकिन उसका असर लंबे

समय तक नहीं रह पाया था। कोरोना के मरीजों में पहली बार ऐसा देखा जा रहा है।

जिसपर अभी शोध जारी है। चिकित्सा वैज्ञानिक इनके बीच के आपसी संबंधों को भी

तलाशने का काम कर रहे हैं। जर्मनी में कोरोना के दो ऐसे मामले आये हैं, जिसमें मरीज

इस किस्म की बीमारी से पीड़ित हुए हैं। दक्षिण कोरिया में तीस प्रतिशत लोगों में यह

लक्षण पाये गये हैं। फ्रांस सहित कई अन्य देशों में भी कोरोना के मरीजों से ऐसी शिकायत

की थी लेकिन उनकी शिकायत कुछ दिनों बाद अपने आप ही समाप्त हो गयी। चिकित्सा

विज्ञान से जुड़े लोग इसके इतिहास को भी खंगाल रहे हैं। इसी वजह से यह भी बताया गया

है कि अगर किसी को अचानक सूंघने में कमी महसूस हो अथवा भोजन के स्वाद में कमी

महसूस हो तो उसे खुद ही सात दिनों के लिए खुद को हरेक से अलग कर लेना चाहिए।

क्योंकि यह भी कोरोना के मरीजों का प्रारंभिक लक्षण हो सकता है। ऐसे मरीजों को सात

दिनों तक खुद को दूसरों से अलग रखने की सलाह इसलिए भी दी जा रही है क्योंकि अगर

उसमें कोरोना का संक्रमण है तो इन सात दिनों के भीतर उसकी बीमारी और बढ़ेगी और

अन्य़ कोरोना के मरीजों की तरह दूसरे लक्षण भी स्पष्ट होने लगेंगे।

त्वरित परीक्षण की विधि भी आजमायी जा रही

इस्रायल के वेइमैन इंस्टिटियूट ऑफ साइंस, और एडिथ वाल्फसन मेडिकल सेंटर ने इसके

लिए स्वाद और सूंघने की शक्ति परीक्षण की एक विधि भी तैयार की है। इसका परीक्षण

चल रहा है। इसके तहत लोगों को टूथपेस्ट और विनिगर जैसी चीजों का स्वाद परखने को

कहा जा रहा है । इन दोनों से सूंघने और स्वाद की पहचान करने का पता चल जाता है।

कोरोना के मरीजों पर हुए परीक्षण में यह प्रयोग अब तक सफल साबित हुआ है। चिकित्सा

वैज्ञानिक मानते हैं कि सूंघने और इस परेशानी की जानकारी मिलने के बाद अब इसे

इटली, ईरान, आयरलैंड सहित कई अन्य देशों में भी आजमाया जा रहा है। जिन देशों में

कोरोना के मरीजों की संख्या अधिक है, उनकी जल्द पहचान करने के लिए वैज्ञानिक हर

संभव तरीके आजमा रहे हैं। इसका एकमात्र मकसद कोरोना के मरीजों की पहचान कर

उन्हें दूसरों से अलग कर ईलाज प्रारंभ करना ही है। ताकि मरीज को मरने से बचाया जा

सके और दूसरों को संक्रमित होने से भी बचाया जा सके।


 

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