पृथ्वी के नजदीक आये उल्कापिंड को लेकर विवाद बढ़ा

पृथ्वी के पास से गुजरने वाला सिगारनूमा उल्कापिंड
  • सिगार के आकार का है यह पिंड

  • धीमी होने के बदले रफ्तार हुई तेज

  • ऊर्जा के स्रोत की पहचान में जुटे वैज्ञानिक

प्रतिनिधि



नईदिल्लीः पृथ्वी के करीब से गुजरने वाले एक उल्कापिंड को लेकर बहस छिड़ी हुई है।

कुछ ने अभी से ही इसे किसी अन्य दुनिया के स्पेस अभियान का कबाड़ घोषित कर दिया है।

कुछ भी हो इस उल्कापिंड के आचरण की वजह से लोगों का ध्यान इसकी तरफ आकृष्ट हुआ है।

वैज्ञानिकों ने इस उल्कापिंड का नाम ओउमुआमुआ रखा है।

इसके चालचलन को अब तक वैज्ञानिक सही तरीके से नहीं पकड़ पाये हैं।

पिछले सितंबर माह में जब यह हमारी सौरमंडल के अंदर आया था,

तभी से इसने वैज्ञानिकों का ध्यान आकृष्ट किया है।

अंतरिक्ष वैज्ञानिक यह मान रहे थे कि इस सौरमंडल के अपने कारणों की वजह से इसकी गति धीमी होगी।

लेकिन इस आकलन को गलत साबित करता हुआ यह पिंड अधिक गति प्राप्त कर आगे निकल गये।

जब यह उल्कापिंड तेजी से आगे निकला तो यह दलील दी गयी कि

शायद इसके अंदर से गैस निकलने की वजह से इसे गति प्राप्त हो रही है।

बाद में यह पता चला कि इसके आकार में कोई बदलाव नहीं आया है।

यानी इस उल्कापिंड से गैस उत्सर्जन की कोई घटना नहीं घटी है।

उसके बाद से यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि इस सौरमंडल में प्रवेश के बाद

इसकी रफ्तार तेज होने की असली वजह क्या है।

इसी वजह से अब वैज्ञानिक इसे धूमकेतु के जैसा आचरण करने वाला मान रहे हैं

जो स्थानीय परिस्थितियों को नजरअंदाज कर अपने तरीके से आगे बढ़ने में सक्षम है।

क्योंकि अगर सिर्फ गैस निकलने की वजह से रफ्तार पकड़ने की वजह होती

तो इसे अपने चारों तरफ घूमना भी चाहिए था।

उस पर नजर रखने वालों को  यह सीधी रेखा में आगे बढ़ती हुई दिखी है।

उसमें कोई घूमने की प्रक्रिया भी नहीं देखी जा रही है।

पृथ्वी से लगातार नजर रखे हुए हैं अंतरिक्ष वैज्ञानिक

इस वजह से अब इस सिद्धांत पर विचार किया जा रहा है कि

क्या यह पिंड सूर्य की रोशनी से ऊर्जा प्राप्त कर आगे बढ़ रहा है।

अगर ऐसा है तो सौर ऊर्जा के इस्तेमाल के नये आयाम भी वैज्ञानिकों के सामने आयेंगे।

सामान्य वैज्ञानिक सिद्धांत है कि किसी भी वस्तु के अंतरिक्ष में तैरते रहने के लिए भी ऊर्जा की जरूरत पड़ती है।

अगर यह वस्तु किसी निर्धारित मार्ग पर आगे बढ़ रही है

तो निश्चित तौर पर उसे आगे बढ़ने के लिए कहीं से ऊर्जा मिल रही है।

यह ऊर्जा कहां से मिल रही है, यह वैज्ञानिक शोध का विषय बन गया है।

सिगार के जैसे आकार वाले इस पिंड के स्वरुप पर वैज्ञानिकों की अलग अलग राय है।

सभी ने सिर्फ इस बात पर सहमति जतायी है कि अंतरिक्ष में भ्रमण करते हुए

इसने ऐसा आकार अख्तियार कर लिया है, जो यहां से हर दबाव को झेलते हुए आगे बढ़ सकती है।

इसे आगे बढ़ने के कारणों का पता चलने के बाद दुनिया के वैज्ञानिक भी अपने अंतरिक्ष अभियान में इसी तकनीक का इस्तेमाल करना चाहते हैं।

इससे अंतरिक्ष यान का आकार छोटा हो जाएगा

और अंतरिक्ष से ही आगे बढ़ने की ऊर्जा हासिल करने में सक्षम होने की वजह से

यह ज्यादा कार्यकुशल यान साबित होगा।



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