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पहले की तरह अपने हमले की पहचान नहीं दे रही वैश्विक महामारी

  • कोरोना की पहचान में नई निशानी जुड़े

  • छह नये लक्षण पहचाने गये इस रोग के

  • तेजी से जानकारी सांझा कर रहे वैज्ञानिक

  • मान्यता नहीं फिर भी प्लाज्मा थैरापी चालू

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः पहले की तरह अपने कोरोना संक्रमण की पहचान नहीं हो पा रही है। दरअसल

अब जो कोरोना के मरीज पाये जा रहे हैं, उनमें वे लक्षण अंतिम समय में दिखते हैं जो

पहले कोरोना संक्रमण होते ही नजर आने लगते थे। इसी वजह से अब कोरोना संक्रमण

होने के लिए नई निशानी जोड़े गये हैं। इन नये संकेतों से भी कोरोना संक्रमण होने का पता

लगाया जा रहा है। चीन में पहली बार इस वायरस का पता चलने के बाद ऐसा देखा गया

था कि गले में खरास के बाद सर्दी खांसी, छीक और बुखार आने के बाद सांस लेने की

दिक्कत होने लगती थी। अब यह पूर्व संकेत भी तब मिल रहे हैं जब मरीज की स्थिति

बहुत बिगड़ रही है। इसी वजह से हाल के दिनों में ईलाज के लिए आने वाले कोरोना के

मरीजों के लक्षण पहचान कर यह बताया गया है कि अब लगातार ठंड लगने, मांसपेशियों

में दर्द होने, सरदर्द, गुलाबी आंख और स्वाद अथवा गंध लेने की क्षमता में कमी से भी

कोरोना संक्रमण के संकेत मिल सकते हैं। अमेरिका में डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंसन ने इन्हें

कोरोना की पहचान में शामिल कर लिया है। इसके अलावा लगातार दर्द के साथ साथ सीने

में दबाव महसूस होना अथवा सूजे हुए होंठ अथवा चेहरा भी कोरोना संक्रमण होने की

निशानी हो सकती है। इन निशानी वाले लोगों को अस्पताल में भर्ती कर उनका ईलाज

किये जाने की जरूरत समझी गयी है।

अमेरिका में इस बीमारी पर युद्धस्तर पर चल रहे शोध के क्रम में लगातार नई नई

जानकारी जोड़ी जा रही है। अमेरिका ने अपनी सूचनाओं को दुनिया के साथ बांटने का

काम भी जारी रखा है। ताकि दुनिया के अन्य हिस्सों में कोरोना पर जो कुछ भी शोध चल

रहा है, उन्हें भी इन तथ्यों से अवगत कराया जा सके।

पहले की तरह मरीजों में लक्षण पहले नहीं दिख रहे

पहले की तरह आचरण नहीं करने की वजह से भी कोरोना के इतने अधिक फैल जाने को

जिम्मेदार माना जा रहा है। चीन में जब यह बीमारी फैलने लगी थी तो उसकी पहचान

प्रारंभिक लक्षणों से हुई थी। जैसे जैसे दिन बीत रहे हैं लक्षण भी नजर आना कम हो रहे हैं

लेकिन बीमारी की मारक क्षमता अब भी यथावत बनी हुई है। फिलहाल तीन स्तरों पर इस

बीमारी से लड़ने के लिए काम हो रही है। इनमें से पहला तो पूरी दुनिया में हैं, जिसमें

मरीजों की जांच और कोरोना संक्रमण का पता चलने के बाद उनका ईलाज है। दूसरी इस

वायरस का आचरण समझकर उसे निष्क्रिय बनाने वाली दवा तैयार करना है। तीसरा इस

वायरस के गुण दोष को समझने के बाद उसके लिए वैक्सिन बनाना है। इन तीनों पर एक

साथ काम चल रहा है और दुनिया भर के वैज्ञानिक अपने शोध को निरंतर बांटते भी जा

रहे हैं। यह तय हो चुका है कि यह संक्रमित व्यक्ति से ही फैलता है। लिहाजा संक्रमित

व्यक्ति के संपर्क में आने वाले तथा उसके इलाके के संक्रमण को सीमित रखने की

कार्रवाई की जा रही है। वैज्ञानिक यह मान चुके हैं कि पर्याप्त जांच नहीं होने की वजह से

असली जानकारी अब तक सामने नहीं आ पायी है। लेकिन अलग अलग तापमान में यह

वायरस कैसे काम करता है, इस पर भी अध्ययन हो रहा हैं क्योंकि यह सामान्य जानकारी

है कि प्रोटिन के आवरण में बचा रहने वाला वायरस गर्मी में नष्ट हो जाता है। इसकी

एकमात्र वजह गर्मी से उसके प्रोटिन के आवरण का नष्ट हो जाना ही है। शायद संक्रमित

देशों के अलग अलग तापमान और मौसम के आंकड़ों से भी इसकी पुष्टि हो पायेगी। इस

पर भी शोध चल रहा है।

कोरोना से ठीक हो चुके लोगों पर भी नजर रखना जरूरी

इसमें वर्तमान में यह चुनौती भी बड़ी हो चुकी है कि किन लोगों को कोरोना का संक्मण हो चुका है, उनपर लंबे समय के बाद क्या कुछ असर पड़ने जा रहा है। इस वजह से कोरोना के ईलाज के बाद अपने घरों को लौट चुके लोगों को भी अपनी सेहत पर पूरा ध्यान रखने और जरा सी ऊंच नीच होने पर डाक्टरों को सूचित करने को कहा गया है। चीन के वुहान शहर के झोंगनान

अस्पताल में यह पाया गया था कि उस अस्पताल के कुल 36 सौ कर्मचारियों में से कुछ

लोगों को संक्रमण के बीच होने के बाद भी कोई संक्रमण नहीं हुआ। उनक बाद में जांच की

गयी तो यह पाया गया कि उनके खून में ही वह एंटीबॉडी मौजूद थी जो कोरोना वायरस को

काम करने से रोकती रही साथ ही कोविड 19 वायरस का इसी एंटीबॉडी ने खुद ही खत्म भी

कर दिया। दुनिया भर के अनेक विश्वविद्यालय इस एंटीबॉडी पर भी अनुसंधान कर रहे

हैं। इसमें उल्लेखनीय प्रगति होने की वजह से ही अब दुनिया भर में मान्यता नहीं दिये

जाने के बाद भी प्लाज्मा थैरापी कोरोना के ईलाज में लोकप्रिय होती जा रही है।


 

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