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बंदरों पर चीन में किया गया प्रयोग पूरी तरह सफल होने का दावा

  • प्रथम वैक्सिन परीक्षण हुआ सफल

  • भारतीय प्रजाति का बंदर काम आया

  • पिकोवैक नामक वैक्सिन बनाने का दावा

  • 120 लैब कर रहे हैं वैक्सिन तैयार करने का काम

प्रतिनिधि

प्रकाशित खबर यहां पढ़ें

नईदिल्लीः बंदरों पर किया गया वैक्सिन प्रयोग सफल रहा है। ऐसे दावा चीन के वैज्ञानिकों

ने किया है। उन्हलोगों ने इस प्रयोग के सफल होने के बारे में जानकारी दी है। इसके पहले

इजरायल ने भी वैक्सिन अनुसंधान की दिशा में काफी तरक्की कर लेने की जानकारी

औपचारिक तौर पर दी थी। उसके अलावा भी कई देशों में इस पर युद्धस्तर पर काम चल

रहा है। हर प्रमुख प्रयोगशाला अपने अनुसंधान को तेजी से आगे बढ़ा रहा है। खबर है कि

इस काम से जुड़े वैज्ञानिक बिना आराम किये दिन रात काम कर रहे हैं ताकि दुनिया को

इससे राहत दिलाया जा सके। दूसरी तरफ यह वैक्सिन तैयार करना भी एक आर्थिक युद्ध

के जैसा है। इसमें जो वैक्सिन पहले तैयार कर लेगा वह दूसरों से तेजी से आगे निकल

जाएगा। खास तौर पर कोरोना संकट के समाप्त होने के बाद दुनिया की आर्थिक तस्वीर

बदलने जा रही है, यह पहले ही स्पष्ट हो चुका है।

चीन के बीजिंग स्थित सिनोवैक बॉयोटेक की तरफ से वैक्सिन के प्रयोग के पहले चरण के

सफल होने का दावा किया गया है। इनलोगों ने पिकोवैक नामक यह वैक्सिन तैयार किया

है। इसे बंदर के अंदर आजमाया गया था। इसके बारे में शोधकर्ताओं ने स्पष्ट कर दिया है

कि कोविड वायरस को ही जेनेटिक तौर पर सुधारने के बाद बंदरों के अंदर उसके इंजेक्शन

दिये गये थे। इसके बाद बंदरों के शरीर में असली कोविड के प्रतिरोध करने वाले एंटीबॉडी

तैयार हो गये। यह एंटीबॉडी इतना शक्तिशाली है कि वह असली कोविड 19 वायरस को

मार सकता है। जिस बंदर की प्रजाति पर इसे आजमाया गया है उसे रेहसूस माकाउ कहा

जाता है। यह बंदर दरअसल भारतीय प्रजाति का बंदर है।

बंदरों में इंसान के आंतरिक बनावट की काफी समानताएं

जिसे वायरस के परीक्षण के लायक इसलिए भी समझा गया क्योंकि उसकी आंतरिक

बनावट इंसानों से बहुत मिलती जुलती है । इस एंटीबॉडी का परीक्षण किये जाने के बाद

लगातार एक सप्ताह तक चौबीस घंटे इसकी निगरानी की गयी थी। तीन सप्ताह के बाद

यह पाया गया कि बंदर के फेफडे में जो कोरोना वायरस का संक्रमण था, वह पूरी तरह

समाप्त हो चुका है। चौथे सप्ताह में वायरस नहीं मिलने के बाद सारी जांच पूरी कर लेने के

बाद ही वैज्ञानिकों ने यह जानकारी सार्वजनिक की है। दूसरी तरफ इसी प्रजाति के जिन

बंदरों को यह पिकोवैक का इंजेक्शन नहीं दिया गया था, उनमें क्रमशः न्यूमोनिया के

भीषण लक्षण बढ़ते चले गये। पहली बार यह घोषणा की गयी है कि इस प्रयोग के सफल

होने के बाद अप्रैल के मध्य से इंसानों पर भी इसका क्लीनिकल ट्रायल चल रहा है। इसी

क्रम में यह भी पता चला है कि चीन की सेना की एक संस्था ने भी वैक्सिन तैयार किया है,

जिसके बारे में विस्तृत जानकारी नहीं देने के बाद भी सिर्फ इतना बताया गया है कि

इंसानों पर उसका भी क्लीनिकल ट्रायल चल रहा है।

दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दोबारा चुनाव लड़ने के बीच ही आयी इस

आपदा को भी अपने चुनावी हथियार बनाते हुए अमेरिका में भी शीघ्र ही वैक्सिन तैयार

कर लेने की बात कही है। वह इस वैक्सिन के लिए कोष संग्रह के बहाने भी अपनी

लोकप्रियता का ग्राफ ऊपर ले जाना चाहते हैं। इस वजह से अमेरिका में भी वैक्सिन

अनुसंधान का काम बहुत तेज हो चुका है। अमेरिका को उम्मीद है कि इस साल के अंत

तक वह अपना वैक्सिन तैयार कर लेगा।

दुनिया के अन्य हिस्सों में भी चल रहा है अनुसंधान

साथ ही यूरोप, एशिया और ऑस्ट्रेलिया के देशों में भी इस पर काम चल रहा है। भारत में

भी खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दूसरों के भरोसे रहने के बाद स्वदेशी तकनीक के आधार

पर अपना वैक्सिन बनाने की वकालत की है। वर्तमान में जो वैश्विक परिस्थिति है, उसमें

अगर भारत वैक्सिन बनाने में कामयाब होता है तो गरीब देश सबसे पहले भारत से ही

वैक्सिन खरीदना चाहेंगे, क्योंकि कई अन्य दवाओं की चर्चा में भारतीय दवा उद्योग की

क्षमता की जानकारी अन्य देशों को मिल चुकी है। पहले इन देशों के दवा कारोबार पर

बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बदौलत विकसित देशों का ही कब्जा था।

कुल मिलाकर वैज्ञानिक आकलन है कि दुनिया भर में अभी वैक्सिन बनाने की कुल 120

परियोजनाएं चल रही हैं। सभी अलग अलग तरीके से कोरोना वायरस की जेनेटिक

संरचना का अध्ययन कर उसकी बारिकियों के आधार पर उसका वैक्सिन बनाने का काम

कर रहे ह । इनमें से सात में क्लीनिकल ट्रायल होने की जानकारी मिली है। इसके अलावा

82 अन्य अनुसंधानों में पशुओं पर परीक्षण चल रहा है।


 

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