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निगम में कर्मचारियों के वेतन का ठेका प्रथा कर्मचारियों के लिए भी घाटे का सौदा

  • बाहर की कई आउट सोर्सिंग कंपनियां पैसे लेकर हो जाती हैं गायब
  •  हर बार मजदूर ठगे ही रह जाते हैं
  •  ऐसी कई कंपनियों ने की धोखाधड़ी
  •  कामगारों को नहीं मिलता उनका वेतन
संवाददाता

रांची : निगम में कर्मचारियों के वेतन का ठेका प्रथा कर्मचारियों के लिए भी घाटे का सौदा

साबित हो रही है। पिछले अनुभव के मुताबिक यही पता चलता है कि आउट सोर्सिंग का

काम करने वाली कई कंपनियां पैसा लेकर बिना भुगतान के गायब हो चुकी हैं। दूसरी तरफ

आउट सोर्सिंग से सफाई का क्या हाल होता है, इसे भी रांची के नागरिक पिछले कई वर्षों से

लगातार देख और झेल रहे हैं। नगर निगम अपने काम दूसरी कंपनियों से कराने के लिए

ही ऐसी आउट सोर्सिंग किया करती हैं। लेकिन बाद में पता चलता है कि आउट

सोर्सिंग कंपनियां मजदूरों का पैसा मारकर गायब हो चुकी हैं। शिकायत इस बात की भी है

कि निगम के संविदा कर्मचारियों का वेतन लेकर भागने के अलावा ऐसी कंपनियां उनके

पीएफ का पैसा भी लेकर रफूचक्कर हो चुकी हैं। हरमू इलाके के वार्ड 26 के पार्षद अरुण झा

ने आरोप लगाया है कि हजारों सफाईकर्मियों का पैसा लेकर दोनों ही कंपनियां रफूचक्कर

हो चुकी हैं। बता दें कि सफाई के काम के लिए निगम ने पहले दो बड़ी कंपनी ए टु जेड और

एस्सेल इंफ्रा को आउससोर्स किया था। हालांकि पार्षदों की नाराजगी को देख दोनों

कंपनियों को टर्मिनेट किया जा चुका है। शहर की सफाई व्यवस्था अब निगम के जिम्मे

है। पार्षद का कहना है कि निगम ने सफाई के काम के लिए एस्सेल इंफ्रा को आउटसोर्स

किया था।

निगम  से कंपनी एवज में  मोटी रकम भी मिल जाती है

कंपनी ने काम में तो लापरवाही तो दिखायी ही, साथ ही निगम में कार्यरत

लेबर, सुपरवाइजरों सहित करीब 1000 व्यक्तियों का 2 से 3 महीना का वेतन लेकर फरार

हो गयी। कंपनी का मन यहीं तक नहीं भरा। कंपनी के अधिकारियों ने कर्मियों के वेतन से

पीएफ तो काटा, लेकिन यह राशि पीएफ एकाउंट में नहीं भरा। बाद में कंपनी इन कर्मियों

के करोड़ों रुपये लेकर फरार हो गयी। अरुण झा यहीं तक नहीं रुके। उन्होंने एस्सेल इंफ्रा से

पहले काम कर चुकी कंपनी ए टू जेड पर भी गबन का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि ए टू

जेड भी निगम के संविदाकर्मियों और सुपरवाइजर का डेढ़ महीना का वेतन लेकर फरार हो

गयी है। उन्होंने कहा कि सुपरवाइजरों को करीब 12000 और लेबर को प्रतिमाह करीब

6000 रुपये मिलते हैं। इस हिसाब से कंपनी करोड़ रुपये तक कि राशि लेकर फरार हुई है।

दोनों कंपनियां जब राजधानी में सफाई का काम करती थीं, तो उस समय भी पीड़ित कर्मी

और सुपरवाइजर इन मुद्दों को लेकर आवाज उठाते थे। यहां तक कि वेतन नहीं मिलने से

नाराज कर्मी कई बार हड़ताल पर गये थे। कर्मियों की इस आवाज को मीडिया ने भी

प्रमुखता से जगह दी थी। इसके बावजूद कर्मियों के वेतन की समस्या का निदान न उस

समय हुआ, न ही अब। अरुण झा ने अब मेयर, डिप्टी मेयर, नगर आयुक्त से आग्रह किया

है कि इन कर्मियों के ऊपर निगम को दया करनी चाहिए। इनके वेतन एवं पीएफ में हुए

नुकसान की भरपाई निगम को कंपनी को भुगतान की जानेवाली राशि से काट कर करनी

चाहिए।


 

 

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