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कोरोना की अर्थव्यवस्था कड़वा सच यह भी है

कोरोना की अर्थव्यवस्था कड़वा सच यह भी है

कोरोना की अर्थव्यवस्था कैसी है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि इस वैश्विक

महामारी के संकट काल में अमीरों ने काफी गाड़ियां खरीदी। संकट का दूसरा पहलू यह है

कि अनेक मध्यमवर्गीय परिवारों के घर इस संकट में बिक गये क्योंकि उन्हें अपने लोगों

का ईलाज कराने पर अधिक पैसा खर्च करना पड़ा। पैसे का यह असमान बंटवारा कैसे हो

रहा है, इसे भी समझने की जरूरत है क्योंकि सरकारी नीतियों की वजह से खास तौर पर

देश का मध्यमवर्ग सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। इस सरकार को प्रचंड बहुमत देने में

इसी मध्यमवर्ग का सबसे बड़ा योगदान था, जो कांग्रेस के शासन से उब चुका था। विकल्प

के तौर पर नरेंद्र मोदी उनकी एकमात्र पसंद बने थे। लेकिन अब अचानक कोरोना की

महामारी ने अनेक किस्म की सच्चाई को सामने लाने का भी काम किया है। इस बात को

हर कोई समझ सकता है कि जब अनेक लोगों के घर बिक रहे हैं तो चंद लोग गाड़ियां

खरीद रहे हैं से इस कोरोना की अर्थव्यवस्था के वास्तविक आर्थिक सच्चाई को समझा जा

सकता है।  जाहिर सी बात है कि भारतवर्ष के गरीबों का पैसा देश के अमीरों की झोली में

डालने के लिए भी कोरोना एक अवसर के तौर पर सामने आया है। पिछले वर्ष के मार्च

महीने से अब तक आम आदमी की असली जरूरत दो वक्त की रोटी के अलावा अपने घऱ

के ईलाज का इंतजाम करना रह गया है। दूसरी तरफ दौरान अमीरों ने अनेक गाड़ियां

खरीदी है। दरअसल यह केंद्र सरकार की नीतियां ही हैं, जिसकी वजह से इस वैश्विक

महामारी के काल में भी पूंजी का असमान बंटवारा कुछ ऐसा हुआ है कि मध्यमवर्ग तेजी

से गरीबी की तरफ जा रहा है और अमीर मालामाल हो रहे हैं।

कोरोना की अर्थव्यवस्था पूंजी का असमान वितरण है

हाल के घटनाक्रमों से यह भी माना जा सकता है कि उपभोक्ता सामग्रियों पर कर का बोझ

भी मध्यम वर्गीय परिवार का बजट बिगाड़ता रहा है। स्थिति काफी हद तक संभल जाने के

बाद अब करों में रियायत का फैसला जीएसटी परिषद की बैठक में लिया गया है। इस बीच

लाखों लोगों के मकान ईलाज की जरूरतों को पूरी करने में बिक चुके हैं। सरकार की

नीतियों का ही परिणाम है कि मर्सिडीज बेंच ने अपनी नई गाड़ी इस कोरोना काल में ही

भारतीय बाजार में उतारी थी। कंपनी का लक्ष्य इस वर्ष यानी 2021 के अंत तक पचास

गाड़ी बेचने का था। यह लक्ष्य चंद महीनों में पूरा हो गया। दूसरी तरफ अनेक दूसरे लोगों

को अपने दो पहिया वाहन और यहां तक कि कमाई का एकमात्र साधन ऑटो रिक्शा या

साइकिल रिक्सा भी बेच देना पड़ा। आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि देश की औसत कमाई

तेजी से घटती जा रही है और यह पड़ोसी देश बांग्लादेश से भी नीचे आ चुका है। ऐसे में चंद

लोगों को ही यह फायदा कैसे मिल रहा है, इस सवाल का उत्तर को सरकारी कर प्रणाली में

छिपा है। कोरोना की दवाई और उपकरणों पर से कर का बोझ पहले भी कम किया जा

सकता है। अगर ऐसा होता तो गरीबों की बचत होती लेकिन जब गरीब का पैसा खर्च हुआ

तो वह पैसा दरअसल किसकी जेब में गया यह तो गाड़ियों की बिक्री से समझा जा सकता

है। हम अपने आस पास भी इस अंतर को देख समझ सकते हैं और सड़कों पर सरपट

दौड़ती शानदार गाड़ियों को मालिकों की कमाई का माध्यम समझ सकते हैं। दरअसल

सरकार ने ही यह व्यवस्था बनायी है जिसमें गरीब और गरीब हो जबकि अमीर और अमीर

बनता चला जाए।

यह सरकारी नीतियों की विफलता ही है

यह अपने किस्म की एक जबर्दस्त विफलता है, जो वर्तमान केंद्र सरकार के माथे पर है।

यहां तक कि कोरोना की लड़ाई में जो 35 हजार करोड़ का बजट रखने का एलान किया

गया था, इस बारे में चुप्पी है। सरकार ने वैक्सीन किस दर पर खऱीदी और निजी

अस्पतालों को किस दर पर उपलब्ध करायी, इस पर भी कोई जानकारी नहीं है। अपने

आस पास झांकने से हम समझ सकते हैं कि गरीबों का पैसा अमीरों तक पहुंचानें में केंद्र

सरकार की नीतियां सर्वाधिक जिम्मेदार रही। वैसे इस संकट के लिए आम आदमी भी कम

जिम्मेदार नहीं है क्योंकि उसने अपने आचरण से कोरोना की दूसरी लहर को इतना

विकराल होने का अवसर प्रदान किया। लेकिन इस स्थिति के बारे में सड़क पर ठेला लगाने

वाले किसी छोटे कारोबार से जानकारी हासिल कीजिए तो उसका उत्तर होगा कि मजबूरी

में भी ठेला लेकर निकलना पड़ता है। अगर ऐसा नहीं करेंगे तो परिवार का पेट कैसे भरेगा।

यह मजबूरी ही देश में इतना भीषण आर्थिक असमानता पैदा कर रही है, जिसकी कल्पना

पहले नहीं की गयी थी। कोरोना काल में जब गरीब अपनी संपत्ति बेच रहे थे, सरकार ने

चुपके से अमीरों के लाखों करोड़ रुपये माफ कर दिये। इस बात पर भी कोई खुलकर चर्चा

करना नहीं चाहता।

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