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दुनिया के अधिकांश लोग मानसिक और शारीरिक दबाव से गुजरे




  • अपनी असली परेशानी अधिकांश नहीं जानते

  • चार मुद्दों से समझ सकते हैं कि यह वाकई क्या है

  • सभी सरकारों को प्रोत्साहन योजना चलाना चाहिए

  • कोरोना महामारी का दूसरा नुकसान सर्वेक्षण में सामने आया

राष्ट्रीय खबर

रांचीः दुनिया के अधिकांश लोग कोरोना के कहर से प्रभावित हुए हैं। कुछ मामलों में तो

यह बात आचरण से सामने आ गयी लेकिन अधिकांश ऐसे मामलों का हमें पता अब

जाकर चला। यह जानकारी भी तब आयी जब वैज्ञानिकों ने इस पर एक व्यापक सर्वेक्षण

किया। सर्वेक्षण का नतीजा बतलाता है कि कोरोना महामारी और उससे उत्पन्न अन्य

परिस्थितियों की वजह से अधिकांश लोगों को मानसिक और शारीरिक दबाव से गुजरना

पड़ा है। अनेक लोग ऐसे हैं, जो इस दौरान खुद को संतुलित होने का भ्रम पाले रहे जबकि

अंदर ही अंदर उनके अंदर भी यह उथलपुथल चलता रहा है। साइराकूज विश्वविद्यालय

और यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास ( सेंट एंटोनियो) के शोध दल ने इस पर गहन शोध किया

है। शोध का दायरा आर्थिक तंगी से लेकर मानसिक परेशानियों तक रहा है। यानी दूसरे

शब्दों में इस सर्वेक्षण में इंसान के मानसिक, आर्थिक और शारीरिक स्थिति को शामिल

करते हुए उनपर एक व्यापक निष्कर्ष निकाला गया है।

अब दुनिया के अधिकांश लोग यह मान रहे हैं कि वे कोरोना संकट से उबरते चले जा रहे हैं

लेकिन वैज्ञानिक मानते हैं कि यह परोक्ष प्रभाव अब भी अधिकांश लोगों पर विद्यमान है।

सर्वेक्षण की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जब जैसे जैसे दुनिया इक कोरोना महामारी

के एक वर्ष के करीब पहुंच चुकी हैं, इसका मानसिक प्रभाव अधिक परिलक्षित होने लगा

है। इसके दायरे में खास तौर पर युवा और बच्चे आये हैं, जिनके आचरण में अब

चिड़चिड़ापन घर और आस पास अथवा स्कूल या कॉलेज के दूसरे लोग भी देख समझ

सकते हैं। मजेदार स्थिति यह है कि खास तौर पर युवा वर्ग दूसरों पर इस आचरण को देख

पा रहा है लेकिन वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि वे खुद भी कोरोना महामारी की इस परोक्ष

प्रभाव से बुरी तरह पीड़ित है।

दुनिया के अधिकांश लोग इस दौर में इसे झेल चुके हैं

वैज्ञानिकों ने इस सर्वेक्षण के साथ साथ इस पर अत्यधिक सावधानी बरतने की भी

हिदायत दी है। इस व्यापक सर्वेक्षण का यह भी निष्कर्ष है कि खास तौर पर 24 साल से 32

साल के युवाओं में यह परेशानी अधिक है। वे सभी जाने अनजाने में अपने अपने तरीके से

इससे जूझ रहे हैं और उबरने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन अपने अंदर चल रहे इस

उथलपुथल का असली कारण उनकी समझ में नहीं आ पा रहा है। अधिकांश लोग यह

समझ भी नहीं पा रहे हैं कि उनके आचरण में ऐसा बदलाव दरअसल क्यों है। अधिकांश

युवा तो यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि कोरोना की वजह से उत्पन्न बदलाव उनके अंदर

ऐसा कुप्रभाव डाल रहा है। इंसान के शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों में खास तौर पर स्वास्थ्य

में गिरावट, मानसिक दबाव, सोने में परेशानी और आत्महत्या करने जैसी सोच विकसित

होना है। यह सब कुछ दुनिया के अधिकांश लोग मानसिक और शारीरिक दबाव की वजह

से उत्पन्न परेशानी है। इससे पीड़ित व्यक्ति और खास तौर पर युवा इस बात को समझ

भी नहीं पा रहे हैं कि कोरोना ने उनके दिमाग और शरीर पर क्या दीर्घकालीन असर डाला

है। अरबन इंस्टिट्यूट के हेल्थ रिफॉर्म मॉनिटरिंग सर्वे में इसकी रिपोर्ट को संकलित किया

गया है। हर तीन में से एक व्यक्ति इस दौर से गुजर रहा है। इनमें से अधिकांश ने अपनी

परेशानी के बारे में चिकित्सकों से बात भी नहीं की है, वे इसे महज कोरोना लॉकडाउन की

वजह से आयी आर्थिक तंगी का दौर मानते हैं जबकि इसका असली कारण दूसरा ही है।

अभी बहुत सावधानी और संवेदना बरतने की जरूरत है

साइराकूज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कोलीन हेलफ्लिन ने कहा कि स्थानीय स्तर पर

युवा वर्ग इसे महज आर्थिक सोच मानता है। उनकी चिंता अपने भोजन, सुविधाओँ अथवा

कर्ज की अदायती में पैसे की तंगी तक सीमित है। स्थानीय स्तर पर एक सर्वेक्षण में करीब

14 हजार युवा इसी किस्म की परेशानियों का उल्लेख करते हैं। उन्हें पता नहीं है कि यह

दरअसल कोरोना और महामारी के दौरान हुए लॉकडाउन से उपजी हुई परेशानी है। जिसपर

दीर्घकालीन ध्यान दिये जाने की जरूरत है। इस पूरी रिपोर्ट के निष्कर्षों को प्रकाशित भी

किया गया है। रिपोर्ट प्रकाशित करने के पूर्व प्रत्यक्ष और परोक्ष तरीके से पूछे गये सवालों

के उत्तर का गहन विश्लेषण किया गया है। शोध प्रबंध को लीनर सेंटर फॉर हेल्थ प्रोमोशन

और सेंटर फॉर एजिंग एंड पॉलिसी स्टडीज ने प्रकाशित किया है। खास तौर पर युवाओं में

इसका असर गिरते स्वास्थ्य का है। इसका मुख्य कारण कोरोना से उपजी तनाव की

अत्यधिक स्थिति का दिमाग पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ना है। वैज्ञानिकों ने सरकारों से इन

परिस्थितियों पर ध्यान देते हुए खास तौर पर युवाओं की मानसिक परेशानी दूर करने के

लिए उनके लिए आर्थिक सहजता उपलब्ध कराने जैसी योजनाओं का अधिकाधिक

संचालन करने की बात कही है। इससे जिस मानसिक तनाव से ऐसे युवा लगातार

जूझ रहे हैं, वह कम होता और वे धीरे धीरे कोरोना से उपजे इस कुप्रभाव से भी खुद को

मुक्त कर लेंगे।



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