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लगातार आ रहे भूकंप को झटकों को लेकर हैरान हैं वैज्ञानिक

  • एक सप्ताह में ढाई सौ से अधिक झटके आये

  • जीवित ज्वालामुखी है माउना लोआ का पहाड़

  • बहता हुआ लावा अंततः समुद्र में जा गिरता है

  • यंत्र जमीन के नीचे मैग्मा का कोई संकेत नहीं दे रहे

राष्ट्रीय खबर

रांचीः लगातार आ रहे हैं छोटे छोटे भूकंप। यह घटना हवाई के ज्वालामुखी पर्यवेक्षण केंद्र

में लगातार दर्ज भी की जा रही है। माउना लोआ के दक्षिण पूर्व के इलाके में इस किस्म से

लगातार आ रहे भूकंपों ने वैज्ञानिकों को चकरा रखा है लेकिन वे इन घटनाओं की वजह से

काफी सतर्क भी हैं।

वीडियो में देखिये यहां की वास्तविक और भौगोलिक स्थिति

वैज्ञानिकों की तरफ से इतनी सतर्कता वहां की इस जमीन की गहराई में निकलने वाले

लावा के प्रवाह का कोई संकेत भी नहीं मिल रहा है। आम तौर पर जब मैग्मा के प्रवाह के

संकेत मिलने लगते हैं तो यह समझा जाता है कि ज्वालामुखी में फिर से विस्फोट होने

वाला है। इन्हीं कारणों से वैज्ञानिक इस प्रारंभिक निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि शायद यहां का

ज्वालामुखी नये सिरे से नीचे बैठ रहा है। इसकी वजह से जमीन में ऐसे झटके महसूस

किये जा रहे हैं।

शायद नीचे की तरफ बैठता जा रहा है ज्वालामुखी

यूएसजीएस के वैज्ञानिक लगातार इस पर नजर रखे हुए हैं। दरअसल उनकी चिंता फिर से

माउना लोआ की ज्वालामुखी के सक्रिय होने को लेकर है। जो फिलहाल ऐसा होता हुआ

नजर नहीं आ रहा है। दूसरी तरफ जमीन के ऊपर उसकी सतह में नजर आने लायक

बदलाव भी नहीं दिख रहे हैं। कई बार यह बदलाव जमीन के अंदर होने लगता है और यह

गंभीर स्थिति बनती है क्योंकि कभी भी जमीन का ऊपरी सतह इसकी वजह से अचानक

ही धंस जाता है। ऐसा सिर्फ जमीन के लिए ही नहीं होता बल्कि पृथ्वी की गहराई में

टेक्नोटिक प्लेटों की रगड़ से भी ऐसी परिस्थितियां बनती आयी है।

लगातार झटकों की गहराई अधिक भी नहीं है

लगातार आ रहे भूकंप के इन झटकों के बारे में प्रारंभिक आकलन यह है कि पूर्व मे हुए

ज्वालामुखी विस्फोट और भूकंप की वजह से जमीन के अंदर जो कुछ उभार पैदा हुआ था,

वह अब जाकर फिर से नीचे बैठता चला जा रहा है। लेकिन ज्वालामुखी के फिर से सक्रिय

होने जैसा कोई खतरा फिलहाल नहीं नजर आ रहा है। यह बताते चलें कि माओना लोआ

दुनिया के सबसे अधिक सक्रिय ज्वालामुखी का इलाका है। इसलिए वहां लगातार आ रहे

झटकों की वजह से वैज्ञानिक भी एलर्ट पर हैं। पिछले एक सप्ताह में वहां ढाई सौ से

अधिक ऐसे भूकंप के झटके महसूस किये गये हैं। इनमें से 163 तो ज्वालामुखी के नीचे के

थे जबकि शेष उसके ऊपरी हिस्सों के थे। इनमें से अधिकांश भूकंप रिचेटर स्केल पर 2.5

से कम के थे। भूकंप के केंद्र जमीन से करीब छह किलोमीटर की गहराई में थे। इस बारे में

यूएसजीएस की तरफ से कल जो विज्ञप्ति जारी की गयी है, उसके मुताबिक हवाई द्वीप

के ज्वालामुखी पर्यवेक्षण केंद्र ने 40 ऐसे भूकंप भी दर्ज किये हैं, जो जमीन से सिर्फ दो

किलोमीटर की गहराई में हैं। आस पास की आबादी में इन झटकों को बहुत कम महसूस

किया जा सका। मैग्मा का प्रवाह तेज नहीं होने का संकेत नहीं मिलने की वजह से जमीन

के अंदर क्या कुछ बदल रहा है, वैज्ञानिक उसका भी आकलन कर रहे हैं। उनका मानना है

कि मैग्मा के लावा बनकर बाहर आने के दौरान ढेर सारा हिस्सा जमीन के अंदर भी किसी

कारण से रह गया था। समय के साथ उनके ठंडा होने के बाद उनमें मौजूद तत्व और गैस

भी अपनी स्थिति बदल रहे हैं।

अंदर का जमा हुआ लावा अपनी संरचना बदल रहा होगा

ऐसे में जम चुके लावा में जो गंधक मौजूद था वह भी बदल रहा है जबकि उनमें मौजूद

कॉर्बन डॉईऑक्साइड की भी रासायनिक संरचना अंदर के रासायनिक ढांचे की वजह से

बदल रही होगी। ऐसे में जो पत्थर की शक्ल में लावा अंदर जमा पड़ा हुआ है, वह संभवतः

विखंडित हो रहा है। विशाल खंडों के विखंडित होने की वजह से जमीन के अंदर ऐसा होना

संभव है। इस घटना को अधिक गंभीरता से इसलिए भी देखा जा रहा है क्योंकि इसके आस

पास की आबादी एक जीवंत ज्वालामुखी के क्षेत्र में है। यूएसजीएस के केंद्र यह मानते है कि

पिछले दो सौ वर्षों के वैज्ञानिक आंकड़े यही दर्शाते हैं कि यह ज्वालामुखी कभी भी फिर से

विस्फोट कर सकता है। वैज्ञानिकों ने यहां ज्वालामुखी विस्फोट होने की स्थिति में लावा

का प्रवाह कितनी तेजी से कहां की आबादी तक पहुंचेगा, इसकी भी गणना की है। इस

वजह से पहले से ही वहां रहने वालों को किसी खतरे का संकेत होने पर तुरंत ही इलाका

छोड़ देने की जानकारी पहले से दी जाती रही है। विस्फोट के बाद द्वीप के विभिन्न इलाकों

से धातुओँ की बहती हुई नदी कई इलाकों को जलाकर राख कर देने के बाद अंततः समुद्र में

ही जाकर गिरेगा। यहां पहले भी ऐसी घटनाएं घट चुकी है। इसी वजह से लगातार आ रहे

भूकंप के झटकों के प्रति पूरी सावधानी बरती जा रही है।

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