सरकारी एजेंसियों के इस्तेमाल का नया विवाद

कोलकाता प्रकरण की परत दर परत खुलती राजनीति
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सरकारी एजेंसियों का राजनीतिक मकसद से इस्तेमाल करने का आरोप कोई नया नहीं हैं।

कांग्रेस के जमाने से लेकर अब भाजपा पर लगातार यह आरोप लगते रहे हैं।

लेकिन यह पहला अवसर है जब सीबीआइ और कोलकाता पुलिस

इसी राजनीतिक लड़ाई में हथियार के तौर पर इस्तेमाल हो रहे हैं।

यह भी देश को भविष्य के लिए ऩई चिंता देकर जा रहा है।

अलबत्ता हो सकता है कि इसी विवाद की वजह से सरकारी एजेंसियों के

दुरुपयोग पर रोक थाम के लिए कोई नया रास्ता इसी से निकलकर सामने आये।

कोलकाता के पुलिस आयुक्त राजीव कुमार को गिरफ्तार करने गयी सीबीआइ की

टीम को कोलकाता पुलिस ने धक्के मारकर बाहर निकाल दिया।

बाद में भले ही उन्हें छोड़ दिया गया लेकिन यह साबित हो गया कि

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री अपने अधिकार क्षेत्र के मामले में बेहतर संवेदनशील और आक्रामक हैं।

दूसरी तरफ सीबीआइ की कार्रवाई के पहले ही सोशल मीडिया में इसकी चर्चा होना भी

यह साबित कर देता है कि दरअसल सीबीआइ बतौर राजनीतिक हथियार ही इस्तेमाल हो रही है।

पश्चिम बंगाल की सरकार ने कुछ अरसा पहले ही सीबीआइ को अपने राज्य में

कार्रवाई का दिया अधिकार वापस ले लिया है।

इसी तरह आंध्रप्रदेश और अब छत्तीसगढ़ ने भी ऐसा फैसला किया है।

दिल्ली में पहले से ही भाजपा वनाम आम आदमी पार्टी की लड़ाई में सीबीआइ

सहित दिल्ली पुलिस भी राजनीतिक हथियार होने का आरोप झेल रही है।

लेकिन इन तमाम बातों के बीच से जो असली सवाल उभरकर सामने आ रहा है,

वह देश की जनता के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है।

कोलकाता के पुलिस आयुक्त के मामले पर गौर करें तो जो तथ्य सामने लाये गये हैं,

उसके मुताबिक उनसे सीबीआइ को सारदा चिट फंड घोटाला के मामले में पूछ-ताछ की जाएगी।

सीबीआइ की तरफ से दूसरे लोग यह दलील दे रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर यह कार्रवाई हो रही है।

तो सीबीआइ को इस बात की भी जानकारी होनी चाहिए कि

एक शीर्ष पुलिस अधिकारी के यहां छापा मारने के लिए अनुमति की जरूरत पड़ती है।

सीबीआइ की तरफ से यह सफाई भी दी गयी है कि दरअसल उनकी टीम

पुलिस आयुक्त से पूछ-ताछ करने गयी थी।

दूसरी तरफ कोलकाता पुलिस आयुक्त के घर के सामने से जिन चालीस सीबीआइ अफसरों को

घेरा गया था, क्या वे सभी पूछ-ताछ की टीम का हिस्सा थे, यह तो सीबीआइ को स्पष्ट कर देना चाहिए।

मामला अब सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच चुका है।

तो सीबीआइ यदि चाहती तो पहले भी सर्वोच्च न्यायालय से स्पष्ट आदेश हासिल कर

उसे राज्य सरकार को दे सकती थी।

वैसी स्थित में आदेश का अनुपालन नहीं होने की जिम्मेदारी पश्चिम बंगाल सरकार की होगी।

अब इसके पर्दे के पीछे के तथ्यों को भी जान लेना चाहिए कि

जिस संयुक्त निदेशक की अगुवाई में यह कार्रवाई हो रही है,

वह पंकज श्रीवास्तव दरअसल मध्य प्रदेश कैडर के आइपीएस अधिकारी हैं।

हाल ही में मध्यप्रदेश के डीजीपी को ही सीबीआइ का निदेशक बनाया गया है।

इन तमाम लोगों को पर्दे से पीछे से आदेश कौन दे रहा है, यह नाम तेजी से सामने आता जा रहा है।

वह नाम राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का है।

अब यह सवाल भी उठने लगे हैं कि अजीत डोभाल की गतिविधियों का हिसाब

किताब रखने की वजह से ही पूर्व सीबीआइ निदेशक आलोक वर्मा सरकार के कोपभाजन बने।

लेकिन आलोक वर्मा के तरकश के सारे तीर समाप्त हो चुके हैं, ऐसा मान लेना भी गलती होगी।

आने वाले दिनो में सीबीआइ पूर्व निदेशक की झोली से और बारूद निकलना तय है।

इस एक पक्ष की बात के बाद दूसरे पक्ष पर नजर डालें तो यह सवाल लाजिमी है कि

एक अधिकारी के बचाने के लिए मुख्यमंत्री की इतनी जद्दोजहद क्यों।

क्या सारदा चिटफंड घोटाला के मामलों में तृणमूल के जिन नेताओं का नाम आया है,

उससे ममता बनर्जी को परेशानी है।

अपने कार्यक्षेत्र में सीबीआइ को अनुमति नहीं देने की बात तो समझ में आती है।

लेकिन सिर्फ एक अधिकारी के लिए पूरी सरकार को दांव पर लगाते हुए नये सिरे से विद्रोही तेवर अख्तियार कर लेना भी कहीं चुनावी चाल तो नहीं हैं।

ममता के इसी बगावती तेवर की वजह से पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा शासन

आंधी में तिनके की तरह उड़ चुकी थी।

लिहाजा अब तो वहां आमने सामने सिर्फ तृणमूल और भाजपा ही हैं।

ऐसे में क्या ममता भी नये सिरे से राज्य की अस्मिता की बात कर अपना वोट बैंक सुरक्षित करने की कवायद करने में जुटी हैं।

लेकिन दोनों तथ्यों से यह स्पष्ट है कि सरकारी एजेंसियों का गलत उपयोग हो रहा है

और यह अंततः एजेंसियों की अहमियत को ही समाप्त कर डालेगी।

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